गाय की सियासत: दारुल उलूम के दांव से उलझी राजनीति, राष्ट्रीय पशु की मांग ने बदला विमर्श
मुस्लिम नाउ संपादकीय
देश में ‘गाय की सियासत’ करने वालों के सामने अचानक एक नया संकट खड़ा हो गया है। दारुल उलूम देवबंद के जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के एक ताजा बयान ने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। मौलाना मदनी ने सीधे तौर पर गाय को राष्ट्रपशु घोषित करने की मांग उठा दी है। इस एक बयान ने उन ताकतों को बैकफुट पर ला दिया है जो अब तक इस मुद्दे पर केवल एकतरफा राजनीति करती आई थीं। हालत यह है कि इस बयान के बाद पैदा हुई बौखलाहट में अब दारुल उलूम देवबंद के नीचे मंदिर होने जैसे अजीबोगरीब दावे किए जाने लगे हैं।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब भाजपा और आरएसएस के करीबी माने जाने वाले जफर सरेशवाला ने मुसलमानों से अपील की। उन्होंने 1955 के देवबंद के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए मुसलमानों से बकरीद पर गाय की कुर्बानी से परहेज करने को कहा। इसके जवाब में मौलाना अरशद मदनी ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर दिया। उन्होंने केवल परहेज की बात नहीं की बल्कि सरकार से मांग की कि वह कानून बनाकर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे। इसके साथ ही उन्होंने गाय की तस्करी, खरीद-बिक्री और इसके वध में शामिल सभी लोगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की वकालत भी कर दी।
#DarulUloom #Deoband had issued a Directive in 1955:”In the interest of Peace ✌️CoExistence between Communities We advise #Muslims to Refrain from offering #Cow for Sacrifice during #EidAlAdha & Otherwise because Alternatives are Available”Lets abide by it in Letter & Spirit
— zafar sareshwala 🇮🇳 (@zafarsareshwala) May 18, 2026
इस बयान को केवल एक मौलाना की व्यक्तिगत राय मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। कोलकाता की ऐतिहासिक नाखूदा मस्जिद के इमाम मौलाना मुहम्मद शफीक कासमी ने भी इसका खुलकर समर्थन किया है। इतना ही नहीं, हिंदू धर्मगुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी मौलाना मदनी के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं। इस तरह इस मुद्दे ने एक नया मोड़ ले लिया है जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के बड़े चेहरे एक ही मांग पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।
क्या वाकई मुसलमानों को होगा कोई नुकसान?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू आर्थिक और सामाजिक सच है। अगर देश में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाता है और इसके गोश्त पर पूरी तरह प्रतिबंध लगता है, तो इससे आम मुसलमान को कोई आर्थिक घाटा नहीं होने वाला है। इसके पीछे कुछ बेहद ठोस जमीनी कारण हैं:
- पशुपालन का गणित: भारत में नाममात्र के मुस्लिम ही गाय पालने के व्यवसाय में हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में पशुपालन का मुख्य काम यादव और गुर्जर जैसी गैर-मुस्लिम जातियां ही करती हैं।
- विकल्प की मौजूदगी: देश के जिन हिस्सों में गोमांस पर पाबंदी लगी है, वहां के मुस्लिम समाज ने बहुत पहले ही भैंस के मांस को एक सामान्य विकल्प के रूप में अपना लिया है।
- निर्यात उद्योग का सच: भारत से विदेशों और विशेषकर खाड़ी देशों को बड़े पैमाने पर भैंस के मांस का निर्यात किया जाता है। पिछले एक दशक में इन मुस्लिम देशों से भारत के संबंध सुधरे हैं जिससे यह व्यापार और बढ़ा है। चौंकाने वाला सच यह है कि देश के अधिकांश बड़े मांस निर्यातक (एक्सपोर्टर) गैर-मुस्लिम समाज से ही आते हैं।
यही वजह है कि जैसे ही मुस्लिम विद्वानों ने खुद आगे बढ़कर गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग की, राजनीति करने वालों के समीकरण बिगड़ गए। जो लोग इस मुद्दे पर ध्रुवीकरण की जमीन तलाशते थे, वे अब खुद असमंजस में हैं कि इस मांग का विरोध कैसे करें।
कोलकाता के इमाम की अपील और व्यावहारिक चुनौतियां
नाखूदा मस्जिद के इमाम मौलाना मुहम्मद शफीक कासमी ने इस पूरे माहौल में एक बेहद व्यावहारिक और शांतिपूर्ण रास्ता सुझाया है। उन्होंने एक विशेष बातचीत में साफ कहा कि अगर किसी जानवर या कुर्बानी को लेकर समाज में लगातार विवाद पैदा होता है, तो मुसलमानों को गोमांस खाना पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। उनका कहना है कि एक अच्छा मुसलमान शाकाहारी भोजन, मछली, चिकन या बकरे का मांस खाकर भी गरिमा के साथ रह सकता है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय से अपने हिंदू भाइयों की धार्मिक भावनाओं का पूरा सम्मान करने की अपील की है।
#WATCH | Kolkata, West Bengal | On West Bengal CM Suvendu Adhikari's call for stricter laws on mic and loudspeaker, Imam of Nakhoda Masjid Maulana Mohammad Shafiq Qasmi says, “This rule was not made by the BJP government but by the Pollution Control Board… As per the law, there… pic.twitter.com/7eZyyfnCUv
— ANI (@ANI) May 17, 2026
