भाजपा की मुस्लिम नीति में बदलाव: पसमांदा मंत्र फेल ? शिया चेहरों पर दांव
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नौशाद अख्तर
भारतीय जनता पार्टी की सियासी प्रयोगशाला में इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि मुस्लिम समुदाय को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का ‘पसमांदा कार्ड’ उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाया है। यही वजह है कि पार्टी अब एक बार फिर अपनी पुरानी और आजमाई हुई ‘शिया केंद्रित’ नीति पर लौटती दिख रही है। इसे सियासत के जानकार पूर्व दिग्गज नेता सिकंदर बख्त की रणनीति की वापसी के तौर पर देख रहे हैं।
इस बात को बल केंद्र सरकार और संगठन द्वारा हाल ही में लिए गए दो बड़े फैसलों से मिलता है। पहला फैसला ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार से जुड़ा है। इसमें भारतीय प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई करने की जिम्मेदारी बिहार के राज्यपाल और सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन को सौंपी गई। दूसरा बड़ा फैसला मध्य प्रदेश में हुआ। वहां भाजपा ने अपनी नवनियुक्त 106 सदस्यीय प्रदेश कार्यसमिति में 57 वर्षीय हनुमान भक्त बिलकीस जहां को शामिल किया है। इत्तेफाक देखिए कि यह दोनों ही चेहरे शिया बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं।
शिया-सुन्नी विमर्श और सिकंदर बख्त फॉर्मूला
जनसंघ के जमाने से ही भाजपा की मुस्लिम राजनीति में शिया और सुन्नी चेहरों को लेकर अलग-अलग प्रयोग होते रहे हैं। शुरुआती दौर में सिकंदर बख्त को पार्टी का मुख्य मुस्लिम चेहरा बनाकर आगे बढ़ाया गया था। इसके बाद के दौर में मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन जैसे नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारियां दी गईं। हालांकि शिया और सुन्नी दोनों एक ही इस्लाम धर्म का हिस्सा हैं और बुनियादी तौर पर दोनों में केवल नजरिए का फर्क है। जब पुराने फॉर्मूले से पार्टी को मनमुताबिक राजनीतिक सफलता नहीं मिली, तो भाजपा ने एक नया प्रयोग शुरू किया।
पार्टी ने अशराफ (अगड़े) और अरजाल (पिछड़े) के सामाजिक अंतर को आधार बनाकर ‘पसमांदा मुस्लिम’ कार्ड खेला। पिछले लगभग पांच सालों से शिया नेताओं को थोड़ा नेपथ्य में धकेल कर पसमांदा मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने की कोशिशें हुईं। इसी रणनीति के तहत मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन जैसे स्थापित शिया चेहरों को धीरे-धीरे हाशिए पर डाल दिया गया। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी कई शिया नेताओं को किनारे कर दिया गया।

क्यों कमजोर पड़ी पसमांदा की सियासत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पसमांदा राजनीति का यह नया फॉर्मूला जमीन पर बहुत ज्यादा असरदार साबित नहीं हो सका। इसके पीछे एक बड़ी वैचारिक और व्यावहारिक खाई थी। पसमांदा समाज से जुड़े संगठन और नेता भाजपा की केंद्र सरकार से नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की मांग कर रहे थे। दूसरी तरफ भाजपा का वैचारिक स्टैंड हमेशा से साफ रहा है कि वह धर्म के आधार पर आरक्षण देने के पूरी तरह खिलाफ है। इस विरोधाभास के कारण पसमांदा राजनीति की गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई। जब आरक्षण के मुद्दे पर गतिरोध पैदा हुआ, तो इस पूरी मुहिम की हवा निकल गई।
अब इस स्थिति से उबरने के लिए भाजपा वापस शिया समुदाय को तरजीह देने की रणनीति पर काम करती दिख रही है। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन को ईरान भेजना इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। ईरान एक शिया बहुल देश है और वैश्विक राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के दिनों में भारत के कुछ फैसलों से ऐसा लगा था कि दोनों देशों के पुराने रिश्तों में थोड़ी खटास आ सकती है। ऐसे संवेदनशील समय में सैयद अता हसनैन जैसे सम्मानित शिया चेहरे को वहां भेजना कूटनीतिक रूप से एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
