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बिहार का वो गुमनाम सितारा जिसने दुनिया को सिखाया नहाना: मिलिए ‘Shampooing किंग’ शेख दीन मोहम्मद से

मुस्लिम नाउ विशेष

बिहार की राजनीति में पिछले एक दशक से जारी उठापटक ने भले ही राज्य की छवि को केवल ‘सियासी अखाड़े’ तक सीमित कर दिया हो, लेकिन इस मिट्टी का गौरवशाली इतिहास आज भी दुनिया की रगों में दौड़ रहा है। आज जब आप सुबह अपने बालों में शैम्पू (Shampooing) लगाते हैं, तो शायद ही आपको पता हो कि इस ‘जादू’ को सात समंदर पार तक पहुँचाने वाला शख्स एक बिहारी था।

हम बात कर रहे हैं पटना के शेख दीन मोहम्मद की। एक ऐसी शख्सियत जिन्होंने न केवल दुनिया को ‘शैम्पू’ दिया, बल्कि वे अंग्रेजी में किताब लिखने वाले पहले भारतीय भी बने। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सिर की मालिश (Shampooing) को एक रिलैक्सिंग थेरेपी बनाने का श्रेय इसी भारतीय एंटरप्रेन्योर को जाता है।

पटना की गलियों से लंदन के शाही महल तक का सफर

शेख दीन मोहम्मद का जन्म 1759 में पटना के दीवान मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में थे। जब दीन मोहम्मद महज 11 साल के थे, तब उनके पिता का साया सिर से उठ गया। इसके बाद कैप्टन इवान बेकर नाम के एक ब्रिटिश अधिकारी ने उन्हें अपने संरक्षण में लिया। दीन मोहम्मद ने सेना में एक ट्रेनी सर्जन के रूप में काम करना शुरू किया और कई लड़ाइयों का अनुभव लिया।

1782 में जब कैप्टन बेकर ने इस्तीफा दिया, तो दीन मोहम्मद भी उनके साथ आयरलैंड चले गए। वहां उन्होंने स्थानीय स्कूल में पढ़ाई की और उन्हें जेन डेली नाम की एक आयरिश लड़की से प्यार हो गया। उस दौर में धर्म की दीवारें ऊंची थीं, इसलिए उन्होंने ईसाई धर्म अपनाकर अपना नाम ‘साके डीन महोमेद’ रख लिया।

अंग्रेजी साहित्य में रचा इतिहास

साके डीन महोमेद केवल एक कारोबारी नहीं थे, बल्कि एक प्रखर लेखक भी थे। 1794 में उन्होंने ‘द ट्रैवल्स ऑफ डीन महोमेट’ नाम से अपना यात्रा वृत्तांत प्रकाशित किया। यह किसी भी भारतीय द्वारा अंग्रेजी भाषा में लिखी गई पहली किताब थी। इस किताब के जरिए उन्होंने पश्चिमी दुनिया को भारतीय शहरों, यहां की संस्कृति और अपने निजी अनुभवों से रूबरू कराया। यह उस दौर में एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि तब गोरे लोग केवल अपनी नजर से भारत को देखते थे।

लंदन का पहला भारतीय रेस्टोरेंट: ‘हिंदुस्तानी कॉफी हाउस’

1810 में दीन मोहम्मद ने लंदन के सेंट्रल इलाके में ‘हिंदुस्तानी कॉफी हाउस’ खोला। यह ब्रिटेन का पहला भारतीय मालिकाना हक वाला रेस्टोरेंट था। उन्होंने ब्रिटिश लोगों के भारतीय खाने के प्रति लगाव को भांप लिया था। उस वक्त के रिकॉर्ड बताते हैं कि वहां असली चिलम, हुक्का और ऐसी करी मिलती थी जिसका स्वाद पूरे इंग्लैंड में बेजोड़ था। हालांकि, यह रेस्टोरेंट ज्यादा समय तक नहीं चल पाया और घाटे के कारण उन्हें दिवालिया घोषित होना पड़ा।

कैसे बने दुनिया के ‘शैम्पू सर्जन’?

असफलता के बाद भी दीन मोहम्मद ने हार नहीं मानी। उन्होंने गौर किया कि ब्रिटिश लोग भारतीय मालिश और भाप स्नान (Steam Bath) को बहुत पसंद करते हैं। 1814 में उन्होंने इंग्लैंड के ब्राइटन में एक ‘बाथहाउस’ खोला। उन्होंने वहां ‘हर्बल वेपर बाथ’ और भारतीय चंपी (Champi) की शुरुआत की। इसी ‘चंपी’ शब्द से आगे चलकर ‘शैम्पू’ शब्द बना।

शुरुआत में मेडिकल कम्युनिटी ने उनका बहुत मजाक उड़ाया। उन्हें ‘धोखेबाज’ और उनके इलाज को ‘हिंदू जुगाड़’ कहा गया। लेकिन दीन मोहम्मद डटे रहे। उन्होंने मरीजों को मुफ्त सेवाएं दीं। धीरे-धीरे लोगों को उनकी मालिश से मांसपेशियों के दर्द में आराम मिलने लगा। उनकी शोहरत इतनी बढ़ी कि ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज IV ने उन्हें अपना ‘रॉयल शैम्पू सर्जन’ नियुक्त किया। यह सिलसिला अगले राजा किंग विलियम IV के समय भी जारी रहा।

