एआर रहमान को ट्रोल करना, भारत के सॉफ्ट पावर पर हमला
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
बॉलीवुड में पिछले कुछ वर्षों से स्तरीय और संवेदनशील सिनेमा का लगातार अभाव महसूस किया जा रहा है। जो फिल्में बन भी रही हैं, उनमें या तो कश्मीर फाइल्स, बंगाल फाइल्स, धुरंधर जैसी स्पष्ट रूप से प्रचारात्मक (प्रोपेगेंडा) रचनाएँ देखने को मिलती हैं, या फिर खुद को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए जासूसी एजेंटों और सैन्य कार्रवाइयों पर आधारित बड़े बजट की फिल्में। इस माहौल में एक तटस्थ, स्वतंत्र सोच रखने वाले कलाकार के लिए क्या बॉलीवुड में काम मिल पाना संभव है? इसका उत्तर, दुर्भाग्य से, अक्सर “नहीं” में ही मिलता है।
इसी सच्चाई की ओर इशारा भारत के प्रख्यात संगीतकार और ऑस्कर विजेता ए.आर. रहमान ने हाल ही में बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में किया। लेकिन उनकी इस ईमानदार टिप्पणी के बाद जिस तरह से ट्रोलर्स, सोशल मीडिया यूज़र्स और तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ उनके पीछे पड़ गई, उसने रचनात्मक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। कोई कहने लगा कि अगर भारत में काम नहीं मिल रहा तो पाकिस्तान चले जाओ, तो कोई यह आरोप लगाने लगा कि ए.आर. रहमान ‘हिंदू-मुस्लिम कार्ड’ खेल रहे हैं।

असलियत यह है कि शाहरुख़ ख़ान और ए.आर. रहमान जैसे कलाकार केवल फिल्मी सितारे या संगीतकार भर नहीं हैं, बल्कि वे भारत की सॉफ्ट पावर के सबसे मज़बूत स्तंभ हैं। विदेशों में इन्हें असाधारण सम्मान और आदर के साथ देखा जाता है, और इससे भारत की छवि एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, बहुलतावादी और रचनात्मक देश के रूप में मज़बूत होती है। ऐसे में इन कलाकारों की बात समझने और उन्हें संरक्षित करने के बजाय उन्हें ‘देशद्रोही’ ठहराने की कोशिशें चिंताजनक हैं।
कुछ समय पहले जब शाहरुख़ ख़ान की टीम ने एक बांग्लादेशी खिलाड़ी को आईपीएल में शामिल किया, तो देश में मुसलमानों के खिलाफ अभियान चलाने वाले तत्वों ने उन्हें निशाने पर ले लिया। कट्टरपंथी समूहों के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं ने भी शाहरुख़ को ‘भारत का विलेन’ साबित करने की कोशिश की। जबकि सच्चाई यह है कि किसी विदेशी खिलाड़ी को आईपीएल में खेलने की अनुमति भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) देता है, जो अमित शाह के बेटे जय शाह के नेतृत्व में काम करता है। लेकिन इस पूरे विवाद में न तो जय शाह का कोई बयान आया और न ही सरकार की ओर से ट्रोलर्स पर लगाम लगाने की कोई कोशिश की गई। यानी सब कुछ ‘खुल्ला खेल फर्रुख़ाबादी’ के अंदाज़ में चलता रहा।
अब वही रवैया ए.आर. रहमान के मामले में भी देखने को मिल रहा है। उनकी पीड़ा को समझने और उस पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें ही ट्रोल किया जा रहा है। यह सब मुसलमानों के खिलाफ चल रहे तथाकथित ‘सांस्कृतिक युद्ध’ का हिस्सा माना जा सकता है। शायद ‘नफरत फैलाने वाले चिंटुओं’ को यह अहसास नहीं है कि उनकी ऐसी हरकतों का सीधा नुकसान भारतीय फिल्म उद्योग को हो रहा है।
आज हालात यह हैं कि बॉलीवुड का काम तेजी से नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की ओर शिफ्ट हो रहा है। इतना ही नहीं, फिल्म निर्माण, शूटिंग और पोस्ट-प्रोडक्शन जैसे तकनीकी कार्य भी दुबई, जर्मनी और अन्य विदेशी देशों में स्थानांतरित होने लगे हैं। अगर देश में रचनात्मक लोगों के लिए सुरक्षित और स्वतंत्र माहौल नहीं मिलेगा, तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री धीरे-धीरे विदेशों में शिफ्ट हो सकती है। तब सवाल उठता है कि इस उद्योग से जुड़े लाखों लोगों—तकनीशियन, कलाकार, लेखक, संगीतकार—का भविष्य क्या होगा?
ए.आर. रहमान के विवाद की जड़ भी यहीं है। ऑस्कर विजेता इस महान संगीतकार ने अपने साढ़े तीन दशक लंबे करियर में भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई है। बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय सिनेमा की सीमाओं से आगे निकलकर उन्होंने दुनिया भर में भारत का नाम रोशन किया है। लेकिन हाल ही में एक इंटरव्यू में जब उनसे बॉलीवुड में भेदभाव के सवाल पर पूछा गया, तो उन्होंने खेद जताते हुए कहा कि पिछले आठ वर्षों में उनके काम में लगातार कमी आई है।
ए.आर. रहमान का मानना है कि देश में सत्ता परिवर्तन के बाद रचनात्मक माहौल प्रभावित हुआ है। उनके शब्दों में, “पिछले आठ वर्षों में बॉलीवुड में रोजगार के अवसर कम हो गए हैं, क्योंकि अब सत्ता उन लोगों के हाथों में है जो रचनात्मक नहीं हैं। यह धार्मिक विभाजन का नतीजा भी हो सकता है। किसी ने मुझसे सीधे ऐसा नहीं कहा, लेकिन मैंने ऐसी बातें सुनी हैं।”

इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस शुरू हो गई। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया, जबकि सत्ताधारी दल के नेताओं ने रहमान की बातों से असहमति जताई। उनका कहना है कि सलमान ख़ान और शाहरुख़ ख़ान जैसे कलाकारों को आज भी देशभर में अपार प्रेम मिलता है। लेकिन सवाल लोकप्रियता का नहीं, बल्कि उस माहौल का है जिसमें रचनात्मकता सांस ले सके।
आज ज़रूरत इस बात की है कि ए.आर. रहमान जैसे कलाकारों की बातों को देशद्रोह नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में सुना जाए। अगर भारत को अपनी सांस्कृतिक विविधता, रचनात्मक स्वतंत्रता और सॉफ्ट पावर को बचाए रखना है, तो नफरत और ध्रुवीकरण की राजनीति से ऊपर उठकर कला और कलाकारों को सम्मान देना ही होगा।

