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समान नागरिक संहिता: उत्तराखंड के बाद अब गुजरात में UCC बिल पास, जानें मुख्य प्रावधान

मुस्लिम नाउ ब्यूरो नई दिल्ली/गांधीनगर:

एक तरफ जहाँ दुनिया की नज़रें मिडिल ईस्ट में मचे युद्ध और ईरान-इजरायल तनाव पर टिकी हैं, वहीं भारत में भारतीय जनता पार्टी (BJP) शासित राज्य अपने वैचारिक और विधायी एजेंडे को धरातल पर उतारने में जुटे हैं। उत्तराखंड के बाद अब गुजरात देश का दूसरा ऐसा राज्य बन गया है जिसने विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक को बहुमत से पारित कर दिया है।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस कदम को गुजरात के इतिहास में ‘ऐतिहासिक क्षण’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून किसी धर्म या जाति के खिलाफ नहीं, बल्कि ‘समानता और न्याय’ के सिद्धांत पर आधारित है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि युद्ध के शोर के बीच इस कानून को लाने की टाइमिंग राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ सकती है।


गुजरात UCC बिल की बड़ी बातें: विवाह से लेकर उत्तराधिकार तक

मुख्यमंत्री ने सदन में बताया कि यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों और दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों के कानूनों के गहन अध्ययन के बाद तैयार किया गया है। इस कानून के लागू होने के बाद विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में सभी समुदायों के लिए एक ही कानूनी ढांचा होगा।

1. विवाह का अनिवार्य पंजीकरण (Mandatory Marriage Registration)

नए कानून के तहत जोड़ों को शादी के 60 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा।

  • जुर्माना: पंजीकरण न कराने पर 10,000 रुपये तक का जुर्माना लग सकता है।
  • सजा: जबरन, धोखाधड़ी या बहला-फुसलाकर की गई शादी के मामले में 7 साल तक की जेल का प्रावधान है। बहुविवाह (Multiple Marriages) के मामलों में भी इसी तरह की सख्त सजा दी जाएगी।

2. लिव-इन रिलेशनशिप पर नकेल

विधेयक का सबसे चर्चित हिस्सा ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ का पंजीकरण है।

  • पंजीकरण: लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को इसका पंजीकरण कराना होगा। ऐसा न करने पर 3 महीने की जेल या 10,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है।
  • अभिभावकों को सूचना: यदि जोड़े की उम्र 18 से 21 वर्ष के बीच है, तो उनके माता-पिता को सूचित किया जाएगा।
  • बच्चों का संरक्षण: लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को कानूनी मान्यता और उत्तराधिकार का पूरा अधिकार मिलेगा।

3. तलाक और पुनर्विवाह के नियम

अब किसी भी समुदाय में ‘निजी कानूनों’ के आधार पर होने वाले तलाक मान्य नहीं होंगे।

  • अदालती अनुमति: तलाक केवल अदालत की मंजूरी के बाद ही पंजीकृत होगा। बिना अदालती आदेश के दिया गया तलाक अवैध माना जाएगा और इसके लिए 3 साल तक की सजा हो सकती है।
  • पुनर्विवाह: महिलाओं को बिना किसी शर्त (जैसे हलाला आदि) के पुनर्विवाह का अधिकार दिया गया है।

4. उत्तराधिकार में समानता

विधेयक बेटियों और बेटों को संपत्ति में समान विरासत अधिकार की गारंटी देता है। यह प्रावधान लैंगिक न्याय (Gender Justice) की दिशा में एक बड़ा क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।


‘न कोई कानून से ऊपर, न कोई नीचे’: हर्ष संघवी

गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस उपलब्धि को साझा करते हुए लिखा, “ऐतिहासिक! कानून से ऊपर कोई नहीं, कानून से नीचे कोई नागरिक नहीं। समान गुजरात, सशक्त गुजरात।” मुख्यमंत्री पटेल ने यह भी साझा किया कि इस विधेयक का मसौदा सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है। समिति ने राज्य के विभिन्न जिलों का दौरा कर और जनमत संग्रह के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।


संविधान का अनुच्छेद 44 और राजनीतिक मायने

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। बीजेपी शासित राज्यों द्वारा इसे लागू करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत’ के विजन का हिस्सा बताया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार का नजरिया: जहाँ सरकार इसे महिला सशक्तिकरण और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने वाला कदम बता रही है, वहीं मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने इसकी टाइमिंग और व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताई है। उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब महाराष्ट्र जैसे अन्य बीजेपी शासित राज्यों में भी इसी तरह की हलचल तेज हो गई है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह ‘स्टेट-बाय-स्टेट’ मॉडल भविष्य में ‘राष्ट्रीय समान नागरिक संहिता’ का मार्ग प्रशस्त करेगा।


मुख्य प्रावधानों पर एक नज़र (Table)

विषयनया नियम/प्रावधानउल्लंघन पर सजा/जुर्माना
विवाह पंजीकरण60 दिन के भीतर अनिवार्य₹10,000 जुर्माना
धोखाधड़ी से विवाहशून्य और अवैध7 साल तक की जेल
तलाककेवल अदालती आदेश से मान्य3 साल तक की सजा (अवैध तलाक पर)
लिव-इन रिलेशनशिपपंजीकरण अनिवार्य3 महीने की जेल या ₹10k जुर्माना
विरासतबेटा-बेटी को समान अधिकारकानून द्वारा गारंटी