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ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: मध्य पूर्व में शांति का दावा, वैश्विक राजनीति में नई बहस

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक राजनीति में एक बार फिर बड़ा और विवादास्पद कदम उठाते हुए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) के चार्टर का औपचारिक रूप से शुभारंभ कर दिया है। स्विट्ज़रलैंड के दावोस में गुरुवार को आयोजित एक उच्चस्तरीय समारोह में इस चार्टर पर ट्रंप सहित कई देशों के प्रमुख नेताओं और मंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। ट्रंप प्रशासन इसे अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए एक नई वैश्विक संस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका मुख्य फोकस फिलहाल ग़ज़ा और व्यापक रूप से मध्य पूर्व में शांति स्थापित करना बताया जा रहा है।

समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार, हस्ताक्षर समारोह के दौरान व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने घोषणा की कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का चार्टर अब पूरी तरह लागू हो चुका है और यह संस्था आधिकारिक रूप से एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में अस्तित्व में आ गई है। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को बधाई देते हुए कहा कि यह पहल वैश्विक शांति प्रयासों में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है।

पाकिस्तान सहित कई देशों की भागीदारी

इस चार्टर पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख नेताओं में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ भी शामिल हैं। उनके अलावा सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद, जॉर्डन के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री अयमान सफ़दी, तथा क़तर के प्रधानमंत्री शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुर्रहमान अल थानी ने भी इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। कुल मिलाकर 19 देशों के प्रतिनिधि इस समारोह में मौजूद थे, जिनमें बहुसंख्यक अरब और इस्लामी देश शामिल थे।

मिस्र की ओर से यह बताया गया कि राष्ट्रपति अब्दुल फ़त्ताह अल-सीसी ने ट्रंप की आमंत्रण को स्वीकार कर लिया था, लेकिन वे समारोह के दौरान मंच पर उपस्थित नहीं थे। इस तथ्य ने भी अंतरराष्ट्रीय हलकों में कई सवाल खड़े किए हैं।

ग़ज़ा पर विशेष फोकस, लेकिन एजेंडा व्यापक

राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की अध्यक्षता वे स्वयं करेंगे। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य ग़ज़ा में अंतरिम प्रशासन की निगरानी करना और युद्ध के बाद वहां के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना बताया गया है। ट्रंप के अनुसार, यह पहल केवल युद्धविराम तक सीमित नहीं होगी, बल्कि ग़ज़ा में दीर्घकालिक स्थिरता और शासन व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेगी।

हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि वे चाहते हैं कि यह बोर्ड ग़ज़ा की रुकी हुई युद्धविराम प्रक्रिया से आगे बढ़कर दुनिया के अन्य बड़े और जटिल संघर्षों पर भी ध्यान दे। अपने लगभग 20 मिनट लंबे भाषण में उन्होंने कहा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर “दुनिया के लिए कुछ महान” हासिल करने की दिशा में काम करेगा।

संयुक्त राष्ट्र के साथ तालमेल का दावा

अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा, “जब यह बोर्ड पूरी तरह से गठित हो जाएगा, तब हम लगभग वह सब कुछ कर सकेंगे जो हम करना चाहते हैं, और हम यह संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर करेंगे।” उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की क्षमता की प्रशंसा करते हुए साथ ही उसकी आलोचना भी की और कहा कि वैश्विक संस्था में “अपार संभावनाएं” हैं, जिन्हें कभी पूरी तरह साकार नहीं किया जा सका। उनके अनुसार, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ संयुक्त राष्ट्र के शांति-स्थापना के जनादेश को मजबूती प्रदान करेगा।

ग़ज़ा को ‘निरस्त्र’ करने की बात, हमास को चेतावनी

ग़ज़ा को लेकर ट्रंप का रुख़ बेहद सख्त दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि बोर्ड यह सुनिश्चित करेगा कि ग़ज़ा को “निरस्त्र” किया जाए, वहां “उचित शासन” स्थापित हो और क्षेत्र का “सुंदर तरीके से पुनर्निर्माण” किया जाए। इसी संदर्भ में उन्होंने हमास को खुली चेतावनी दी कि यदि संगठन ने हथियार नहीं छोड़े, तो उसका “अस्तित्व समाप्त कर दिया जाएगा।”

