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जमीयत उलेमा-ए-हिंद का बड़ा खुलासा: मुसलमानों पर ज़्यादतियों का भयावह आंकड़ा पेश

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
जब अन्याय हदें पार कर ले, तो प्रतिरोध जन्म लेता है। यही तस्वीर आज भारत के मुस्लिम सामाजिक–धार्मिक नेतृत्व में दिखाई दे रही है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी, जिन पर लंबे समय से सरकार और आरएसएस के “हमदर्द” होने के आरोप लगते रहे, अब उसी सरकार के खिलाफ सबसे मुखर और तीखे तेवर के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। उनके हालिया बयानों और संस्थान द्वारा जारी रिपोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि हालात अब सामान्य आलोचना से आगे निकलकर गंभीर प्रतिक्रिया की माँग कर रहे हैं।

हाल ही में मौलाना मदनी ने न केवल सरकार की मुस्लिम-विरोधी नीतियों की तीखी समीक्षा की, बल्कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से देशभर में मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती ज्यादतियों का जो ताज़ा आंकड़ा सार्वजनिक किया गया, वह अत्यंत चिंताजनक और विचलित करने वाला है।


जमीयत की रिपोर्ट: नफ़रत, हिंसा और भेदभाव का नक्शा

अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने “India’s Hate Crime Landscape” शीर्षक से एक विस्तृत डेटा साझा किया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में मुसलमानों के खिलाफ किस तरह संगठित रूप से नफ़रत, हिंसा, उत्पीड़न और सरकारी–संस्थागत भेदभाव बढ़ा है। दिए गए आँकड़े इस प्रकार हैं:

  • 71 मामले (34%) – नफ़रत फैलाने की घटनाएँ
    इनमें मौखिक गाली-गलौज, हेट स्पीच, धमकी भरे कॉल, ऑनलाइन कैंपेन और अल्पसंख्यकों को असुरक्षित महसूस कराने वाले कृत्य शामिल हैं।
  • 61 मामले (29.2%) – भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार
    आवास, रोज़गार, सार्वजनिक स्थान, शिक्षा और संस्थागत प्रक्रियाओं में व्यवस्थित पक्षपात इस श्रेणी में शामिल हैं।
  • 209 मामले (34%) – मीडिया में तथ्य विकृति और दुष्प्रचार
    फ़ेक न्यूज़, सांप्रदायिक एंगल, मुस्लिम समुदाय को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने वाली कवरेज और रूढ़ियों को बढ़ावा देने के आरोप शामिल हैं।
  • 15 मामले (6.2%) – राज्य-प्रायोजित भेदभाव
    प्रशासनिक कार्रवाई, बेदखली, जबरन विध्वंस, असमान पुलिस कार्रवाई और नीतिगत पक्षपात को इस श्रेणी में रखा गया है।
  • 13 मामले (5%) – पुलिस अत्याचार
    संदिग्ध गिरफ्तारियाँ, हिरासत में हिंसा, पक्षपातपूर्ण जांच और दमनकारी कार्रवाई शामिल हैं।
  • 10 मामले (4.8%) – धार्मिक स्थलों पर हमले
    मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों और धार्मिक स्थलों पर तोड़फोड़ या हमलों की रिपोर्ट।
  • 28 मामले (13.4%) – प्रत्यक्ष हिंसा और मॉब अटैक
    मुसलमानों पर भीड़ द्वारा हमला, शारीरिक प्रताड़ना और जानलेवा हिंसा।

जमीयत की यह रिपोर्ट बताती है कि नफ़रत और हिंसा की यह राज्यव्यापी प्रवृत्ति न केवल बढ़ रही है, बल्कि कई मामले संस्थागत उदासीनता या मिलीभगत का भी संकेत देते हैं।


सरकार पर मौलाना मदनी का खुला हमला

हाल के एक कार्यक्रम में मौलाना मदनी ने सरकार की उन नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए जिन्हें वह “मुस्लिम विरोधी” बताते हैं—

  • बाबरी मस्जिद–राम जन्मभूमि फैसला,
  • तीन तलाक कानून,
  • वक़्फ़ संपत्ति पर प्रस्तावित नए नियम,
  • वंदे मातरम और राष्ट्रगान से जुड़े दबाव,
  • तथा कई प्रशासनिक उपाय।

यह वही मुद्दे हैं जिन पर अब तक मुस्लिम संगठनों का एक बड़ा हिस्सा या तो चुप रहा या सरकार समर्थक रुख में दिखा। यही वजह है कि मदनी की मुखर आलोचना ने राजनीतिक और धार्मिक हलकों में नया विमर्श खड़ा कर दिया है।


सरकारी समर्थक धर्मगुरुओं की नाराज़गी

मदनी के बढ़ते सरकार-विरोधी रुख के बाद कुछ ऐसे मौलाना—जो अक्सर सरकार या आरएसएस के ‘करीबी’ माने जाते हैं—ने उनकी आलोचना शुरू कर दी है। अब दिलचस्प सवाल यह है कि जमीयत द्वारा पेश किए गए इन ठोस आंकड़ों का यह “सरकारी तबका” कैसे जवाब देगा?
क्या वे आंकड़ों को नकारेंगे, या मसले से ध्यान भटकाने की कोशिश करेंगे?


अंततः…

मौलाना मदनी के बयान और जमीयत की रिपोर्ट मिलकर यह बताते हैं कि देश में मुसलमानों को लेकर उत्पीड़न, भेदभाव और नफ़रत का माहौल कितना व्यापक और गहरा हो चुका है। यह सिर्फ आँकड़ों की बात नहीं—यह उस समाज की चेतावनी है जहाँ नफ़रत का सामान्यीकरण होने लगता है।

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या मुस्लिम नेतृत्व इस रिपोर्ट को एक साझा मोर्चे में बदल पाएगा, या फिर आंतरिक मतभेद इस महत्वपूर्ण मुद्दे को कमजोर कर देंगे।