फैजान मुस्तफा के बदले सुर, मस्जिदों के विवादों पर दी बाहर समझौते की सलाह
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
देश के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ और न्यायविद प्रोफेसर फैजान मुस्तफा इन दिनों अपने बदले हुए रुख को लेकर चर्चा में हैं. कानूनी हलकों और सोशल मीडिया पर उनके बयानों को लेकर नई बहस छिड़ गई है. कुछ लोग इसे सरकारी मंचों पर उनकी बढ़ती सक्रियता का असर मान रहे हैं, तो कुछ इसे वक्त की जरूरत बता रहे हैं. फैजान मुस्तफा अब मस्जिदों से जुड़े तमाम विवादों को अदालत के बाहर सुलझाने की वकालत कर रहे हैं. उन्होंने वर्शिप एक्ट 1991 यानी उपासना स्थल कानून के भविष्य पर भी बड़ा बयान दिया है.
हाल ही में नई दिल्ली में जमीयत उलेमा-ए-हिंद का एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ था. इस कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद मामले के अदालती फैसले पर एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट पेश की गई. कार्यक्रम के दौरान कई वक्ताओं ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एकतरफा बताया. वक्ताओं का कहना था कि यह फैसला मुस्लिम पक्ष के साथ पूरी तरह न्याय नहीं करता. मंच पर मौजूद फैजान मुस्तफा इन बातों से असहमत दिखे और वह वक्ताओं से बहस में उलझ गए.
जमीयत के मंच पर तीखी बहस
कार्यक्रम में जब बाबरी फैसले पर कड़ी टिप्पणियां की जा रही थीं, तब फैजान मुस्तफा ने बीच में हस्तक्षेप किया. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में कई जगह ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है जिससे अदालत की अवमानना का मामला बन सकता है. उन्होंने मुस्लिम समाज को न्यायपालिका पर इस तरह के तीखे हमलों से बचने की सलाह दी. हालांकि, मंच पर मौजूद अन्य वक्ताओं ने उनकी बातों को तवज्जो नहीं दी.

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जमीयत के कुछ नेताओं ने फैजान मुस्तफा की दलीलों का विरोध किया. उन्होंने कहा कि समाज को बेखौफ होकर अपनी बात रखनी चाहिए. उनका यह भी तर्क था कि बाबरी केस को मुस्लिम पक्ष ने पूरी ताकत और सही तरीके से लड़ा था, इसलिए उस पर सवाल उठाना ठीक नहीं है. जब मंच पर फैजान मुस्तफा की बात पूरी तरह नहीं सुनी गई, तो उन्होंने अपने आधिकारिक यूट्यूब चैनल ‘लीगल अवेयरनेस वेब सीरीज’ पर एक वीडियो जारी कर अपनी पूरी बात जनता के सामने रखी.
#Jamiat’s Report Released on #BabriMasjidVerdict and #Places_of_Worship_Act, 1991
— Jamiat Ulama-i-Hind (@JamiatUlama_in) May 16, 2026
Important event on #Secularism and #Justice Organized by Jamiat Ulama-i-Hind and SAMLA. Speakers assert no evidence that Babri Masjid Was Built after Demolishing a Temple and Demand Strict… pic.twitter.com/Myvz3GLmKL
नागरिक अधिकारों को बताया सबसे जरूरी
फैजान मुस्तफा ने अपने वीडियो में साफ कहा कि मुस्लिम समाज के लिए अदालतों में मस्जिदों की लंबी लड़ाई लड़ने से कहीं ज्यादा जरूरी अपने नागरिक अधिकार हासिल करना है. उनका मानना है कि विवादित स्थलों को लेकर दशकों तक मुकदमेबाजी करने से समाज का भारी नुकसान होता है.
“मुसलमानों के लिए एक नागरिक के रूप में अपने अधिकार पाना ज्यादा महत्वपूर्ण है, न कि विवादित मस्जिदों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ना. विशेष रूप से उन मामलों में जहां इस बात के पुख्ता ऐतिहासिक सबूत मिलते हैं कि मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को गिराकर किया गया था.”
उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील की कि वे समाज में भाईचारा और सद्भाव बढ़ाने के लिए बड़ी तस्वीर को देखें. देश में बढ़ते ध्रुवीकरण और नफरत के माहौल को खत्म करने के लिए यह बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि विवादित मामलों में मुस्लिम पक्ष को खुद आगे बढ़कर अदालत से बाहर समझौते के रास्ते तलाशने चाहिए, ताकि दोनों पक्षों की जीत हो और समाज में कड़वाहट खत्म हो.
वर्शिप एक्ट पर जताई बड़ी आशंका
फैजान मुस्तफा ने देश के चर्चित उपासना स्थल कानून 1991 (Places of Worship Act) को लेकर भी एक बड़ा दावा किया है. उन्होंने आशंका जताई है कि सुप्रीम कोर्ट इस कानून को पूरी तरह से रद्द कर सकता है. उनके मुताबिक, इस कानून में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को रोकने के प्रावधान हैं, जो न्यायपालिका के अधिकारों को सीमित करते हैं. इसी आधार पर अदालत इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है.
इसके साथ ही उन्होंने धार के भोजशाला मामले में आए हालिया फैसले का हवाला भी दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में आने वाली मस्जिदें और इमारतें पहले से ही इस कानून के दायरे से बाहर हैं. इसलिए इस कानून के भरोसे बैठे रहना मुस्लिम समाज के लिए व्यावहारिक नहीं होगा.
बाबरी फैसले के सकारात्मक पहलू
सुप्रीम कोर्ट की चौतरफा आलोचना से असहमति जताते हुए फैजान मुस्तफा ने मुसलमानों को संविधान और न्यायपालिका पर भरोसा रखने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद के फैसले में मुस्लिम पक्ष के लिए कई सकारात्मक बातें भी थीं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह माना था कि बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर नहीं किया गया था. अदालत ने यह भी स्वीकार किया था कि साल 1949 में मस्जिद के भीतर मूर्तियां रखना और 1992 में मस्जिद का ढांचा गिराना पूरी तरह से गैरकानूनी था. मुस्तफा का कहना है कि इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को समझने के बजाय पूरी अदालत पर एकतरफा होने का आरोप लगाना सही नहीं है.
सोशल मीडिया पर छिड़ी नई बहस
फैजान मुस्तफा के इस बदले अंदाज ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों और आम जनता के बीच एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है. जहां एक वर्ग उनके इस व्यावहारिक दृष्टिकोण की तारीफ कर रहा है और इसे देश में शांति बनाए रखने के लिए जरूरी बता रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे दबाव में लिया गया स्टैंड मान रहा है. फैजान मुस्तफा ने अपने दर्शकों से इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा साझा करने और उनके कानूनी जागरूकता अभियान से जुड़ने की अपील की है.

