Muslim World

तालिबान की कूटनीतिक नाकामी: पड़ोसी मुस्लिम देशों ने निकाले हज़ारों अफ़गान शरणार्थी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, तेहरान।
तालिबान जिन देशों को अपना वैचारिक और भौगोलिक पड़ोसी समझता है, उन्हीं मुस्लिम देशों की नीतियों का सबसे बड़ा शिकार आज अफ़गानिस्तान के विस्थापित नागरिक बन रहे हैं। तालिबान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति न तो पड़ोसी देशों का भरोसा जीत पा रही है और न ही यह अपने नागरिकों को सम्मानजनक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है। परिणामस्वरूप, ईरान और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुस्लिम राष्ट्रों ने अफ़गान शरणार्थियों पर दबाव और कार्रवाई तेज कर दी है।

तालिबान के डिप्टी प्रवक्ता हमदुल्लाह फिटरत ने स्वीकार किया कि एक ही दिन में 580 परिवारों यानी 3,164 लोगों को पाकिस्तान और ईरान से जबरन निकालकर अफ़गानिस्तान भेज दिया गया। ये परिवार स्पिन बोल्डक (कंधार), बह्रमचा (हेलमंद), इस्लाम क़ला (हेरात), पुल-ए-अब्रेशम (निमरोज़) और तोर्खम (नंगरहार) के रास्ते देश लौटे।

फिटरत ने बताया कि 962 परिवारों (5,404 लोग) को उनके प्रांतों में भेजा गया और 557 परिवारों को मानवीय सहायता दी गई। दूरसंचार कंपनियों ने इन शरणार्थियों को 663 सिम कार्ड भी वितरित किए। इसके एक दिन पहले 1,053 परिवार (4,834 लोग) जबरन निकाले गए थे।


पाकिस्तान में अफ़गानों की ज़िंदगी: गिरफ्तारी, उगाही और डर का राज

पाकिस्तान में मौजूद अफ़गान शरणार्थियों ने नवंबर में बताया कि वहाँ की पुलिस लगातार छापेमारी, हिरासत और उगाही कर रही है।
अफ़गान अख़बार 8AM मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में अफ़गान शरणार्थी बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित, गहरी चिंता और भय में रह रहे हैं।

इस्लामाबाद सहित कई इलाकों में पुलिस और सादे कपड़ों में घूमने वाले लोग शरणार्थियों को पकड़कर पैसे ऐंठते हैं। शरणार्थियों का कहना है कि उन्हें नहीं पता चलता कि सामने वाला असली पुलिसकर्मी है या अपराधी—क्योंकि दोनों ही उनसे पैसे वसूलते हैं।

एक अफ़गान नागरिक ने बताया:
“जो भी व्यक्ति पुलिस बनकर आता है, वह हमें उठा ले जाता है। कोई पूछने वाला नहीं। कई बार तो आम अपराधी भी पुलिस का नाम लेकर लूट रहे हैं, और लोग उन्हें असली पुलिस समझ लेते हैं।”

दूसरे शरणार्थी जुनैद ने कहा कि उनसे एक रात 15,000 रुपये लेकर छोड़ दिया गया।
“हम नहीं जानते कि हमारे खिलाफ कार्रवाई कौन कर रहा है। असली पुलिस या वे लोग जो पुलिस से मिलकर पैसा कमाते हैं।”


तालिबान की नीतियाँ सवालों के घेरे में

ईरान और पाकिस्तान द्वारा अफ़गानों को जबरन निकाले जाने के बढ़ते मामलों के बावजूद तालिबान ने न तो कोई कूटनीतिक वार्ता शुरू की है और न ही पड़ोसी देशों को भरोसे में लेने की कोशिश।
विशेषज्ञों के अनुसार, तालिबान की यह कमजोरी आने वाले महीनों में अफ़गान विस्थापितों के लिए और बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती है।