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शेखावाटी की बदलती तस्वीर: जकात की ताकत से संवर रहा है कायमखानी समाज का भविष्य

राजस्थान की रेतीली धरती पर बदलाव की एक नई इबारत लिखी जा रही है। शेखावाटी के सीकर, चूरू और झुंझुनूं जिलों सहित डीडवाना-कुचामन क्षेत्र में इस बार रमजान की रौनक कुछ अलग है। यहाँ का मुस्लिम समाज, खास तौर पर कायमखानी बिरादरी, अपनी जकात की राशि का उपयोग अब समाज के भीतर ही बड़े बदलाव के लिए कर रहा है। दशकों से यहाँ की जकात का एक बड़ा हिस्सा बाहरी संस्थाएं ले जाती थीं। लेकिन अब स्थानीय स्तर पर जागरूकता की लहर ने इस परंपरा को बदल दिया है।

इस नई सोच की शुरुआत यूपीएससी 2026 के नतीजों के बाद हुई है। नई दिल्ली के जकात फाउंडेशन के सहयोग से इस साल करीब 14 मुस्लिम युवाओं ने देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा में कामयाबी हासिल की। इस खबर ने पूरे देश के मुस्लिम संगठनों को झकझोर कर रख दिया। लोगों को समझ आया कि अगर जकात के पैसे को सही दिशा में निवेश किया जाए, तो समाज की तस्वीर बदली जा सकती है। इसी प्रेरणा ने राजस्थान की कायमखानी बिरादरी को भी एकजुट कर दिया है।

कायमखानी समाज अपनी बहादुरी और सेना में बड़ी भागीदारी के लिए जाना जाता है। इस बिरादरी का एक बड़ा हिस्सा सरकारी नौकरियों और फौज में है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि समाज का एक बड़ा तबका आज भी आर्थिक तंगहाली से जूझ रहा है। अक्सर देखा गया है कि जिन परिवारों के लोग पहले से नौकरी में हैं, उनके बच्चे तो आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन गरीब और साधनहीन परिवारों के बच्चे पीछे छूट जाते हैं। इसी खाई को पाटने के लिए इस बार जकात संग्रह पर जोरदार मुहिम छेड़ी गई है।

हैरानी की बात यह है कि सोशल मीडिया की एक छोटी सी अपील ने कमाल कर दिया। शेखावाटी के एक प्रमुख संगठन ‘इकरा फाउंडेशन’ की साफ-सुथरी छवि और नेक इरादों पर भरोसा जताते हुए समाज ने रिकॉर्ड तोड़ सहयोग किया। बताया जा रहा है कि मात्र एक संदेश के बाद फाउंडेशन के पास करीब पचास लाख रुपये की जकात जमा हो गई। यह राशि आने वाले एक साल में गरीब बच्चों की शिक्षा और बेरोजगारों को छोटा व्यापार शुरू करवाने में खर्च की जाएगी। लक्ष्य बड़ा है कि इस साल जो जकात ले रहा है, उसे अगले साल इतना मजबूत बना दिया जाए कि वह खुद जकात देने वाला बन सके।

स्थानीय स्तर पर जकात जमा करने की इस पहल ने उन बाहरी लोगों और संस्थाओं की चिंता बढ़ा दी है, जो हर साल यहाँ से भारी भरकम चंदा ले जाते थे। अब शेखावाटी के लोग यह समझने लगे हैं कि ‘पहले अपने पड़ोस का हक’ अदा करना जरूरी है। समाज के बड़े और प्रतिष्ठित घरानों ने भी इस मुहिम में हिस्सा लिया है। कई बड़े परिवारों ने अपने पारिवारिक ट्रस्ट के जरिए जकात की राशि को शरीयत के अनुसार स्थानीय जरूरतमंदों पर खर्च करने का फैसला किया है।

इस पूरी मुहिम में एक सुखद बदलाव यह भी है कि इन संगठनों से समाज के उच्च शिक्षित और ईमानदार युवा जुड़ रहे हैं। वे जकात के पैसे का हिसाब-किताब पारदर्शी रख रहे हैं। उनका मानना है कि जकात सिर्फ रस्म अदायगी नहीं है, बल्कि यह समाज के आर्थिक सशक्तिकरण का सबसे बड़ा औजार है। वे इस पैसे को केवल राशन बांटने में खत्म नहीं करना चाहते। वे इसे भविष्य की पीढ़ी के कौशल विकास और कोचिंग पर खर्च कर रहे हैं।

सीकर, चूरू और झुंझुनूं के मोहल्लों और गांवों में अब छोटे-छोटे स्थानीय संगठन भी सक्रिय हो गए हैं। इकरा फाउंडेशन के अलावा कई अन्य संस्थाएं भी इस साल जकात के जरिए समाज में बदलाव की तैयारी कर रही हैं। इन कोशिशों का असर अब नजर आने लगा है। स्थानीय जकात देने वाले लोग भी इस बात से खुश हैं कि उनका पैसा उनकी अपनी आंखों के सामने उनके ही भाइयों और बच्चों के काम आ रहा है।

कुल मिलाकर, शेखावाटी में जकात के सही उपयोग ने एक नई उम्मीद जगाई है। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले सालों में कायमखानी समाज और स्थानीय मुस्लिम तबका शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। यह मुहिम यह भी संदेश देती है कि जब समाज अपनी समस्याओं का समाधान खुद ढूंढने लगता है, तो बदलाव आने में देर नहीं लगती। जकात की यह संगठित ताकत भविष्य में शेखावाटी की नई पहचान बनेगी।