क्या ‘देवभूमि’ में तंग हो रही है मुसलमानों के लिए जमीन? APCR की रिपोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
उत्तराखंड, जिसे दुनिया ‘देवभूमि’ के नाम से जानती है, वहां से आई एक नवीनतम रिपोर्ट ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे और सामाजिक ताने-बाने पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। ‘एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स’ (APCR) द्वारा जारी 56 पन्नों की इस विस्तृत रिपोर्ट में 2021 से लेकर 2025 के उत्तरार्ध तक की घटनाओं का काला चिट्ठा पेश किया गया है।
यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि उन आंसुओं और उजड़ते घरों की गवाही है, जो पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के शांत पहाड़ों में नफरत की राजनीति की भेंट चढ़ गए हैं। रिपोर्ट का सार यह है कि उत्तराखंड में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा अब ‘इक्का-दुक्का’ घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि इसे राजनीति के एक नियमित औज़ार के रूप में ‘नॉर्मलाइज़’ (सामान्य) कर दिया गया है।

व्यवस्थित निशाना: एक सोची-समझी रणनीति?
एपीसीआर की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाना किसी गलतफहमी का नतीजा नहीं है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि चाहे वह पुरोला से मुस्लिम परिवारों का पलायन हो या दशकों पुरानी मजारों का ढहाया जाना, इन सबके पीछे एक साझा सूत्र (Common Thread) काम कर रहा है।
प्रमुख निष्कर्ष और आंकड़े:
- समय सीमा: रिपोर्ट 2021 से 2025 के बीच की घटनाओं का विश्लेषण करती है।
- आर्थिक बहिष्कार: उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली और गैरसैंण जैसे जिलों में मुस्लिम दुकानदारों के खिलाफ संगठित आर्थिक बहिष्कार देखा गया।
- बुलडोजर कार्रवाई: ‘लैंड जिहाद’ और ‘मजार जिहाद’ के नाम पर मई 2024 तक लगभग 5,000 एकड़ भूमि “मुक्त” कराने का दावा किया गया है। इसमें सदियों पुरानी धार्मिक संरचनाएं भी शामिल थीं।
- कानूनी कार्रवाई में पक्षपात: चमोली में एक घटना के बाद लगभग 500 अज्ञात व्यक्तियों पर मामला दर्ज किया गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर मुस्लिम दुकानदारों को ही निशाना बनाया गया।
पुरोला से गैरसैंण तक: नफरत का विस्तार
रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 की पुरोला घटना एक टर्निंग पॉइंट थी। एक तथाकथित ‘लव जिहाद’ के आरोप (जो बाद में असत्य पाए गए) के बाद मुस्लिम परिवारों को अपनी दुकानें और घर छोड़कर भागने पर मजबूर किया गया।
यही पैटर्न अन्य जिलों में भी दोहराया गया:
- नंदा घाट: छेड़छाड़ के एक आरोप के बाद 15 मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की गई।
- गौचर: पार्किंग को लेकर हुए एक मामूली विवाद के बाद 10 मुस्लिम दुकानदारों को बेदखल कर दिया गया।
- गैरसैंण: 2024 में एक व्यापार मंडल ने अल्टीमेटम जारी किया कि मुसलमान 31 दिसंबर तक इलाका छोड़ दें।
“यह रिपोर्ट उन लोगों की नैतिकता को झकझोरती है जो पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की चिंता तो करते हैं, लेकिन अपने ही देश के एक राज्य में ‘ज़मीन तंग’ किए जाने पर खामोश रहते हैं।”
विवादास्पद विमर्श और ‘बाहरी’ का ठप्पा
उत्तराखंड में रहने वाले अधिकांश मुसलमान उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद जैसे इलाकों से 1970 और 80 के दशक में आए थे। उस समय उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश एक ही राज्य थे। रिपोर्ट बताती है कि 2000 में राज्य बनने से बहुत पहले से वहां रह रहे इन लोगों को अब “बाहरी” (Outsiders) करार देकर निशाना बनाया जा रहा है।
नफरती विमर्श (Hate Narratives):
शासन और दक्षिणपंथी समूहों द्वारा ‘थूक जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’ और ‘मजार जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर एक भय का माहौल बनाया गया है। 2021 के हरिद्वार धर्म संसद में दिए गए भड़काऊ भाषणों ने इस आग में घी डालने का काम किया, जहां खुलेआम नरसंहार और ‘हिंदुत्व राष्ट्र’ की अपील की गई थी।

विधायी बदलाव: क्या कानून भी बन रहा है हथियार?
रिपोर्ट में 2024 और 2025 के विधायी संशोधनों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है, जिन्हें अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक पहचान को खत्म करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है:
| कानून | मुख्य चिंताएं |
| समान नागरिक संहिता (UCC) 2024 | अल्पसंख्यकों के व्यक्तिगत कानूनों (निकाह, विरासत) को ओवरराइड करना। |
| UCC संशोधन विधेयक 2025 | लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण न होने पर 7 साल तक की जेल। |
| धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक 2025 | “जबरन धर्म परिवर्तन” के लिए आजीवन कारावास तक की सजा और ‘प्रलोभन’ की अस्पष्ट परिभाषा। |
| अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान विधेयक | मदरसों को राज्य बोर्ड से संबद्ध करना अनिवार्य, अन्यथा उन्हें बंद कर दिया जाएगा। |
प्रशासनिक विफलता और भविष्य की चिंता
एपीसीआर का कहना है कि सबसे खतरनाक बात हिंसा नहीं, बल्कि प्रशासन का पक्षपाती रवैया है। जब पुलिस मुस्लिम विक्रेताओं को धमकी देने वालों के खिलाफ FIR दर्ज नहीं करती, या जब राजनेता आपदाओं की तुलना ‘बुलडोजर’ से करते हैं, तो यह समाज में नफरत को ‘वैध’ बनाने जैसा है।
निष्कर्ष:
यदि एपीसीआर की यह रिपोर्ट सत्य है, तो यह केंद्र और राज्य सरकार के लिए आत्ममंथन का समय है। भारत को ‘सोने की चिड़िया’ बनाने का सपना तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक समाज का एक हिस्सा डर के साये में जीने को मजबूर हो। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि नफरत की इस राजनीति को नहीं रोका गया, तो उत्तराखंड की सामाजिक शांति भंग होना तय है, जिसका असर पूरे देश की प्रगति पर पड़ेगा।
लोकतंत्र में ‘कानून का शासन’ (Rule of Law) सबके लिए बराबर होना चाहिए। क्या सरकार इस रिपोर्ट पर स्थिति स्पष्ट करेगी, या फिर पहाड़ों की वादियों में गूँजती ये सिसकियाँ अनसुनी रह जाएंगी?

