दिल्ली के अलशिफा अस्पताल पर गंभीर आरोप, ब्लॉगर ने उठाए सवाल
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
दिल्ली के जामिया नगर इलाके में स्थित अलशिफा अस्पताल इस समय चर्चा में है। जमात इस्लामी हिंद द्वारा संचालित इस अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक प्रसिद्ध ब्लॉगर ने गंभीर आरोप लगाए हैं। ब्लॉगर कमर क्रांति ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर अस्पताल के कामकाज पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि समाज सेवा और इलाज के नाम पर यहां एक तरह का धंधा चलाया जा रहा है। अपने इस दावे को साबित करने के लिए उन्होंने जामिया नगर के ही दो बड़े अस्पतालों की तुलना की है। उन्होंने ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित होली फैमिली अस्पताल और जमात इस्लामी के अलशिफा अस्पताल के तौर-तरीकों का उदाहरण सामने रखा है।
कमर क्रांति ने अपने व्लॉग में दोनों अस्पतालों की फीस और व्यवस्थाओं का ब्योरा दिया है। उनके दावे के अनुसार होली फैमिली अस्पताल में आम मरीजों के लिए ओपीडी की फीस काफी अधिक है। वहां डॉक्टरों की सीनियरिटी के हिसाब से फीस सात सौ रुपये से लेकर दो हजार रुपये तक तय की गई है। इसके बावजूद इसी अस्पताल में गरीब मरीजों के लिए एक विशेष और बेहद सस्ती व्यवस्था भी की गई है। गरीब तबके के लोगों के लिए अस्पताल के सबसे सीनियर डॉक्टर भी हर दिन सुबह सात बजे बैठते हैं। इन डॉक्टरों की ओपीडी फीस गरीबों के लिए मात्र एक सौ से दो सौ रुपये के बीच रखी गई है।
व्लॉग में यह भी दावा किया गया है कि यह रियायती व्यवस्था केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। मुंबई में स्थित होली फैमिली अस्पताल में भी गरीब मरीजों को इसी तरह की बड़ी राहत दी जाती है। मिशनरी अस्पतालों की इस सेवा भावना की सराहना करते हुए ब्लॉगर ने अलशिफा अस्पताल के प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि होली फैमिली अस्पताल से कुछ ही दूरी पर जमात इस्लामी हिंद का मरकज और उनका अलशिफा अस्पताल मौजूद है। इस अस्पताल में गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए ऐसी किसी भी रियायत या विशेष ओपीडी की कोई व्यवस्था नहीं है।
कमर क्रांति के अनुसार अलशिफा अस्पताल में अमीर और गरीब सभी वर्ग के मरीजों से एक समान भारी फीस वसूली जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को यहां इलाज में कोई छूट नहीं मिलती है। इसके अलावा उन्होंने अस्पताल के अंदर चल रही दवाओं की रीटेलिंग पर भी उंगली उठाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस अस्पताल में आने वाले मरीजों को बेहद महंगी दवाइयां लिखी जाती हैं। डॉक्टरों द्वारा कुछ खास और चुनिंदा कंपनियों की ब्रांडेड दवाइयां ही प्रिस्क्राइब की जा रही हैं। इसके पीछे दवा कंपनियों के साथ मिलीभगत का अंदेशा जताया गया है।
इस बात की पुष्टि के लिए ब्लॉगर ने दावा किया कि दवा कंपनियों के प्रतिनिधि यानी मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव दिन भर अस्पताल परिसर में घूमते रहते हैं। कूटनीतिक और सामाजिक नजरिए से देखें तो जमात इस्लामी हिंद का मुख्य काम समाज सेवा और दावत का माना जाता है। ऐसे में कमर क्रांति का कहना है कि इस संस्थान के अस्पताल को भी किसी मिशनरी अस्पताल की तरह ही निस्वार्थ भाव से काम करना चाहिए था। वर्तमान में अलशिफा अस्पताल की कार्यप्रणाली आम जनता को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा देने वाली नहीं दिखती है। यह पूरी तरह से एक व्यावसायिक और कमाई करने वाला जरिया बन चुका है।
वीडियो के अंत में ब्लॉगर ने साफ किया कि उनके इस खुलासे के बाद कई लोग उनका विरोध कर सकते हैं। इसके बावजूद वे समाज और विशेषकर मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की आवाज उठाते रहेंगे। उनका कहना है कि वे आम लोगों से जुड़े ऐसे ही जरूरी सवाल उठाने के लिए लगातार वीडियो बनाते हैं। इस पूरे मामले ने दिल्ली के जामिया नगर इलाके के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। कूटनीतिक स्तर पर चैरिटी और धार्मिक ट्रस्टों द्वारा चलाए जा रहे अस्पतालों की जवाबदेही पर भी सवाल उठने लगे हैं। फिलहाल इस पूरे विवाद पर अलशिफा अस्पताल प्रशासन या जमात इस्लामी हिंद की तरफ से कोई आधिकारिक सफाई सामने नहीं आई है।

