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Uttar pradesh muslims success story :यूनुस और अंजुम की अनोखी मिसाल

मुस्लिम नाउ विशेष

देशभक्ति सिर्फ नारों में नहीं होती। कभी कभी वह चुपचाप किसी टूटे हुए परिवार का सहारा बन जाती है। एक ऐसी ही कहानी है आईएएस अधिकारी यूनुस खान और आईपीएस अधिकारी अंजुम आरा की। एक मुस्लिम दंपति, जिसने शहीद सैनिक के परिवार के लिए ऐसा काम किया जिसे उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरा देश लंबे समय तक याद रखेगा।

मई 2017। देश गुस्से और दुख में डूबा था। जम्मू कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना के नायब सूबेदार परमजीत सिंह की निर्मम हत्या कर दी गई थी। खबर सिर्फ मौत की नहीं थी। शव के साथ हुई बर्बरता ने हर भारतीय को झकझोर दिया था। पंजाब के तरनतारन जिले के वेनपुइन गांव में मातम पसरा था। एक पत्नी का सहारा छिन गया था। तीन बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया था।

इसी बीच हिमाचल प्रदेश से दो लोग इस परिवार के दर्द को सिर्फ खबर की तरह नहीं देख रहे थे। कुल्लू के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट यूनुस खान और उनकी पत्नी अंजुम आरा, जो उस समय सोलन में पुलिस अधीक्षक थीं, भीतर से बेचैन थे।

उन्होंने तय किया कि सिर्फ संवेदना जताना काफी नहीं है।

यूनुस खान ने सबसे पहले शहीद परमजीत सिंह के भाई से फोन पर बात की। फिर दोनों पति पत्नी पंजाब के गांव पहुंचे। वहां का मंजर उन्हें अंदर तक हिला गया। घर में सन्नाटा था। आंखों में दर्द था। बच्चों के चेहरे पर डर और खालीपन साफ दिख रहा था।

उसी दौरान यूनुस और अंजुम की नजर परमजीत सिंह की छोटी बेटी खुशदीप कौर पर पड़ी। मासूम चेहरा। पिता के बिछड़ने का दर्द। उस पल कुछ बदल गया।

अंजुम आरा कहती हैं, “यह सिर्फ भावनाओं का मामला नहीं था। हमें सोचना था कि क्या हम इस बच्ची के साथ लंबे समय तक खड़े रह पाएंगे।”

कुछ देर की बातचीत और गहरे सोच विचार के बाद दंपति ने फैसला लिया। खुशदीप की पढ़ाई और भविष्य की जिम्मेदारी उठाने का। लेकिन एक शर्त के साथ। बच्ची अपने परिवार और गांव से दूर नहीं जाएगी।

खुशदीप पंजाब में अपनी मां और भाई बहनों के साथ ही रहेगी। मगर शिमला वाले अंकल और आंटी हमेशा उसके साथ रहेंगे।

समय बीतता गया। रिश्ता गहराता गया।

आज खुशदीप 12वीं की होनहार छात्रा है। उसके सपने बड़े हैं। हाल ही में उसने यूनुस खान को फोन कर लैपटॉप की जरूरत बताई। यूनुस मुस्कुराते हुए कहते हैं, “मैंने उससे कहा कि सस्ता मत लेना। मैंने उसके लिए अच्छा मॉडल भिजवाया। कभी कभी अपनी जरूरतें टालनी पड़ती हैं, लेकिन उसकी खुशी सबसे बड़ी लगती है।”

यह रिश्ता अब सिर्फ मदद तक सीमित नहीं रहा। यह एक परिवार बन चुका है।

रक्षाबंधन हो, ईद हो या दिवाली। दोनों परिवार साथ जुड़ते हैं। अंजुम बताती हैं, “मेरा बेटा हर साल खुशदीप और उसकी बहन सिमरनदीप से राखी बंधवाता है। अब वे सिर्फ परिचित नहीं हैं। परिवार हैं।”

इस पूरे रिश्ते में सबसे खास बात पारदर्शिता रही। यूनुस खान कहते हैं कि हर फैसला शहीद की पत्नी परमजीत कौर और सेना के अधिकारियों से बात करके लिया गया। “हम बच्ची को उसके घर से दूर नहीं ले जाना चाहते थे। हम बस अपने घर का दायरा बढ़ाना चाहते थे।”

मलेरकोटला से ताल्लुक रखने वाले 2010 बैच के आईएएस अधिकारी यूनुस खान आज हिमाचल प्रदेश में राज्य कर और उत्पाद शुल्क आयुक्त हैं। रेत माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए भी उनकी पहचान रही है। वहीं लखनऊ की रहने वाली 2011 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजुम आरा इस समय दक्षिण शिमला में डीआईजी हैं।

यूनुस कहते हैं कि उनकी मां की एक बात आज भी उन्हें रास्ता दिखाती है। “उन्होंने कहा था, आम लोग अपने लिए जीते हैं। असली महानता दूसरों के लिए जीने में है।”

शायद यही वजह है कि यह रिश्ता सात साल बाद भी उतना ही मजबूत है। यूनुस और अंजुम जब भी मौका मिलता है, शहीद परिवार से मिलने पहुंच जाते हैं। पिछली दिवाली उन्होंने भारत पाकिस्तान सीमा के पास जवानों के साथ मनाई।

अंजुम कहती हैं, “हमने कुछ असाधारण नहीं किया। बस एक ऐसे परिवार के लिए दिल खोल दिया जो इससे कहीं ज्यादा का हकदार था।”

ऐसे दौर में जब रिश्ते अक्सर औपचारिक हो जाते हैं, यूनुस खान और अंजुम आरा ने साबित किया है कि इंसानियत की कोई जात, मजहब या सीमा नहीं होती। कुछ रिश्ते खून से नहीं, जिम्मेदारी और मोहब्बत से बनते हैं।

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