इसके साथ ही मौलाना कासमी ने केंद्र और राज्य सरकारों के सामने कुछ जरूरी मांगें भी रखी हैं:
- सरकार पूरे देश में गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दे।
- गोवंश की खरीद, बिक्री, वध और इसके मांस के निर्यात पर देशव्यापी पूर्ण प्रतिबंध लगे।
- केवल किसी एक समुदाय को निशाना बनाने के बजाय देश के सभी बड़े बूचड़खानों को बंद किया जाए, क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े मांस निर्यातकों में शामिल है।
मौलाना कासमी ने यह भी स्पष्ट किया कि पशु वध से जुड़े कानून देश में साल 1950 से ही लागू हैं। बुनियादी फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले की सरकारें इन नियमों को लेकर थोड़ी नरम थीं, जबकि वर्तमान प्रशासन इन्हें बेहद सख्ती से लागू कर रहा है। उन्होंने कानून के दायरे में रहकर ही सभी धार्मिक दायित्वों को पूरा करने की सलाह दी है।
#WATCH | Kolkata: West Bengal government minister Dilip Ghosh said, "What does this have to do with any party? This is a matter concerning those who make sacrifices. Imams are religious figures. Their opinion should be paramount; work should be done according to the country's… pic.twitter.com/E6x7v1jH7L
— ANI (@ANI) May 23, 2026
हालांकि, उन्होंने कुछ व्यावहारिक दिक्कतों की तरफ भी इशारा किया। मौजूदा सरकारी नियमों के अनुसार, कुर्बानी के लिए लाए जाने वाले जानवर की उम्र कम से कम 14 वर्ष होनी चाहिए। इसके लिए सरकारी पशु चिकित्सक से स्वास्थ्य और उम्र का प्रमाणपत्र लेना जरूरी है। वध भी केवल अधिकृत बूचड़खानों में ही हो सकता है। मौलाना कासमी के अनुसार, कोलकाता जैसे बड़े महानगरों में भी सरकारी डॉक्टरों और अधिकृत बूचड़खानों की भारी कमी है। ऐसी स्थिति में आम आदमी के लिए कागजी औपचारिकताएं पूरी करना लगभग असंभव हो जाता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि नियम लागू करने से पहले बुनियादी सुविधाएं भी तैयार की जाएं।
गाय को ‘‘राष्ट्रीय पशु’’ घोषित करने से सरकार आखिर क्यों बच रही है? गाय के नाम पर मॉब लिंचिंग, बेगुनाह इंसानों की हत्या और नफ़रत की राजनीति अब बंद होनी चाहिए!
— Arshad Madani (@ArshadMadani007) May 21, 2026
जमीयत उलमा-ए-हिंद की केवल इतनी मांग है कि गाय को ‘‘राष्ट्रीय पशु’’ का दर्जा देकर इस विवाद का स्थायी समाधान निकाला जाए।… pic.twitter.com/XxAea8VIBi
बौखलाहट की राजनीति और संतों की ललकार
मुस्लिम नेतृत्व के इस बदले रुख से वह राजनीतिक खेमा पूरी तरह असहज हो गया है जो अब तक इस मुद्दे पर रोटियां सेकता था। इसी बौखलाहट का नतीजा है कि हिंदू रक्षा दल जैसे संगठनों ने अब एक नया मोर्चा खोल दिया है। इस संगठन ने दावा किया है कि दारुल उलूम देवबंद की इमारत के 14 फीट नीचे भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर वहां खुदाई कराने की मांग तक कर डाली है। संगठन के पदाधिकारियों ने यहां तक कह दिया कि यदि उनका दावा गलत साबित हो, तो उन्हें भ्रामक जानकारी फैलाने के आरोप में फांसी दे दी जाए। वरिष्ठ विश्लेषक इसे मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने की एक हताश कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
दूसरी तरफ, ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने इस मामले में सीधे उन ताकतों को ललकारा है जो गाय के नाम पर सत्ता में आईं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मौलाना मदनी की मांग का समर्थन करते हुए सरकार पर तीखे हमले किए हैं। उनका कहना है कि जो लोग गाय की राजनीति करके ऊंचे पदों पर बैठे हैं, वे आज गाय की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। देश की तमाम सरकारी और गैर-सरकारी गौशालाओं में गाएं भूख और प्यास से तड़प-तड़प कर मर रही हैं, लेकिन सत्ता में बैठे लोग उधर मुड़कर भी नहीं देख रहे हैं।
इस बीच राजनीतिक दलों के बयान भी इस उलझन को बयां कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री दिलीप घोष ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इसका किसी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इमाम धार्मिक हस्ती हैं और उनकी राय का सम्मान होना चाहिए। देश का काम कानून के अनुसार चलना चाहिए और गो-हत्या के खिलाफ जो कानून पहले से बने हैं, सरकार बस उन्हें ही ईमानदारी से लागू करने की जिम्मेदारी निभा रही है।
“दारुल उलूम देवबंद के 14 फीट नीचे शिव का मंदिर है!”
— Muslim Spaces (@MuslimSpaces) May 22, 2026
हिंदू रक्षा दल ने यह दावा किया और सहारनपुर, उत्तर प्रदेश के DM को ज्ञापन देकर खुदाई की मांग कर डाली है! HRD के पदाधिकारी ने यह भी कहा कि उसकी बात अगर गलत साबित हो जाए तो "भ्रामक" जानकारी फैलाने के आरोप में उसको फांसी दे दी जाए! pic.twitter.com/wNDCZWx4Q6
कुल मिलाकर, मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का कार्ड खेलकर गेंद सरकार और उन संगठनों के पाले में डाल दी है जो अब तक इस मुद्दे को केवल चुनावी लाभ के लिए जिंदा रखना चाहते थे। अब देखना यह है कि क्या सरकार इस मांग को स्वीकार कर देश में गोवंश के नाम पर होने वाली राजनीति को हमेशा के लिए खत्म करेगी।