मध्य प्रदेश में बिलकीस जहां: हनुमान भक्त और भाजपा का इकलौता मुस्लिम चेहरा
संगठन के स्तर पर इसी रणनीति का सबसे ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश में देखने को मिला है। भाजपा ने 23 जून को अपनी जो प्रदेश कार्यसमिति घोषित की है, उसमें बिलकीस जहां इकलौती मुस्लिम सदस्य हैं। भोपाल के अलीगंज इलाके की रहने वाली 57 वर्षीय बिलकीस जहां शिया दाऊदी बोहरा समुदाय से आती हैं। बिलकीस की शख्सियत बेहद दिलचस्प है। वह पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री उमा भारती की बेहद करीबी रही हैं। उमा भारती उन्हें प्यार से ‘बिल्ली’ कहकर बुलाती हैं।
वाणिज्य स्नातक (कॉमर्स ग्रेजुएट) बिलकीस जहां को 16 साल के दौरान चौथी बार पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था यानी कार्यसमिति में जगह मिली है। बिलकीस जहां की सबसे बड़ी खासियत उनका अनूठा धार्मिक और सामाजिक समन्वय है। वह इस्लाम और हिंदू धर्म दोनों के प्रति समान आस्था रखती हैं। यही वजह है कि भाजपा के भीतर काम करने वाले प्रखर हिंदूवादी नेताओं को भी उनके नाम पर कोई आपत्ति नहीं होती है।
अलसुबह नमाज और सुबह हनुमान चालीसा का पाठ
अपनी दिनचर्या के बारे में बात करते हुए बिलकीस जहां बताती हैं कि आस्था उनके जीवन में कभी रुकावट नहीं बनी। वह रोज सुबह 3 बजे उठकर भोपाल के अलीगंज स्थित अपनी कम्युनिटी की मस्जिद में नमाज अदा करती हैं। इसके ठीक बाद सुबह साढ़े सात बजे वह कमला पार्क इलाके के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर पहुंचती हैं। पिछले 22 सालों से उनका यह नियम कभी नहीं टूटा है। वह वहां बैठकर पूरी श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करती हैं। हर मंगलवार को वह ‘बब्बा जी’ (भगवान हनुमान) के लिए उपवास भी रखती हैं। उनका मानना है कि हनुमान जी ने उनके जीवन के हर संकट को दूर किया है।
बिलकीस जहां मक्का, जेद्दा, ईरान और मिस्र जैसे इस्लामिक मुल्कों की धार्मिक यात्राएं कर चुकी हैं। इसके साथ ही वह जम्मू स्थित माता वैष्णो देवी के दरबार में भी तीन बार हाजिरी लगा चुकी हैं। उनके जीवन का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि वह साल 1990 के राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवा के लिए भी निकली थीं। उस दौरान उन्हें भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में तीन दिनों के लिए रोका गया था। बिलकीस कहती हैं कि अगर कोई उन्हें हनुमान भक्त कहता है तो उन्हें गर्व होता है। वह लोगों का अभिवादन ‘जय सियाराम’ कहकर करती हैं। उनका मानना है कि यह कोई धार्मिक नारा नहीं है, बल्कि एक ऐसा उद्घोष है जिस पर हर हिंदुस्तानी को फख्र होना चाहिए।
मॉब लिंचिंग और कट्टरता पर बेबाक राय
एक सच्ची राष्ट्रवादी और धार्मिक महिला होने के नाते बिलकीस जहां समाज में फैल रही कट्टरता पर भी खुलकर बोलती हैं। उनका कहना है कि अगर गाजा और ईरान में मुसलमानों की हत्या या बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार गलत है, तो भारत में गोतस्करी के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग को भी सही नहीं ठहराया जा सकता। एक हनुमान भक्त होने के नाते अयोध्या राम मंदिर के दान में हुई कथित हेराफेरी की खबरों से भी उन्हें गहरा दुख पहुंचा था।
बिलकीस के राजनीतिक सफर की शुरुआत साल 1979 में हुई थी। एक कारोबारी बोहरा मुस्लिम परिवार के पांच भाई-बहनों में वह सबसे छोटी हैं। वह उस दौर के जनता पार्टी के नेता रजिया सुल्तान आरिफ बेग और आरएसएस नेता शशि भाई सेठ के संपर्क में आईं। शशि भाई ने ही उन्हें ‘बिल्लू चांद’ नाम दिया था। अस्सी के दशक की शुरुआत से ही वह भाजपा से जुड़ गईं। शुरुआती दिनों में वह भोपाल के चौक मंडल की इकलौता मुस्लिम महिला कार्यकर्ता थीं। मुस्लिम बहुल सैफिया कॉलेज पोलिंग बूथ पर भाजपा ने उन्हें अपना इकलौता बूथ एजेंट बनाया था। उनके कड़े संघर्ष के बाद ही उनके परिवार ने भी भाजपा को वोट देना शुरू किया।
