संघ-बीजेपी में रिटायरमेंट बहस फिर ज़िंदा, मोहन भागवत की सफ़ाई के क्या मायने?
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी में 75 वर्ष की उम्र को लेकर चली आ रही ‘अलिखित परंपरा’ एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। सवाल वही पुराना है, लेकिन संदर्भ नए हैं—क्या 75 वर्ष की उम्र पार करने के बाद पद छोड़ने का नियम सिर्फ़ कुछ नेताओं पर लागू होता है या यह संगठनात्मक सिद्धांत है? और अगर नहीं, तो फिर बार-बार सफ़ाई देने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?
यह बहस उस समय और तेज़ हो गई जब स्वयं मोहन भागवत ने सार्वजनिक मंच से कहा कि उन्होंने 75 वर्ष की उम्र पूरी होने की सूचना संघ को दे दी थी, लेकिन संगठन ने उनसे काम जारी रखने को कहा है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा—“जब भी आरएसएस मुझसे पद छोड़ने को कहेगा, मैं पद छोड़ दूंगा, लेकिन काम से कभी सेवानिवृत्त नहीं होऊंगा।”
मोदी, भागवत और 75 का सवाल
दरअसल, यह मुद्दा केवल आरएसएस प्रमुख तक सीमित नहीं है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, भारतीय जनता पार्टी ने 75 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले दिग्गज नेताओं को सक्रिय राजनीति से किनारे किया था। मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेताओं को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में भेज दिया गया—एक ऐसा मंच, जिसे सम्मानजनक सेवानिवृत्ति के तौर पर देखा गया।
आज स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी इस उम्र को पार किए कई वर्ष हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या वही कसौटी अब शीर्ष नेतृत्व पर भी लागू होगी, या फिर नियम परिस्थिति और व्यक्ति के अनुसार बदल जाते हैं?
‘बिना आग के धुआं नहीं’
हालांकि पार्टी और संघ की ओर से इस विषय पर कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से बार-बार सफ़ाई दी जा रही है, उससे राजनीतिक गलियारों में कयास तेज़ हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जब किसी मुद्दे पर बार-बार जवाब देना पड़े, तो उसका मतलब यही होता है कि अंदरखाने कुछ चल रहा है।
इसी कड़ी में मोहन भागवत का हालिया बयान अहम माना जा रहा है। उन्होंने न सिर्फ़ उम्र के सवाल पर स्थिति स्पष्ट की, बल्कि संघ की कार्यशैली, नेतृत्व चयन और वैचारिक दृष्टिकोण पर भी खुलकर बात की।
संघ प्रमुख का चयन: न चुनाव, न प्रचार
भागवत ने स्पष्ट किया कि आरएसएस प्रमुख के पद के लिए कोई चुनाव नहीं होता। क्षेत्रीय और मंडल स्तर के वरिष्ठ पदाधिकारी ही संघ प्रमुख की नियुक्ति करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आम तौर पर संघ में यह माना जाता है कि 75 वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति को औपचारिक पद पर नहीं रहना चाहिए, लेकिन यह कोई कठोर नियम नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक सिद्धांत है।
उनके शब्दों में, “मैंने अपनी उम्र की सूचना दी, लेकिन संगठन ने कहा कि काम जारी रखिए। जब संगठन कहेगा, मैं पद छोड़ दूंगा।”
हिंदू होना ज़रूरी, जाति नहीं
भागवत ने संघ नेतृत्व को लेकर एक और अहम बयान दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस प्रमुख का हिंदू होना ज़रूरी है, लेकिन उसकी जाति कोई मायने नहीं रखती। उन्होंने साफ़ किया कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होना किसी भी तरह की अयोग्यता नहीं है, और न ही ब्राह्मण होना नेतृत्व की गारंटी।
उन्होंने संघ के शुरुआती इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि संघ की शुरुआत ब्राह्मण-बहुल इलाक़ों में हुई थी, इसलिए शुरुआती नेतृत्व में ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी। लेकिन आज संघ के शीर्ष नेतृत्व में लगभग सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व है।
‘संघ कभी किसी को रिटायर नहीं करता’
हल्के-फुल्के अंदाज़ में भागवत ने कहा कि संघ अपने स्वयंसेवकों से “खून के आख़िरी कतरे तक काम लेता है” और संगठन के इतिहास में कभी किसी को औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त नहीं किया गया। यह कथन भले ही मज़ाकिया लगे, लेकिन इसके राजनीतिक मायने गहरे हैं—संघ में पद से ज़्यादा महत्व काम का है।
राजनीति नहीं, संस्कार
भागवत ने यह भी दोहराया कि आरएसएस का मुख्य काम चुनाव प्रचार नहीं, बल्कि समाज में संस्कारों का निर्माण है। उन्होंने माना कि संघ प्रचार के मामले में पिछड़ गया है और अत्यधिक प्रचार से अहंकार का ख़तरा रहता है। उनके अनुसार, प्रचार “बारिश की तरह” होना चाहिए—न ज़्यादा, न कम।
उन्होंने यह भी कहा कि संघ अंग्रेज़ी को कभी अपना मुख्य संचार माध्यम नहीं बनाएगा, क्योंकि यह भारतीय भाषा नहीं है। हालांकि, ज़रूरत पड़ने पर अंग्रेज़ी के इस्तेमाल से संघ को कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने ज़ोर दिया कि अंग्रेज़ी पर पकड़ ज़रूरी है, लेकिन मातृभाषा की क़ीमत पर नहीं।
मुस्लिम समाज, विरोध और संघ
मुस्लिम समुदायों में संघ के काम को लेकर उठने वाले सवालों पर भागवत ने कहा कि अगर दोनों पक्ष एक-दूसरे का विरोध ही करते रहेंगे, तो टकराव के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। उनके अनुसार, आरएसएस किसी जाति या समुदाय के आधार पर नहीं, बल्कि भौगोलिक आधार पर काम करता है।
उन्होंने कहा, “अगर किसी क्षेत्र की आबादी 10 हज़ार है, तो हम वहां काम करते हैं। जब भौगोलिक रूप से पहुंच बनेगी, तो सभी समुदायों तक पहुंच अपने-आप हो जाएगी।”
भ्रष्टाचार पर रुख
भागवत ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी संघ की स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि आरएसएस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानूनों का समर्थन करता है और जो भी इसके ख़िलाफ़ लड़ता है, संघ उसके साथ खड़ा रहेगा। उनके मुताबिक, भ्रष्टाचार व्यवस्था से ज़्यादा लोगों की सोच में है।
तो असली सवाल क्या है?
इस पूरी बहस का सार यही है कि 75 वर्ष की उम्र को लेकर संघ-बीजेपी में कोई लिखित नियम नहीं, लेकिन एक परंपरा ज़रूर है। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि यह परंपरा कब, किस पर और कैसे लागू होगी—यह फ़ैसला सत्ता और संगठन की ज़रूरतें तय करती हैं।
मोहन भागवत की सफ़ाई और नरेंद्र मोदी को लेकर उठते सवाल यही संकेत देते हैं कि आने वाले समय में संघ और बीजेपी के भीतर नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर चर्चाएं और तेज़ होंगी। सवाल यह नहीं है कि कौन 75 के बाद पद पर रहेगा, बल्कि यह है कि सत्ता और संगठन अपने ही बनाए मानदंडों पर कितनी ईमानदारी से खरे उतरते हैं।

