गाज़ा पर नए ‘नाटक’ की पटकथा: मुस्लिम देशों की चुप्पी और अचानक जागरूकता
मुस्लिम नाउ ब्यूरो
ईरान पर इज़रायल का हमला, गाज़ा में एक लाख से अधिक मासूमों का कत्लेआम—और इस दौरान मुस्लिम देशों का ठंडा, बर्फ़-सा मौन। लेकिन अब, जब गाज़ा पर स्थायी कब्ज़े की योजना सामने आई, वही देश अचानक ‘जाग’ उठे। सवाल यह है—क्या यह ईमान की पुकार है, या राजनीतिक-आर्थिक स्वार्थ का नया खेल?
पिछले एक साल से गाज़ा को मलबे में बदलने का सिलसिला जारी है। बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों पर बम बरसाए गए, नेताओं को ‘आतंकवादी’ ठहराकर मौत के घाट उतारा गया, भूख और बीमारी से लोग मरते रहे। इंटरनेशनल कोर्ट में मुक़दमे चले, फ्रांस जैसे देशों ने इज़रायल का बहिष्कार किया—लेकिन सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान और यूएई जैसे इस्लामी देश चुप्पी ओढ़े बैठे रहे।
इतना ही नहीं, ईरान पर इज़रायल के हमले में इन देशों ने अपने आसमान इज़रायल के लड़ाकू विमानों के लिए खोल दिए। यह वो देश हैं जो मंचों पर ‘उम्मत’ और ‘इस्लामी एकता’ के बड़े-बड़े दावे करते हैं। लेकिन जब गाज़ा जल रहा था, इनके ‘ठेकेदाराना’ चेहरे से परदे गिर गए।
अब तुर्की के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री मंच से कह रहे हैं कि “मुस्लिम देशों को एकजुट होकर इज़रायल की योजना के ख़िलाफ़ वैश्विक प्रतिरोध बनाना चाहिए”। मिस्र भी वही सुर मिला रहा है। ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) ने इस योजना को ‘अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन’ और ‘शांति की संभावना को खत्म करने वाला कदम’ बताया है।
लेकिन आलोचकों का तर्क है—यह अचानक की हमदर्दी गाज़ा के ज़ख्म भरने के लिए नहीं, बल्कि वहां पुनर्निर्माण और व्यापारिक अवसरों पर कब्ज़ा जमाने के लिए है। अमेरिका और इज़रायल पहले ही गाज़ा में ‘विकास योजनाओं’ की बात कर चुके हैं। तुर्की और अन्य इस्लामी देश अब उसी दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं।
गाज़ा के लोगों के लिए यह खेल कोई नया नहीं—वे कई बार देख चुके हैं कि कैसे ‘हमदर्दी’ के नाम पर उनकी सरज़मीन पर नए कब्ज़े की बिसात बिछाई जाती है। सवाल साफ़ है: क्या मुस्लिम देशों का यह ‘गाज़ा प्रेम’ असली है, या यह भी मलबे पर साम्राज्य खड़ा करने की तैयारी?