ट्रंप ने कहा, “अगर हमास वह नहीं करता जिसका उसने वादा किया है… मेरा मानना है कि शायद वे करेंगे… लेकिन वे ऐसे लोग हैं जो राइफल लेकर पैदा हुए हैं।” इस बयान को कई विश्लेषक अत्यंत आक्रामक और भड़काऊ मान रहे हैं।

ट्रंप के दावे: नौ महीनों में आठ संघर्ष समाप्त

अपने भाषण में राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उनके कार्यकाल में अमेरिका ने केवल नौ महीनों के भीतर आठ अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को समाप्त किया है। उन्होंने यह भी कहा कि वे यूक्रेन युद्ध को जल्द समाप्त करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने ईरान को कमजोर करने, सीरिया में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के खिलाफ अभियानों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अपनी प्रशासन की कोशिशों का उल्लेख किया।

ईरान के संदर्भ में ट्रंप ने पिछले वर्ष जून में ईरानी परमाणु ठिकानों पर किए गए अमेरिकी हमलों का हवाला देते हुए दावा किया कि अमेरिका ने ईरान की परमाणु क्षमता को “पूरी तरह नष्ट” कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि तेहरान अब बातचीत करना चाहता है और वह बातचीत करेगा।

वैश्विक समर्थन और पश्चिमी देशों की दूरी

ट्रंप का दावा है कि 59 देशों ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के उनके प्रस्ताव का समर्थन किया है, हालांकि सदस्य देशों की पूरी सूची अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के पारंपरिक पश्चिमी सहयोगी इस बोर्ड में शामिल होने से हिचकिचाते नज़र आए हैं।

फ्रांस ने ग़ज़ा पीस बोर्ड में शामिल होने से साफ़ इनकार कर दिया है, जबकि ब्रिटेन ने कहा है कि वह फिलहाल इसमें शामिल नहीं हो रहा। चीन ने अब तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट रुख़ नहीं अपनाया है और रूस ने कहा है कि वह इस प्रस्ताव का अध्ययन कर रहा है।

ट्रंप ने पहले यह सुझाव भी दिया था कि इस बोर्ड के स्थायी सदस्य देशों को प्रति देश एक अरब डॉलर की वित्तीय सहायता देनी चाहिए। इस प्रस्ताव पर पश्चिमी सहयोगियों की प्रतिक्रिया सतर्क रही और कई देशों ने इस निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया।

प्रमुख चेहरे और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

‘बोर्ड ऑफ पीस’ के प्रमुख सदस्यों में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, ग़ज़ा के लिए अमेरिकी वार्ताकार जेरड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ, तथा ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर शामिल हैं। इस बोर्ड की औपचारिक पुष्टि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक प्रस्ताव के माध्यम से की गई है, जो ट्रंप के ग़ज़ा शांति योजना का हिस्सा है।

संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता रोलांडो गोमेज़ ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र का इस बोर्ड के साथ सहयोग उसी प्रस्ताव के दायरे में सीमित रहेगा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यूएन इस पहल को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध होने से पहले सावधानी बरत रहा है।

शांति की पहल या नई शक्ति राजनीति?

‘बोर्ड ऑफ पीस’ को ट्रंप ने “मध्य पूर्व में शांति” की दिशा में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व कदम बताया है, जिसके बारे में उनके अनुसार “किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।” लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल जहां एक ओर नई संभावनाएं खोलती है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका की शक्ति राजनीति और एकतरफा दृष्टिकोण को भी उजागर करती है।

आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ वास्तव में मध्य पूर्व और विश्व में शांति स्थापित करने का प्रभावी माध्यम बनता है या फिर यह भी वैश्विक राजनीति की एक और विवादास्पद प्रयोगशाला साबित होता है।