Religion

दक्षिण अफ्रीका के ग्रैंड मुफ्ती इब्राहिम देसाई का भारत से क्या रिश्ता था?

नौशाद अख्तर

दक्षिण अफ्रीका के ग्रैंड मुफ्ती इब्राहिम देसाई का भारत से गहरा रिश्ता था। उन्होंने गुजरात के डाभेल स्थित जामिया इस्लामिया तालीमुद्दीन में कई वर्षों तक इस्लामी शिक्षा हासिल की। यहीं उन्होंने आलिम और इफ्ता की पढ़ाई पूरी की। भारत के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वानों से उन्होंने मार्गदर्शन लिया। यही शिक्षा आगे चलकर उनकी पहचान की सबसे बड़ी ताकत बनी।

15 जुलाई 2021 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में उनका इंतकाल हुआ था। इस साल 15 जुलाई को उनके इंतकाल के पांच साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर दुनिया भर में उनके चाहने वाले उन्हें याद कर रहे हैं। उन्हें केवल दक्षिण अफ्रीका का ग्रैंड मुफ्ती नहीं माना जाता था। वे इस्लामी शिक्षा, फिकह, शरिया, इस्लामिक फाइनेंस और ऑनलाइन फतवा सेवाओं के क्षेत्र में भी एक बड़ा नाम थे।

मुफ्ती इब्राहिम देसाई का जन्म 16 जनवरी 1963 को दक्षिण अफ्रीका के क्वाज़ुलु नताल प्रांत में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि दीनी तालीम की ओर थी। उन्होंने सबसे पहले वाटरवाल इस्लामिक इंस्टीट्यूट में पढ़ाई की। वहीं उन्होंने कुरान हिफ्ज किया। शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने भारत आने का फैसला किया। यह फैसला उनकी पूरी जिंदगी बदलने वाला साबित हुआ।

भारत पहुंचने के बाद उन्होंने गुजरात के डाभेल स्थित जामिया इस्लामिया तालीमुद्दीन में दाखिला लिया। यहां उन्होंने सात वर्षों तक इस्लामी शिक्षा प्राप्त की। उनके शिक्षकों के अनुसार वे हर साल अपनी कक्षा में सबसे आगे रहते थे। उनकी मेहनत, लगन और याददाश्त की हमेशा सराहना होती थी। पढ़ाई पूरी होने पर उन्हें विशेष सम्मान भी दिया गया।

इसके बाद उन्होंने भारत के प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान मुफ्ती अहमद खानपुरी की देखरेख में इफ्ता की पढ़ाई की। यह वह शिक्षा होती है जिसके बाद कोई व्यक्ति फतवा जारी करने की योग्यता हासिल करता है। दो साल की यह विशेष ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने भारत के महान इस्लामी विद्वान हजरत मुफ्ती महमूद अल हसन गंगोही के साथ भी समय बिताया। गंगोही साहब को फतवा महमूदिया जैसी महत्वपूर्ण कृति के लिए जाना जाता है। मुफ्ती इब्राहिम देसाई को उनका खलीफा भी माना जाता था।

भारत में मिली शिक्षा ने उनके व्यक्तित्व को नई दिशा दी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे दक्षिण अफ्रीका लौटे और वहां दीनी तालीम के प्रचार में जुट गए। उन्होंने लगभग दस वर्षों तक मदरसा तालीमुद्दीन में फिकह, तफसीर और हदीस पढ़ाई। इसके बाद जमीअतुल उलेमा केजेडएन के फतवा विभाग की जिम्मेदारी संभाली। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे कठिन धार्मिक सवालों का आसान और संतुलित जवाब देते थे। यही कारण था कि दुनिया के कई देशों से लोग उनसे मार्गदर्शन लेने लगे।

साल 2011 में उन्होंने डरबन के शेरवुड में दारुल इफ्ता महमूदिया की स्थापना की। आज यह संस्थान दुनिया के प्रमुख इस्लामी फतवा केंद्रों में गिना जाता है। यहां से हजारों लोगों को धार्मिक मार्गदर्शन मिला। इस संस्थान ने आधुनिक तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया।

मुफ्ती इब्राहिम देसाई ने इंटरनेट की ताकत को बहुत पहले पहचान लिया था। उन्होंने AskImam.org नाम की वेबसाइट शुरू की। इस मंच पर दुनिया भर के मुसलमान अपने सवाल भेजते थे। वे व्यक्तिगत, पारिवारिक, कारोबारी और धार्मिक विषयों पर विस्तार से जवाब देते थे। लाखों लोगों ने इस वेबसाइट से लाभ उठाया। उनके अनेक जवाब बाद में किताबों के रूप में भी प्रकाशित हुए। अल महमूद और कंटेंपरेरी फतावा आज भी शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ माने जाते हैं।

