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तेहरान की चेतावनी: कूटनीति विफल तो युद्ध तय

तेहरान/वॉशिंगटन:

पश्चिम एशिया में एक बार फिर भू-राजनीतिक तनाव अपने चरम की ओर बढ़ता दिख रहा है। ईरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अब फैसला संयुक्त राज्य अमेरिका के हाथ में है—या तो कूटनीतिक रास्ता चुना जाए या फिर टकराव की राह पर आगे बढ़ा जाए। ईरान ने यह भी साफ कर दिया है कि वह दोनों ही स्थितियों के लिए पूरी तरह तैयार है।

ईरान के उप-विदेश मंत्री काज़ेम ग़रीबाबादी ने तेहरान में विदेशी राजनयिकों को संबोधित करते हुए कहा, “अब गेंद अमेरिका के पाले में है कि वह कूटनीति का रास्ता अपनाता है या टकराव जारी रखता है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हर विकल्प के लिए तैयार है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के हफ्तों में दोनों देशों के बीच तनाव खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। फरवरी के अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद से स्थिति लगातार अस्थिर बनी हुई है। हालांकि 8 अप्रैल से युद्धविराम लागू है, लेकिन शांति वार्ता अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं दे पाई है।

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के हालिया प्रस्ताव पर असंतोष जताया है। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “मैं उनके प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हूं। ईरान के भीतर भी गहरे मतभेद हैं, जो बातचीत को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं।” ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका के सामने दो विकल्प हैं—या तो सैन्य कार्रवाई कर निर्णायक कदम उठाया जाए या फिर समझौते की दिशा में प्रयास जारी रखे जाएं। हालांकि उन्होंने मानवीय आधार पर युद्ध के विकल्प से बचने की इच्छा जताई।

तनाव को और बढ़ाते हुए, ईरान की सैन्य कमान के वरिष्ठ अधिकारी मोहम्मद जाफर असादी ने चेतावनी दी है कि अमेरिका के साथ फिर से संघर्ष “काफी संभावित” है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका किसी भी समझौते के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है और उसके वादों पर भरोसा करना मुश्किल है।

ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख गोलामहुसैन मोहसिनी एजई ने भी कहा कि उनका देश कभी भी बातचीत से पीछे नहीं हटा है, लेकिन वह किसी भी तरह की “थोपे गए शांति समझौते” को स्वीकार नहीं करेगा। यह बयान ईरान के उस रुख को दर्शाता है जिसमें वह अपनी शर्तों पर ही किसी समझौते के लिए तैयार है।

सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने अपना नया प्रस्ताव पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका तक पहुंचाया है, जो इस पूरे विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। हालांकि प्रस्ताव के विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं।

अमेरिकी पक्ष ने भी कुछ संशोधन सुझाए हैं, जिनमें यह मांग शामिल है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम को बमबारी से प्रभावित स्थलों से न हटाए और वार्ता के दौरान उन स्थलों पर गतिविधियां फिर से शुरू न करे। यही मुद्दा दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ा है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, अभी भी ईरान के नियंत्रण में है। इसके चलते तेल, गैस और उर्वरक की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। हालांकि हाल में बातचीत की खबरों के बाद तेल की कीमतों में कुछ गिरावट आई, लेकिन वे अभी भी युद्ध से पहले के स्तर से करीब 50 प्रतिशत अधिक बनी हुई हैं।

ईरान द्वारा इस जलडमरूमध्य पर नियंत्रण बनाए रखने के जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकेबंदी कर दी है। अमेरिकी सेना का दावा है कि इस कदम से ईरान के करीब 6 अरब डॉलर के तेल निर्यात पर रोक लगी है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव पड़ा है।

ईरान के भीतर हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। महंगाई दर 50 प्रतिशत के पार पहुंच चुकी है और आम लोगों के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है। तेहरान के एक निवासी ने कहा कि हालात “नरक जैसे” हो गए हैं, जहां लोग किराया और खाना तक जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

इस बीच, लेबनान में भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। यहां इज़राइल ने ईरान समर्थित संगठन हिज़्बुल्लाह के खिलाफ हमले जारी रखे हैं, जिसमें कई लोगों की मौत हो चुकी है। यह घटनाएं दर्शाती हैं कि क्षेत्र में शांति स्थापित करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

अमेरिका ने अपने सहयोगियों को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर हथियारों की बिक्री को भी मंजूरी दी है। इसमें कतर को 4 अरब डॉलर का पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और इज़राइल को करीब 1 अरब डॉलर के अत्याधुनिक हथियार शामिल हैं। इस कदम को क्षेत्र में सैन्य संतुलन बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

वहीं, अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना सैन्य कार्रवाई कर संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया है। हालांकि प्रशासन का कहना है कि युद्धविराम के चलते कानूनी समयसीमा फिलहाल लागू नहीं होती।

राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में कांग्रेस को लिखे पत्र में कहा कि 7 अप्रैल के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीधा सैन्य टकराव नहीं हुआ है और मौजूदा स्थिति को “समाप्त” माना जा सकता है। लेकिन जमीनी हालात और दोनों देशों के बयानों से साफ है कि तनाव अभी खत्म नहीं हुआ है।

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला मोजतबा खामेनेई ने भी हाल ही में देशवासियों से अपील की है कि वे आर्थिक संकट के बावजूद अपने कर्मचारियों को नौकरी से न निकालें। उन्होंने दुश्मनों के खिलाफ “आर्थिक और सांस्कृतिक जिहाद” का आह्वान करते हुए एकजुट रहने की बात कही।

कुल मिलाकर, मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि ईरान और अमेरिका के बीच संबंध एक नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। एक ओर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्य टकराव का खतरा भी लगातार बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान निकालते हैं या फिर दुनिया एक और बड़े संघर्ष की ओर बढ़ती है।

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