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ईरान के पास अमेरिका और इज़राइल से लड़ने के लिए कौन से हथियार हैं? मिसाइल, ड्रोन, प्रॉक्सी नेटवर्क और होर्मुज की रणनीति

एनेस अबू उमर, अल जज़ीरा (विश्लेषण)

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अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei और कई शीर्ष अधिकारियों की मौत के बाद तेहरान ने इसे “अस्तित्व की लड़ाई” करार दिया है। ईरान का दावा है कि उसके जवाबी हमले इज़राइल और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर केंद्रित हैं।

अब वैश्विक बाज़ारों, ऊर्जा कंपनियों और क्षेत्रीय शक्तियों के सामने बड़ा सवाल है—क्या यह केवल जवाबी हमलों का सीमित दौर है या यह एक लंबे, बहु-स्तरीय युद्ध में बदल सकता है? इस प्रश्न का उत्तर ईरान की मिसाइल क्षमता, उसके भूमिगत ठिकानों, नौसैनिक रणनीति और उसके ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ में छिपा है।


क्यों अलग है यह टकराव?

जून 2025 के 12-दिवसीय संघर्ष की तुलना में मौजूदा हालात अधिक विस्फोटक हैं। खामेनेई की हत्या ने ईरान को यह संदेश दिया है कि यदि वह इस बार निर्णायक जवाब नहीं देता, तो इसे कमजोरी माना जाएगा। तेहरान का आकलन है कि संयम का अर्थ होगा—अगले, और बड़े हमले का निमंत्रण।

इसीलिए ईरानी बयान अब “सीमित ऑपरेशन” की बजाय “पूर्ण युद्ध” की चेतावनी दे रहे हैं।


ईरान की मिसाइल रणनीति: वायुसेना की कमी की भरपाई

रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक ईरान की वायुसेना तकनीकी रूप से अमेरिका या इज़राइल से कमजोर है। इस कमी की भरपाई के लिए तेहरान ने दशकों से बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइलों के विशाल भंडार पर निवेश किया है।

1. कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें (150–800 किमी)

इनका इस्तेमाल तेज़ और सटीक हमलों के लिए होता है। प्रमुख प्रणालियाँ—

  • फत्ताह
  • ज़ुल्फ़िकार
  • क़ियाम-1
  • शाहब-1/2

2020 में क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद इराक के ऐन अल-असद अड्डे पर हमले में इन्हीं श्रेणियों की मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ था। उस हमले ने अमेरिकी एयर डिफेंस को चुनौती दी थी।

2. मध्यम दूरी की मिसाइलें (1,500–2,000 किमी)

यह श्रेणी ईरान को क्षेत्रीय आयाम देती है।

  • शाहब-3
  • इमाद
  • गदर-1
  • खोर्रमशहर
  • सेज्जिल

विशेष रूप से सेज्जिल ठोस ईंधन से चलती है, जिससे इसे तेजी से लॉन्च किया जा सकता है। इनकी मारक क्षमता इज़राइल के पूरे भूभाग और कतर, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब तथा यूएई में स्थित अमेरिकी ठिकानों तक है।

हालांकि, अमेरिकी दावों के बावजूद, ये मिसाइलें सीधे अमेरिकी मुख्य भूमि तक नहीं पहुंचतीं।


क्रूज़ मिसाइलें और ड्रोन: रडार से बचकर वार

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क्रूज़ मिसाइलें ज़मीन के बेहद करीब उड़ती हैं, जिससे उनका पता लगाना कठिन हो जाता है।

  • सुमार (लगभग 2,500 किमी क्षमता)
  • या-अली
  • पावेह
  • राद

ड्रोन तकनीक ईरान की रणनीति का अहम हिस्सा है। ये मिसाइलों की तुलना में धीमे और सस्ते होते हैं, लेकिन झुंड (स्वार्म) में लॉन्च किए जाएं तो दुश्मन की रक्षा प्रणाली को व्यस्त कर देते हैं। बंदरगाहों, हवाई अड्डों और तेल टर्मिनलों को घंटों तक बाधित रखना इनका उद्देश्य हो सकता है।


‘मिसाइल शहर’: भूमिगत किले

ईरान ने अपनी कई मिसाइलें भूमिगत सुरंगों और किलेबंद ठिकानों में छिपा रखी हैं, जिन्हें वह “मिसाइल शहर” कहता है। इन संरक्षित ठिकानों की वजह से किसी भी शुरुआती हवाई हमले में ईरान की पूरी क्षमता को नष्ट करना मुश्किल हो जाता है।

पश्चिमी सैन्य योजनाकार मानते हैं कि यही कारण है कि ईरान के साथ संघर्ष “लंबा और थकाऊ” हो सकता है।


