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गाज़ा पर नए ‘नाटक’ की आहट: मुस्लिम देशों की दोहरी नीति बेनक़ाब

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

क्या तुर्की और अन्य मुस्लिम देश अब मुसलमानों और इस्लाम के नाम पर गाज़ा को लेकर नया राजनीतिक खेल शुरू करने वाले हैं? यह सवाल अब खुलकर उठने लगा है। वजह है—ईरान पर इज़रायल का हालिया हमला और गाज़ा में एक लाख से अधिक निर्दोष लोगों की मौत के दौरान इन देशों का ठंडा और चुप्पी भरा रवैया।

परमाणु हथियार के बहाने जब इज़रायल ने ईरान पर हमला किया, तब तुर्की, पाकिस्तान और कई मुस्लिम देशों ने न केवल इज़रायल के लड़ाकू विमानों को अपने आसमान से गुज़रने दिया, बल्कि अप्रत्यक्ष मदद भी दी। यह व्यवहार मुसलमानों और इस्लाम के नाम पर इनकी गंभीरता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की अक्सर खुद को दुनिया के मुसलमानों का ‘ठेकेदार’ बताते हैं, मगर इस युद्ध ने इनकी पोल खोल दी।

गाज़ा को इज़रायल ने एक साल से अधिक समय तक बमबारी से खंडहर बना दिया, लाखों लोग मारे गए, नेताओं को ‘आतंकवादी’ ठहराकर मौत के घाट उतारा गया, भूखे-नंगे नागरिकों पर मिसाइलें बरसीं—और इस्लामी दुनिया के ये ‘चौधरी’ देश मौन साधे रहे। इंटरनेशनल कोर्ट में इज़रायल और उसके प्रधानमंत्री पर मुकदमा चल रहा है, फ्रांस तक ने इज़रायल का बहिष्कार किया, मगर मुस्लिम देश या तो चुप रहे या अप्रत्यक्ष सहयोग देते रहे।

अब जब इज़रायल ने गाज़ा पर स्थायी कब्ज़े की योजना बनाई है, तो तुर्की अचानक सक्रिय हो गया है। सवाल यह है—क्या यह रहमदिली है, या तबाह गाज़ा में भविष्य के कारोबारी हितों की तैयारी? इज़रायल और अमेरिका पहले ही गाज़ा में विकास परियोजनाओं की बात कर चुके हैं। तुर्की और अन्य इस्लामी देशों के इस नए रुख को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान ने मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी से मुलाक़ात के बाद कहा कि मुस्लिम देशों को इज़रायल की इस योजना के खिलाफ वैश्विक प्रतिरोध खड़ा करना चाहिए। उन्होंने साफ़ कहा—”इज़रायल का मक़सद फ़िलिस्तीनियों को बेदख़ल कर गाज़ा पर स्थायी कब्ज़ा करना है। इसे समर्थन देने का कोई बहाना स्वीकार्य नहीं है।”

मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलत्ती ने भी चेताया—”गाज़ा में जो हो रहा है, वह सिर्फ़ फ़िलिस्तीन का मामला नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए ख़तरनाक है।” ओआईसी की मंत्रिस्तरीय समिति ने इज़रायल की योजना को ‘अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन’ और ‘शांति की संभावना को समाप्त करने वाला कदम’ बताया।

फिर भी, आलोचक पूछ रहे हैं—जब गाज़ा पर लगातार हमला हो रहा था, तब तुर्की, सऊदी अरब और अन्य इस्लामी देश चुप क्यों थे? क्या अब ये ‘गाज़ा प्रेम’ महज़ राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ का मुखौटा है?