चुनावी मैदान में बहाया खून और झेले मुकदमे
पार्टी के लिए उनका समर्पण साल 1993 के विधानसभा चुनाव में खुलकर सामने आया। उन्होंने भोपाल उत्तर सीट से भाजपा उम्मीदवार रमेश शर्मा के लिए डटकर प्रचार किया। उस दौर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए पथराव में उनके माथे पर गंभीर चोट आई थी। गहरा घाव होने के कारण खून बह रहा था, लेकिन वह मैदान छोड़कर नहीं भागेंगी। भाजपा ने वह चुनाव जीता था और बिलकीस कहती हैं कि पार्टी की जीत के सामने वह दर्द बहुत छोटा था। राजनीति के इस सफर में उन्हें रोकने के लिए विरोधियों ने उन पर 18 मुकदमे भी दर्ज करवाए। महमूद गजनवी का पुतला फूंकने के आरोप में उन्हें एक दिन जेल में भी काटना पड़ा था।
साल 2002 के नगर निगम चुनाव में पार्टी ने उन्हें वार्ड नंबर 19 से उम्मीदवार बनाया। यह सीट तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कद्दावर मंत्री आरिफ अकील का गृह क्षेत्र थी। कांग्रेस ने उनके मुकाबले बोहरा समुदाय की ही शमीम बानो को उतारकर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की। तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने खुद वहां चुनावी सभा की थी। तमाम बंदिशों के बावजूद कैलाश जोशी, कैलाश सारंग, उमा भारती और सुंदरलाल पटवा जैसे दिग्गज भाजपा नेताओं के समर्थन से बिलकीस ने वह चुनाव 272 वोटों से जीता। एक पार्षद के तौर पर उन्होंने अपने इलाके में सरकारी प्राइमरी स्कूल खुलवाया और पहलवानों के लिए अखाड़े का निर्माण कराया।

उम्मीदें और भविष्य के सियासी समीकरण
हालांकि बिलकीस के मन में कुछ टीस भी है। वह भोपाल उत्तर विधानसभा सीट से भाजपा का टिकट चाहती थीं, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह पूर्व कांग्रेस विधायक रसूल अहमद सिद्दीकी की बेटी फातिमा रसूल सिद्दीकी को टिकट दे दिया। फातिमा वह चुनाव हार गईं और बाद में वापस कांग्रेस में चली गईं। बिलकीस ने इस बात की शिकायत तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी की थी।
अब एक बार फिर कार्यसमिति में शामिल होने के बाद बिलकीस जहां को उम्मीद है कि पार्टी उन्हें प्रदेश मदरसा बोर्ड, राज्य अल्पसंख्यक आयोग या राज्य महिला आयोग में कोई बड़ी जिम्मेदारी देगी। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि बिलकीस जहां की संगठन में यह वापसी महज एक पद तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में पार्टी उन्हें भोपाल उत्तर जैसी चुनौतीपूर्ण सीट पर एक मजबूत मुस्लिम चेहरे के रूप में दोबारा चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति पर भी विचार कर रही है। यह वो सीट है जिसे भाजपा 1993 के बाद से कभी नहीं जीत सकी है। लेफ्टिनेंट जनरल हसनैन और बिलकीस जहां जैसे चेहरे आम सुन्नी मुसलमानों के बीच कितने स्वीकार्य होंगे, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन भाजपा ने शिया कार्ड खेलकर अपनी नई सियासी बिसात जरूर बिछा दी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बिलकिस जहां कौन हैं
बिलकिस जहां मध्य प्रदेश भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं। वह भोपाल की रहने वाली हैं और दाऊदी बोहरा शिया समुदाय से आती हैं।
बिलकिस जहां क्यों चर्चा में हैं
उन्हें मध्य प्रदेश भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति में एकमात्र मुस्लिम सदस्य बनाया गया है।
क्या बिलकिस जहां हनुमान भक्त हैं
हां। वह नियमित रूप से हनुमान मंदिर जाती हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करती हैं और मंगलवार का व्रत भी रखती हैं।
क्या भाजपा फिर शिया नेताओं को आगे बढ़ा रही है
इस पर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। लेकिन हाल के फैसलों के बाद राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा जरूर शुरू हुई है।