होर्मुज जलडमरूमध्य: ऊर्जा का गला

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ईरान का प्रभाव केवल स्थलीय युद्ध तक सीमित नहीं है। Strait of Hormuz से होकर दुनिया के तेल और गैस का बड़ा हिस्सा गुजरता है।

नौसैनिक विकल्प:

  • जहाज-रोधी मिसाइलें
  • समुद्री खदानें
  • तेज़ गति वाले हमलावर जहाज

यदि ईरान यहां आवाजाही बाधित करता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में झटका तय है। दुनिया की प्रमुख शिपिंग कंपनियों, जिनमें Maersk भी शामिल है, ने क्षेत्र में जोखिम के कारण रूट बदलने या संचालन रोकने जैसे कदम उठाए हैं। इससे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है।


हाइपरसोनिक दावा: ‘फत्ताह’ श्रृंखला

ईरान का दावा है कि उसकी फत्ताह श्रृंखला की हाइपरसोनिक मिसाइलें अत्यंत फुर्तीली हैं और मौजूदा एयर डिफेंस को चकमा दे सकती हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, लेकिन मनोवैज्ञानिक प्रभाव बड़ा है—यह संदेश कि ईरान तकनीकी रूप से पीछे नहीं है।


प्रॉक्सी नेटवर्क: ‘प्रतिरोध की धुरी’

ईरान की सैन्य रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ उसका क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क है, जिसे वह “Axis of Resistance” कहता है।

1. लेबनान का हिज़्बुल्लाह

Hezbollah ईरान का सबसे शक्तिशाली सहयोगी माना जाता है। इसके पास लाखों रॉकेट और मिसाइलें होने का अनुमान है। उत्तरी इज़राइल पर लगातार हमलों से इज़राइल को अपनी उत्तरी सीमा पर भारी सैनिक तैनाती करनी पड़ती है, जिससे उसकी अन्य मोर्चों पर क्षमता प्रभावित होती है।

2. यमन के हौथी (अंसारुल्लाह)

Houthi movement लाल सागर और अदन की खाड़ी में जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले कर रहे हैं। ये इज़राइल के दक्षिणी बंदरगाह एलात तक निशाना साध चुके हैं। उनका लक्ष्य पश्चिमी देशों पर आर्थिक दबाव बनाना है।

3. इराक और सीरिया की शिया मिलिशिया

कटाइब हिजबुल्लाह और हरकत अल-नुजाबा जैसे समूह इराक और सीरिया में अमेरिकी अड्डों पर रॉकेट और ड्रोन हमले करते रहे हैं। इन समूहों की सक्रियता से अमेरिका को क्षेत्र में अपने सैनिकों की सुरक्षा बढ़ानी पड़ती है।

4. गाज़ा में हमास और इस्लामिक जिहाद

भारी नुकसान के बावजूद, ये संगठन इज़राइली सेना को गाज़ा में व्यस्त रखे हुए हैं, जिससे बहु-मोर्चीय युद्ध का दबाव बनता है।


क्या यह लंबा युद्ध बन सकता है?

ईरान का संदेश स्पष्ट है—उसकी धरती पर हमला “सीमित कार्रवाई” नहीं बल्कि “पूर्ण युद्ध” माना जाएगा। खामेनेई की मौत के बाद यह रुख और कठोर हुआ है।

यदि मिसाइल हमले, ड्रोन स्वार्म, नौसैनिक अवरोध और प्रॉक्सी नेटवर्क एक साथ सक्रिय रहते हैं, तो यह संघर्ष केवल ईरान और इज़राइल तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें लेबनान, यमन, इराक और संभवतः खाड़ी देश भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हो सकते हैं।


निष्कर्ष: शक्ति का संतुलन या विनाश का चक्र?

ईरान के पास अमेरिका या इज़राइल जैसी आधुनिक वायुसेना नहीं है, लेकिन उसके पास लंबी दूरी की मिसाइलें, भूमिगत ठिकाने, ड्रोन नेटवर्क, समुद्री अवरोध की क्षमता और क्षेत्रीय सहयोगियों का जाल है।

युद्ध का परिणाम केवल सैन्य क्षमता पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि इस बात पर भी कि कौन पक्ष कितने लंबे समय तक आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव झेल सकता है।

फिलहाल, मध्यपूर्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर मिसाइल लॉन्च केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता पर सीधा असर डाल सकता है।

दुनिया की निगाहें अब तेहरान, तेल अवीव और वॉशिंगटन पर टिकी हैं—क्या कूटनीति आख़िरी क्षण में हस्तक्षेप करेगी, या यह संघर्ष एक लंबे, बहु-मोर्चीय युद्ध में बदल जाएगा?