Muslim World

मुस्लिम वोट, सोशल मीडिया और सियासी भ्रम का खेल

सोशल मीडिया के इस दौर में राजनीति का तरीका बदल चुका है। अब सिर्फ रैलियां और पोस्टर ही चुनाव नहीं जिताते। मोबाइल स्क्रीन पर चलने वाले छोटे वीडियो भी लोगों की राय बनाने लगे हैं। उत्तर प्रदेश में इन दिनों ऐसा ही एक नया खेल दिखाई दे रहा है। कुछ मुस्लिम चेहरे लगातार सोशल मीडिया पर सरकार की तारीफ करते नजर आ रहे हैं। वे यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा सरकार ने मुसलमानों के लिए जितना काम किया, उतना पहले कभी नहीं हुआ।

सरकारें अपने काम का प्रचार करती हैं। यह लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब कुछ खास चेहरे अचानक एक जैसी भाषा बोलने लगें, एक जैसी स्क्रिप्ट पढ़ते नजर आएं और हर मुद्दे पर सिर्फ सरकार की तारीफ करें, तब सवाल उठना लाजिमी हो जाता है। यह सिर्फ प्रचार नहीं लगता। यह एक सोच के तहत तैयार की गई रणनीति दिखाई देती है।

दिलचस्प बात यह है कि इन चेहरों में ज्यादातर वही लोग हैं जो पिछले कुछ वर्षों से खुद को पसमांदा राजनीति का चेहरा बताकर सामने आए हैं। सोशल मीडिया पर इनके वीडियो की भरमार है। कोई मुसलमानों को सरकार के करीब आने की सलाह देता है। कोई यह बताता है कि असली समस्या मुसलमानों के अंदर की है। कोई अशराफ और पसमांदा का मुद्दा उठाता है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सबसे बड़ा सवाल गायब रहता है। मुसलमानों के असली मुद्दों पर इनकी आवाज आखिर कहां होती है।

जब मॉब लिंचिंग होती है, तब ये खामोश रहते हैं। जब किसी मुसलमान पर अन्याय होता है, तब इनके वीडियो गायब हो जाते हैं। हाल ही में बिहार के एक मौलाना की संदिग्ध मौत का मामला सामने आया। ट्रेन में परेशान किए जाने की बात हुई। बाद में उनकी लाश रेलवे ट्रैक के किनारे मिली। लेकिन ऐसे किसी मुद्दे पर इन सोशल मीडिया एक्टिविस्टों ने शायद ही कोई आवाज उठाई हो। न इंसाफ की मांग। न गिरफ्तारी की अपील। न कोई विरोध।

यही वजह है कि इनके इरादों पर सवाल खड़े होते हैं।

असल में पिछले एक दशक में मुसलमानों के भीतर पहचान की राजनीति को हवा देने की कोशिशें तेज हुई हैं। पहले शिया और सुन्नी का फर्क उभारा गया। फिर सूफी और हनफी की बहस छेड़ी गई। बाद में अशराफ और पसमांदा का मुद्दा जोर पकड़ने लगा। मकसद साफ था। मुस्लिम समाज को छोटे छोटे हिस्सों में बांट देना ताकि उसकी राजनीतिक ताकत कमजोर हो जाए।

दिल्ली की एक मशहूर दरगाह में भी इसी तरह की कोशिशों को लेकर विवाद सामने आया था। भारी विरोध हुआ। लोगों ने इसे मुसलमानों के बीच फूट डालने की साजिश बताया। धीरे धीरे सूफी राजनीति का वह प्रयोग कमजोर पड़ गया। अब पसमांदा राजनीति को नए तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

लेकिन यहां भी एक बड़ी सच्चाई सामने आती है। जो लोग पसमांदा राजनीति की बात कर रहे हैं, उनके पास कोई स्पष्ट विजन नहीं दिखता। वे आरक्षण की उम्मीद जगाते हैं, जबकि सरकार कई बार साफ कर चुकी है कि धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण नहीं मिलेगा। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह पूरी राजनीति किस दिशा में जा रही है।

कई लोग मानते हैं कि यह सब सिर्फ सत्ता के करीब पहुंचने की कोशिश है। कुछ पद मिल जाएं। कुछ पहचान बन जाए। सोशल मीडिया पर सरकार के समर्थन में वीडियो डालने से राजनीतिक गलियारों में जगह बन जाए। यही वजह है कि ऐसे लोग हर उस मुद्दे के साथ खड़े दिखाई देते हैं जिसे आम मुसलमान पसंद नहीं करता।

इनकी भाषा पर गौर कीजिए। ये सर सैयद अहमद खान की आलोचना करते हैं। मुस्लिम संस्थानों में हिस्सेदारी की मांग करते हैं। खुद को देसी मुसलमान बताते हैं और बाकी मुसलमानों को बाहरी कहने की कोशिश करते हैं। लेकिन इनके पास न कोई ठोस सामाजिक कार्यक्रम है और न शिक्षा, रोजगार या आर्थिक सुधार को लेकर कोई गंभीर सोच।

यह भी सच है कि मुस्लिम समाज के भीतर नेतृत्व का संकट लंबे समय से बना हुआ है। कुछ पुराने चेहरे सिर्फ अपनी पकड़ मजबूत करने में लगे रहे। संस्थानों में अपने लोगों को बैठाया गया। धार्मिक और सामाजिक मंचों पर परिवारवाद बढ़ा। इससे नई सोच और नए नेतृत्व के लिए जगह कम होती गई। यही कारण है कि समाज का एक बड़ा तबका आज भी दिशा तलाश रहा है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मुसलमान आसानी से किसी राजनीतिक प्रयोग का हिस्सा बन जाएंगे। उत्तर प्रदेश और बिहार इसके बड़े उदाहरण हैं। मुसलमानों ने समय समय पर अपने राजनीतिक फैसले बदले हैं। उन्होंने राष्ट्रीय पार्टियों से दूरी बनाई और क्षेत्रीय दलों का साथ दिया। तमिलनाडु भी इसका ताजा उदाहरण है। यह बताता है कि मुस्लिम वोट किसी की जागीर नहीं है।

यूपी में करीब चार करोड़ मुसलमान हैं। इतना बड़ा समुदाय सिर्फ सोशल मीडिया वीडियो देखकर अपना राजनीतिक फैसला नहीं करता। वह जमीन पर काम भी देखता है। अपने सम्मान और सुरक्षा का सवाल भी देखता है। इसलिए सिर्फ कुछ चेहरों को आगे करके पूरी कौम की सोच बदलने का सपना शायद ही पूरा हो सके।

सरकारों को भी यह समझना होगा कि मुसलमानों तक पहुंचने का रास्ता सिर्फ प्रचार नहीं है। अगर शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और बराबरी पर ईमानदारी से काम होगा तो भरोसा अपने आप बनेगा। कुछ सोशल मीडिया चेहरों के जरिए वोट हासिल करने की रणनीति सीमित असर ही छोड़ सकती है।

लोकतंत्र में हर नागरिक की अपनी राजनीतिक समझ होती है। मुसलमान भी उसी लोकतंत्र का हिस्सा हैं। वे किसी पार्टी के स्थायी समर्थक नहीं हैं। उन्हें सम्मान, इंसाफ और भागीदारी चाहिए। जो यह देगा, समर्थन उसी को मिलेगा।