बिहार के इस सपूत को भूल गया देश

शेख दीन मोहम्मद का निधन 1851 में ब्राइटन में हुआ। आज गूगल भी उनकी जयंती पर डूडल बनाकर उन्हें याद करता है, लेकिन उनके अपने राज्य बिहार में उनके नाम की चर्चा कम ही होती है। वे एक ऐसे पुल थे जिन्होंने पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों को जोड़ा। उन्होंने साबित किया कि एक बिहारी अपनी बुद्धि और उद्यमिता के दम पर दुनिया की सबसे शक्तिशाली सल्तनत के राजा को भी अपना मुरीद बना सकता है।

आज जरूरत है कि हम राजनीति के शोर से बाहर निकलकर अपने ऐसे नायकों को पहचानें। शेख दीन मोहम्मद की कहानी हमें सिखाती है कि साधन कम होने पर भी अगर जज्बा बड़ा हो, तो इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया जा सकता है।

शेख दीन मोहम्मद के जीवन के रोचक किस्से


किस्सा नंबर 1: जब एक ‘बिहारी’ ने लंदन को पहली बार करी का स्वाद चखाया

साल 1810 की बात है। लंदन के पॉश इलाके पोर्टमैन स्क्वायर के पास एक नया बोर्ड लगा— हिंदुस्तानी कॉफी हाउस’। यह लंदन का पहला ऐसा रेस्टोरेंट था, जिसका मालिक कोई अंग्रेज नहीं बल्कि पटना का एक भारतीय था। दीन मोहम्मद ने वहां सिर्फ खाना ही नहीं परोसा, बल्कि ‘हुक्का’ और ‘चिलम’ के साथ एक पूरा माहौल तैयार किया। उस दौर के अखबारों ने लिखा था कि जो लोग असली भारतीय जायके की तलाश में हैं, उनके लिए दीन मोहम्मद का यह ठिकाना किसी जन्नत से कम नहीं। हालांकि, यह रेस्टोरेंट बाद में बंद हो गया, लेकिन इसने आज के वैश्विक ‘इंडियन करी’ उद्योग की नींव रख दी थी।


किस्सा नंबर 2: ‘चंपी’ से ‘शैम्पू’ बनने का दिलचस्प सफर

क्या आप जानते हैं कि ‘शैम्पू’ शब्द असल में हिंदी के चांपो’ या ‘चंपी’ (मालिश) से निकला है? दीन मोहम्मद जब इंग्लैंड पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां के लोग नहाने के नाम पर सिर्फ साबुन का इस्तेमाल करते थे। उन्होंने भारतीय जड़ी-बूटियों और तेलों का इस्तेमाल करके सिर की मालिश की एक नई विधि शुरू की। उन्होंने इसे ‘शैम्पूइंग’ (Shampooing) का नाम दिया। देखते ही देखते यह इतना मशहूर हुआ कि लोग इसे बीमारियों का इलाज मानने लगे। आज पूरी दुनिया में बिकने वाले अरबों डॉलर के शैम्पू का इतिहास इसी एक बिहारी के ‘चंपी’ से शुरू होता है।


किस्सा नंबर 3: जब अंग्रेजों ने उन्हें कहा ‘धोखेबाज’

दीन मोहम्मद की सफलता से लंदन के कई डॉक्टर जलने लगे थे। उन्होंने अखबारों में उनके खिलाफ अभियान चलाया और उनके बाथहाउस को ‘धोखा’ बताया। डॉक्टरों का कहना था कि भाप से नहाना और मालिश करना भला किसी बीमारी को कैसे ठीक कर सकता है? लेकिन दीन मोहम्मद घबराए नहीं। उन्होंने हार मानने के बजाय चुनौती दी कि वे उन मरीजों को ठीक करके दिखाएंगे जिन्हें डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। जब गठिया (Arthritis) के मरीज उनके ‘वेपर बाथ’ से ठीक होकर नाचने लगे, तो पूरी मेडिकल कम्युनिटी का मुंह बंद हो गया।


किस्सा नंबर 4: राजा के ‘शाही सर्जन’ बनने का गौरव

दीन मोहम्मद की शोहरत जब सातवें आसमान पर पहुंची, तो ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज चतुर्थ (King George IV) तक इसकी गूँज गई। राजा खुद उनसे मालिश कराने ब्राइटन पहुंचे। राजा इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने दीन मोहम्मद को अपना रॉयल शैम्पू सर्जन’ घोषित कर दिया। यह किसी भी भारतीय के लिए उस दौर में सबसे बड़ा सम्मान था। ताज्जुब की बात यह है कि वे दो-दो ब्रिटिश राजाओं के शाही सर्जन रहे। आज भी ब्राइटन के म्यूजियम में उनकी तस्वीरें और उनके योगदान के किस्से बड़े गर्व से सुनाए जाते हैं।


किस्सा नंबर 5: प्यार के लिए बदला मजहब और नाम

दीन मोहम्मद की निजी जिंदगी भी किसी फिल्म से कम नहीं थी। जब वे आयरलैंड में थे, तो उन्हें एक कुलीन परिवार की लड़की जेन डेली से प्यार हो गया। उस समय एक भारतीय और एक गोरी लड़की का रिश्ता लगभग नामुमकिन था। अपने प्यार को पाने के लिए दीन मोहम्मद ने न केवल ईसाई धर्म अपनाया, बल्कि अपना नाम भी बदलकर ‘साके डीन महोमेद’ कर लिया। उनके इस साहसी कदम ने साबित किया कि वे सिर्फ व्यापार में ही नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत जीवन में भी क्रांतिकारी सोच रखते थे।