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Uttar pradesh muslims success story : डॉ. फराह उस्मानी की प्रेरक उड़ान

मुस्लिम नाउ विशेष

कुछ कहानियां सिर्फ सफलता की नहीं होतीं। वे सोच बदल देती हैं। रास्ते खोल देती हैं। डॉ. फराह उस्मानी की कहानी भी ऐसी ही है। यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने समाज की तय सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय अपनी राह खुद बनाई।

डॉ. फराह उस्मानी आज एक सफल डॉक्टर हैं। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ हैं। संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय तक वरिष्ठ पदों पर काम कर चुकी हैं। लेकिन उनकी पहचान सिर्फ इतनी नहीं है। वे उन महिलाओं के लिए उम्मीद की मिसाल हैं जो अपने सपनों को हालात की वजह से छोटा कर देती हैं।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त रहे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी की जीवनसंगिनी डॉ. फराह उस्मानी ने हमेशा शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक चेतना को जीवन का आधार बनाया। उनके दो बच्चे हैं। बेटा फ़राज़ और बेटी सबा। फ़राज़ ने ड्यूक यूनिवर्सिटी से पर्यावरण नीति की पढ़ाई की। वहीं सबा ने न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। यह परिवार शिक्षा को केवल डिग्री नहीं, बल्कि सोच बदलने का माध्यम मानता है।

डॉ. फराह उस्मानी ने दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई की। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन से हेल्थ पॉलिसी और फाइनेंस में मास्टर्स डिग्री हासिल की। पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने स्वास्थ्य और महिला अधिकारों के क्षेत्र में काम शुरू किया। धीरे धीरे उनका काम अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा।

साल 2007 उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ लेकर आया। संयुक्त राष्ट्र में उनकी पोस्टिंग न्यूयॉर्क हुई। उसी समय उनकी बेटी सबा भी न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में दाखिला ले चुकी थीं। नया शहर था। नई चुनौतियां थीं। सबसे बड़ी मुश्किल थी घर की तलाश।

मैनहटन जैसे महंगे इलाके में किराए के घर लेना आसान नहीं था। दलालों से बातचीत, ऊंचे किराए और अनिश्चितता ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया। उन्होंने महसूस किया कि आर्थिक समझ भी उतनी ही जरूरी है जितनी अच्छी शिक्षा।

यहीं से उनकी जिंदगी का एक अहम फैसला सामने आया।

उन्होंने खुद से कहा, “अब डरना नहीं है। अब सीखना है। पैसे को समझना है।”

उस दौर में जब बहुत सी महिलाएं आर्थिक फैसलों से दूरी बनाए रखती थीं, डॉ. फराह उस्मानी ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने मैनहटन के बीचोंबीच अपना पहला अपार्टमेंट खरीदा। यह फैसला आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया। संयुक्त राष्ट्र फेडरल क्रेडिट यूनियन से कम ब्याज पर लोन लिया। धीरे धीरे भुगतान किया। आज करीब पंद्रह साल बाद वे लगभग कर्ज मुक्त गृहस्वामी हैं।

डॉ. उस्मानी मानती हैं कि पैसा केवल खर्च करने की चीज नहीं है। यह आत्मनिर्भरता का साधन है। वे अक्सर अपनी नानी को याद करती हैं जो गद्दों के नीचे पैसे छुपाकर रखती थीं। फराह उस्मानी इसे एक गहरी समझ मानती हैं। उनके शब्दों में, “हमारी नानी दरअसल आत्मनिर्भरता का बीज बो रही थीं।”

आर्थिक फैसलों की समझ उन्हें परिवार से भी मिली। उनके पति जावेद उस्मानी ने उन्हें निवेश और बचत के तरीके समझाए। टैक्स फ्री सेविंग्स, एनआरई डिपॉजिट और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे विकल्पों ने उनकी सोच बदली। इसका असर अगली पीढ़ी पर भी पड़ा। उनकी बेटी सबा आज मैनहटन में रियल एस्टेट निवेशक हैं। यह आर्थिक आत्मविश्वास उन्हें अपनी मां से मिला।

डॉ. फराह उस्मानी ने सिर्फ अपने लिए रास्ता नहीं बनाया। उन्होंने दूसरी महिलाओं के लिए भी दरवाजे खोले। उन्होंने “राइजिंग बियॉन्ड द सीलिंग” नाम से एक वैश्विक पहल शुरू की। इसका मकसद भारत की मुस्लिम महिलाओं की उपलब्धियों को दुनिया के सामने लाना है। वे उन पुरानी धारणाओं को चुनौती देना चाहती हैं जिनमें मुस्लिम महिलाओं को सीमित नजर से देखा जाता है।

उनकी कोशिश है कि मुस्लिम महिलाओं को केवल आंकड़ों या बहस का हिस्सा नहीं, बल्कि नेतृत्व, नवाचार और बदलाव की मिसाल के रूप में पहचाना जाए।

डॉ. उस्मानी पेशे से एक अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञ भी हैं। संयुक्त राष्ट्र के साथ उनके पास 25 वर्षों का अनुभव है। वे दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में काम कर चुकी हैं। करीब 18 वर्षों तक उन्होंने यूएनएफपीए में नीति निर्माण, योजना और तकनीकी नेतृत्व की जिम्मेदारी निभाई।

उनके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। उन्हें विश्व बैंक और ब्रिटिश काउंसिल की मेरिट फेलोशिप मिली। साल 2021 में उन्हें महात्मा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान महिलाओं, लड़कियों और अल्पसंख्यकों के लिए उनके सामाजिक योगदान के लिए दिया गया।

आज डॉ. फराह उस्मानी की कहानी एक साफ संदेश देती है। महिलाएं जब आत्मनिर्भर होती हैं, तो सिर्फ उनका जीवन नहीं बदलता। पूरा समाज बदलने लगता है। उनकी आवाज आज भी यही कहती है, “पैसे से डरिए मत। उसे समझिए। तभी सपनों को हकीकत बनाया जा सकता है।”

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