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महोबा की मिसाल: इशाक ने पेश की हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अटूट तस्वीर

महोबा (उत्तर प्रदेश):

उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से इंसानियत और सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी मर्मस्पर्शी कहानी सामने आई है, जिसने नफरत की राजनीति करने वालों के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है। यह कहानी दो दोस्तों—इशाक और मुरलीधर तिवारी—की है, जिनके बीच की दीवार धर्म नहीं बल्कि अटूट विश्वास और प्रेम है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ‘असली हिंदुस्तान’ आज भी गंगा-जमुनी तहजीब की मिट्टी में जिंदा है।

सड़क पर अचेत पड़े थे मुरलीधर, इशाक बने देवदूत

घटना के अनुसार, महोबा के रहने वाले 86 वर्षीय मुरलीधर तिवारी किसी घरेलू काम से बाजार निकले थे। बढ़ती उम्र और शारीरिक कमजोरी के बीच अचानक संतुलन बिगड़ने से उन्हें गहरी चोट लग गई। मुरलीधर ने हिम्मत जुटाकर कुछ कदम आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन असहनीय दर्द और कमजोरी के कारण वे बीच सड़क पर ही अचेत होकर गिर पड़े।

विडंबना यह रही कि सड़क पर आवाजाही जारी थी, लोग गुजर रहे थे, लेकिन अधिकांश लोग ‘तमाशबीन’ बनकर मोबाइल से वीडियो बनाने या कतराकर निकलने में मशगूल थे। इसी बीच, यह खबर उनके पुराने मित्र इशाक साहब तक पहुँची।

दोस्ती की कोई सीमा नहीं: अस्पताल से पैरों में चप्पल तक का सफर

जैसे ही इशाक को पता चला कि उनका मित्र संकट में है, उन्होंने एक पल की भी देरी नहीं की। वे फौरन मौके पर पहुंचे, भीड़ को चीरते हुए अपने अचेत दोस्त को सहारा दिया और उन्हें तुरंत अस्पताल ले गए। इशाक तब तक अस्पताल में डटे रहे जब तक मुरलीधर की हालत स्थिर नहीं हो गई और उनका समुचित इलाज नहीं हो गया।

इस पूरी घटना की सबसे प्रभावशाली तस्वीर तब सामने आई जब इलाज के बाद मुरलीधर को घर ले जाने की बारी आई। अस्पताल से बाहर निकलते समय इशाक साहब ने झुककर बड़े ही प्रेम और आदर के साथ मुरलीधर तिवारी के पैरों में अपने हाथों से चप्पल पहनाए। यह दृश्य केवल दो दोस्तों के बीच का नहीं था, बल्कि यह उस संस्कार का था जो भारत की मिट्टी ने हमें दिया है।

यही है असली भारत की संस्कृति

सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर जिसने भी इस दृश्य को देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। बुजुर्ग मुरलीधर के चेहरे पर अपने दोस्त के प्रति कृतज्ञता के भाव और इशाक की आँखों में अपने मित्र की सेवा का संतोष—यही वह भारत है जिसका सपना हमारे पूर्वजों ने देखा था।

वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि महोबा की यह घटना उन लोगों के लिए एक सबक है जो धर्म के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश करते हैं। इशाक और मुरलीधर की यह तस्वीर संदेश दे रही है कि जब संकट आता है, तो इंसान का धर्म नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत और पड़ोसी का धर्म काम आता है।

निष्कर्ष

महोबा जिले से निकली यह खबर आज के दौर में एक नई उम्मीद जगाती है। इशाक साहब का अपने हाथों से मुरलीधर को चप्पल पहनाना केवल एक सहायता नहीं, बल्कि एक घोषणा है कि हिंदुस्तान की संस्कृति नफरत से कहीं ज्यादा मजबूत है। यह ‘असली हिंदुस्तान’ है, जहाँ राम और रहीम की दोस्ती के किस्से आज भी हकीकत बनकर सड़कों पर उतरते हैं।

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