मुफ्ती इब्राहिम देसाई की पहचान केवल धार्मिक विद्वान के रूप में नहीं थी। वे इस्लामिक फाइनेंस और शरिया आधारित कारोबार के भी बड़े विशेषज्ञ थे। उन्होंने वर्ष 2002 में शरिया कंप्लायंट बिजनेस अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य मुस्लिम व्यापारियों को ब्याज आधारित लेनदेन, अनुचित वित्तीय व्यवस्थाओं और गैर शरिया कारोबार से बचने का व्यावहारिक मार्ग बताना था। उन्होंने इस विषय पर कई लेख लिखे और व्याख्यान दिए। उनकी पुस्तक इंट्रोडक्शन टू इस्लामिक कॉमर्स आज भी इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण पुस्तकों में शामिल मानी जाती है।

उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का काम उनके बेटे मुफ्ती इस्माइल देसाई कर रहे हैं। वे भी इस्लामिक फाइनेंस के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों में गिने जाते हैं और दुनिया के कई देशों में व्याख्यान देते हैं।

मुफ्ती इब्राहिम देसाई की लोकप्रियता सीमाओं से बहुत आगे तक पहुंच चुकी थी। जॉर्डन के रॉयल इस्लामिक स्ट्रैटेजिक स्टडीज सेंटर द्वारा जारी दुनिया के 500 सबसे प्रभावशाली मुस्लिमों की सूची में उनका नाम शामिल किया गया था। यह सम्मान उन विद्वानों को मिलता है जिनका वैश्विक स्तर पर प्रभाव माना जाता है। उन्हें भारतीय मूल के दक्षिण अफ्रीकी ग्रैंड मुफ्ती के रूप में भी व्यापक सम्मान मिला।

जमीअतुल उलेमा दक्षिण अफ्रीका के सचिव मौलाना इब्राहिम भाम ने उन्हें संतुलित सोच वाला विद्वान बताया था। उनका कहना था कि मुफ्ती देसाई कभी जल्दबाजी में फैसला नहीं देते थे। वे हर मामले को पूरी गंभीरता से समझते थे। उनके फतवों में कठोरता नहीं बल्कि आसानी और संतुलन दिखाई देता था। यही वजह थी कि अलग अलग देशों के लोग भी उन पर भरोसा करते थे।

उनके बेटे मुफ्ती इस्माइल देसाई ने भी अपने पिता की सादगी से जुड़े कई प्रसंग साझा किए हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता हमेशा मुस्कुराते रहते थे। वे कभी अपने पद का प्रदर्शन नहीं करते थे। जब इस्माइल देसाई इस्लामिक फाइनेंस की पढ़ाई करना चाहते थे और आर्थिक परेशानी थी, तब उनके पिता ने अपने निजी संसाधनों से उनकी फीस की व्यवस्था की। उनका मानना था कि शिक्षा पर किया गया खर्च सबसे बड़ा निवेश होता है।

मुफ्ती इब्राहिम देसाई ने अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, चीन और कई अन्य देशों का दौरा किया। उनके व्याख्यानों में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते थे। वर्ष 2020 में उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान बताया था कि हजरत मरियम के बारे में इस्लाम की शिक्षाओं को जानने के बाद ब्रिटेन की 22 ईसाई महिलाओं ने इस्लाम स्वीकार किया। उनके अनुसार सही जानकारी और संवाद ही लोगों के बीच की दूरियां कम कर सकता है।

15 जुलाई 2021 को उनके इंतकाल की खबर सामने आई तो पूरी दुनिया में शोक की लहर फैल गई। भारत के ग्रैंड मुफ्ती अहमद खानपुरी, दारुल उलूम देवबंद से जुड़े विद्वानों और पाकिस्तान के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मुफ्ती मोहम्मद तकी उस्मानी सहित दुनिया भर के उलेमा ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। सैकड़ों शिक्षाविदों, सामाजिक नेताओं और धार्मिक संस्थाओं ने उनके योगदान को याद किया।

मुफ्ती इब्राहिम देसाई का जीवन यह बताता है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती। दक्षिण अफ्रीका में जन्म लेने वाले इस विद्वान ने भारत में शिक्षा प्राप्त की और फिर पूरी दुनिया तक अपने ज्ञान को पहुंचाया। उन्होंने हमेशा संतुलन, सादगी, विनम्रता और आसान धार्मिक मार्गदर्शन को प्राथमिकता दी।

आज भी उनकी किताबें, उनके फतवे और उनके ऑनलाइन जवाब हजारों छात्रों, शोधकर्ताओं और आम लोगों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच उनकी शैक्षिक यात्रा हमेशा याद रखी जाएगी। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा ज्ञान इंसान को केवल बड़ा विद्वान नहीं बनाता बल्कि बेहतर इंसान भी बनाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *