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लोकतंत्र और जनसरोकार: जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने चुनाव, हिंसा और महंगाई पर जताई गहरी चिंता

नई दिल्ली

देश के मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक हालात पर अपनी बेबाक राय रखते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (JIH) ने केंद्र और राज्य सरकारों को आईना दिखाया है। नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में आयोजित मासिक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जमाअत के शीर्ष नेतृत्व ने विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता, पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा, कमरतोड़ महंगाई और जानलेवा हीटवेव (लू) जैसे ज्वलंत मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।

जमाअत ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकारों को केवल सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि एक समावेशी और जन-केंद्रित एजेंडा अपनाकर देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।


चुनावी प्रक्रिया और हिंसा पर तीखे सवाल

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोअतसिम खान ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी के हालिया चुनाव परिणामों पर बात करते हुए लोकतंत्र की सेहत पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान जिस तरह से ध्रुवीकरण करने वाले विमर्श (Narratives) का इस्तेमाल किया गया, उसने देश के लोकतांत्रिक माहौल को प्रदूषित कर दिया है।

मुख्य चिंताएं:

  • संस्थागत पक्षपात: मलिक मोअतसिम खान ने मतदाता सूची में विसंगतियों, हाशिए पर पड़े समुदायों को मताधिकार से वंचित करने के आरोपों और प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव संपन्न कराने वाली संस्थाओं की निष्पक्षता पर संदेह जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
  • बंगाल हिंसा: जमाअत ने पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की कड़ी निंदा की। उपाध्यक्ष ने अधिकारियों से तत्काल कानून-व्यवस्था बहाल करने और हिंसा के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।
  • विभाजनकारी भाषा: असम जैसे राज्यों में धन-बल और विभाजनकारी भाषा के बढ़ते इस्तेमाल को लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बताया गया।

मलिक मोअतसिम खान ने विपक्षी दलों को भी नसीहत दी। उन्होंने कहा कि जो पार्टियाँ धर्मनिरपेक्षता का दावा करती हैं, वे आपसी फूट के कारण एकजुट मोर्चा बनाने में विफल रही हैं। उन्होंने विपक्ष से आह्वान किया कि वे केवल विरोध न करें, बल्कि एक रचनात्मक भूमिका निभाते हुए मुद्दों पर आधारित वैकल्पिक दृष्टिकोण पेश करें।


आर्थिक संकट: महंगाई की मार और ‘GST’ का सुझाव

प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए जमाअत के दूसरे उपाध्यक्ष प्रो. सलीम इंजीनियर ने देश में बढ़ती महंगाई पर डेटा और जमीनी हकीकत के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि LPG, बिजली और ईंधन की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने आम आदमी की क्रय शक्ति (Purchasing Power) को खत्म कर दिया है।

महंगाई रोकने के लिए जमाअत के सुझाव:

  1. पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाना: प्रो. सलीम ने सुझाव दिया कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए ईंधन को GST के तहत लाना चाहिए।
  2. कर कटौती: सरकार को तत्काल उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में कटौती करनी चाहिए और VAT को तर्कसंगत बनाना चाहिए ताकि मध्यम और निम्न आय वर्ग को राहत मिले।
  3. बाजार की निगरानी: जमाखोरी और कीमतों में कृत्रिम हेरफेर को रोकने के लिए सरकार को बाजार की कड़ी निगरानी करनी चाहिए।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रसद (Logistics) और आपूर्ति-पक्ष प्रबंधन में सुधार नहीं किया गया, तो खाद्य पदार्थों की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएंगी।


जलवायु संकट: हीटवेव और पर्यावरणीय असंतुलन

पर्यावरण के मुद्दे पर प्रो. सलीम इंजीनियर ने देश के बड़े हिस्से में चल रही प्रचंड लू (Heatwave) को एक गंभीर मानवीय संकट बताया। उन्होंने इसे केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि वनों की कटाई और अनियंत्रित शहरीकरण का परिणाम करार दिया।

उन्होंने सरकार से ‘हीट एक्शन प्लान’ को सख्ती से लागू करने की मांग की। विशेष रूप से बाहर काम करने वाले मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों और शहरी गरीबों के लिए पीने के पानी, छाया और स्वास्थ्य सुविधाओं को सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। जमाअत ने मांग की कि विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ काटने वाली परियोजनाओं की समीक्षा की जानी चाहिए और शहरी हरित आवरण (Green Cover) को बढ़ाया जाना चाहिए।


निष्कर्ष: समावेशी शासन की आवश्यकता

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद का यह संबोधन इस बात पर केंद्रित रहा कि देश इस समय बेरोजगारी, आर्थिक मंदी और सामाजिक न्याय जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। प्रतीकवाद (Symbolism) की राजनीति के बजाय ठोस कार्रवाई का समय है। जमाअत ने जोर दिया कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब चुनाव निष्पक्ष होंगे, संस्थाएं स्वतंत्र होंगी और सरकारें हर नागरिक के विकास के लिए बिना किसी भेदभाव के काम करेंगी।

जमाअत ने केंद्र और राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वे प्रतीकात्मक घोषणाओं के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर ठोस ध्यान दें, ताकि देश को इस बहुआयामी संकट से बाहर निकाला जा सके।

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