तालिबान के भीतर दरारें गहरी: कंधार बनाम काबुल की सत्ता जंग उजागर
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, काबुल
अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज़ तालिबान के भीतर गहराते मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। जिस संगठन को लंबे समय तक एकजुट और सख्त अनुशासन वाला माना जाता रहा, वही अब आंतरिक खींचतान और वैचारिक विभाजन से जूझता दिख रहा है। खासतौर पर एक ऐसे देश को लेकर, जिसे तालिबान का एक कट्टरपंथी धड़ा अपना घोर विरोधी मानता है और जिसके खिलाफ अतीत में चरमपंथी कार्रवाइयाँ भी हो चुकी हैं, तालिबान के भीतर दो स्पष्ट गुट आमने-सामने दिखाई देने लगे हैं।
एक ओर वह कट्टरपंथी गुट है, जो किसी भी सूरत में अपने घोषित विरोधी देश से रिश्ते बनाने के पक्ष में नहीं है। वहीं दूसरी ओर तालिबान का दूसरा गुट न केवल उस देश के नेताओं से मुलाकात कर रहा है, बल्कि कूटनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए लगातार सक्रिय भी है। बीबीसी की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, यही मुद्दा तालिबान के भीतर फूट की एक बड़ी वजह बनता जा रहा है।
तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा को औपचारिक रूप से “पूर्ण शक्ति” प्राप्त है और उनके प्रवक्ता भी यही दावा करते हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी और कार्यवाहक रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब मुजाहिद सहित कई प्रभावशाली नेता उनके फैसलों पर सवाल उठाने लगे हैं। दूसरी बार सत्ता में लौटने के साढ़े चार साल के भीतर ही तालिबान शासन के अंदरूनी संघर्ष अब दिन-ब-दिन ज्यादा स्पष्ट और गहरे होते जा रहे हैं।
बीबीसी की हालिया जांच में इस बात की पुष्टि हुई है कि तालिबान फिलहाल व्यावहारिक रूप से दो गुटों में बंट चुका है। इस जांच के तहत तालिबान के मौजूदा और पूर्व सदस्यों, स्थानीय सूत्रों, विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों से 100 से अधिक साक्षात्कार किए गए। सुरक्षा कारणों और संवेदनशीलता को देखते हुए रिपोर्ट में किसी का नाम उजागर नहीं किया गया है।
बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के ये दो गुट हैं—कंधार गुट और काबुल गुट।
कंधार गुट में अफगान प्रधानमंत्री मोहम्मद हसन अखुंद, सर्वोच्च न्यायाधीश अब्दुल हकीम हक्कानी और उच्च शिक्षा मंत्री नेदा मोहम्मद नदीम जैसे शीर्ष नेता शामिल हैं। यह गुट सीधे तौर पर सर्वोच्च धार्मिक नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के प्रति वफादार माना जाता है। अखुंदजादा लंबे समय से कंधार में रहते हुए अपने भरोसेमंद सहयोगियों और समर्थकों से घिरे रहते हैं और वहीँ से सत्ता की दिशा तय करते हैं।
इसके विपरीत, काबुल गुट में अफगान उप प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर, गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी, रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब मुजाहिद और काबुल व अन्य क्षेत्रों के कई प्रभावशाली नेता शामिल हैं। यह गुट अखुंदजादा की कार्यशैली और फैसलों से असहमत है और अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व को अधिक व्यावहारिक मानता है।
दोनों गुटों के बीच टकराव पहली बार खुलकर सितंबर 2025 में सामने आया, जब हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने इंटरनेट पर कथित “इस्लाम विरोधी सामग्री” का हवाला देते हुए पूरे देश में अनिश्चितकालीन इंटरनेट बंद करने का आदेश जारी कर दिया। आदेश के तुरंत बाद इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, लेकिन महज़ तीन दिन के भीतर ही उन्हें बहाल करना पड़ा।
बीबीसी से बात करने वाले सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री मोहम्मद हसन अखुंद को काबुल गुट के दबाव में आकर इंटरनेट बहाली का आदेश देना पड़ा। तालिबान जैसे संगठन में, जहां अनुशासन और आदेश पालन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, सर्वोच्च नेता के फैसले को पलटना लगभग विद्रोह के बराबर माना जाता है। आमतौर पर ऐसे मामलों में सख्त सज़ा तय होती है, लेकिन इस बार अखुंदजादा ने इस प्रकरण पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
तालिबान नेतृत्व के भीतर मौजूद सूत्रों के अनुसार, दोनों गुटों के बीच टकराव के दो मुख्य कारण हैं। पहला, हिबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा संगठन और शासन के भीतर अपनी पकड़ लगातार मजबूत करने की कोशिश। वे 2021 से ही रणनीतिक रूप से अपने वफादारों को सरकार और प्रशासन के अहम पदों पर नियुक्त करते आ रहे हैं। वे काबुल गुट के नेताओं से दूरी बनाए रखते हैं और उनसे सीधे संवाद करने से भी बचते हैं।
दूसरा और कहीं अधिक गहरा कारण है अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर दोनों गुटों की वैचारिक सोच में अंतर। अखुंदजादा और उनके समर्थक अफगानिस्तान को एक सख्त इस्लामी अमीरात के रूप में ढालना चाहते हैं—ऐसा देश जो आधुनिक दुनिया से लगभग कट जाए और जहां समाज के हर पहलू पर उनके प्रति वफादार धार्मिक नेतृत्व का नियंत्रण हो।
इसके विपरीत, काबुल गुट एक ऐसे अफगानिस्तान की पैरवी करता है जो इस्लामी मूल्यों का पालन तो करे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय से संपर्क भी बनाए रखे। यह गुट देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने, कूटनीतिक रिश्तों को बेहतर करने और यहां तक कि प्राथमिक शिक्षा से आगे लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा पर सीमित ही सही, लेकिन विचार करने के पक्ष में है।
पिछले वर्ष अखुंदजादा द्वारा कई प्रमुख सरकारी विभागों, जिनमें शस्त्र वितरण कार्यालय भी शामिल है, को कंधार स्थानांतरित करने का आदेश भी इसी टकराव का उदाहरण माना जाता है। आरोप है कि यह फैसला उन्होंने गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी और रक्षा मंत्री याकूब मुजाहिद से परामर्श किए बिना लिया था।
हाल ही में हिबतुल्लाह अखुंदजादा का एक ऑडियो टेप भी लीक हुआ, जिसमें उन्हें यह कहते सुना गया कि अगर तालिबान आंतरिक संघर्षों और विभाजन में उलझ गया, तो वह अफगानिस्तान को “सच्चा इस्लामी अमीरात” बनाने के अपने लक्ष्य से भटक जाएगा।
विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान खुद इस बात का संकेत है कि तालिबान नेतृत्व अपने भीतर बढ़ते मतभेदों को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है। सवाल यह है कि क्या तालिबान इन अंतर्विरोधों को संभाल पाएगा, या फिर यह फूट आने वाले समय में अफगानिस्तान की राजनीति और स्थिरता को और गहरे संकट में धकेल देगी।
स्रोत: बीबीसी

