Culture

भपंग के युवा सितारे यूसुफ खान जोगी मेवाती

मेवात/अलवर।
लोक संस्कृति किसी भी समाज की आत्मा होती है और उसे जीवित रखने वाले कलाकार उस आत्मा के सच्चे संरक्षक। राजस्थान के मेवात क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आज भी जिन लोगों ने संभाल रखा है, उनमें युवा लोक कलाकार यूसुफ खान जोगी मेवाती का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। भपंग वादन की दुर्लभ परंपरा को नई पहचान दिलाने वाले यूसुफ खान न केवल मेवात बल्कि पूरे देश में लोक कला के युवा चेहरे के रूप में उभरे हैं।

हाल ही में प्रसिद्ध लोक कलाकार गफरुद्दीन जोगी मेवाती को पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद मेवात में लोक कलाकारों और उनकी विरासत को लेकर नई चर्चा शुरू हुई है। इस चर्चा में स्वर्गीय जहूर खान जोगी मेवाती और उनके परिवार के योगदान का भी उल्लेख किया जा रहा है। इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कलाकार हैं यूसुफ खान जोगी मेवाती, जो आज मेवाती लोक संस्कृति के सबसे सक्रिय और चर्चित प्रतिनिधियों में गिने जाते हैं।

विरासत में मिली भपंग की साधना

अलवर जिले के मुंगास्का गांव में 3 दिसंबर 1995 को जन्मे यूसुफ खान बचपन से ही संगीत और लोक परंपराओं के माहौल में पले-बढ़े। उनके दादा स्वर्गीय जहूर खान जोगी मेवाती और पिता स्वर्गीय उमर फारुख दोनों ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले लोक कलाकार रहे हैं।

यूसुफ खान ने भपंग वादन की शिक्षा अपने दादा जहूर खान से प्राप्त की। उन्होंने न केवल इस कला को सीखा बल्कि उसकी आत्मा और परंपरा को भी समझा। आज वे अपने परिवार की कई पीढ़ियों से चली आ रही इस सांस्कृतिक धरोहर के सबसे प्रमुख उत्तराधिकारी माने जाते हैं।

क्या है भपंग और क्यों है खास?

भपंग राजस्थान और विशेष रूप से मेवात क्षेत्र का एक अनूठा पारंपरिक वाद्य यंत्र है। इसे कई लोग ‘टॉकिंग ड्रम’ भी कहते हैं क्योंकि इसकी ध्वनि में बोलने जैसी लयात्मक विशेषता होती है।

लोक मान्यताओं के अनुसार भपंग की उत्पत्ति भगवान शिव के डमरू से मानी जाती है। एक तरफ चमड़ा, बीच में तार और दूसरी ओर लकड़ी के गुटके से तैयार यह वाद्य कलाकार की उंगलियों और हाथों की गति के साथ अद्भुत संगीत उत्पन्न करता है।

मेवात में यह वाद्य विशेष रूप से शिवरात्रि और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में बजाया जाता है। समय के साथ जब कई लोक वाद्य विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए, तब यूसुफ खान जैसे कलाकारों ने भपंग को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाकर उसे नया जीवन दिया।

इंजीनियरिंग छोड़ चुना लोक संस्कृति का रास्ता

आज के समय में जब अधिकांश युवा आधुनिक करियर और कॉर्पोरेट नौकरियों की ओर आकर्षित होते हैं, यूसुफ खान का सफर अलग है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बावजूद उन्होंने अपनी पारिवारिक कला और सांस्कृतिक विरासत को ही जीवन का उद्देश्य बनाया।

उनका मानना है कि यदि युवा अपनी जड़ों से कट जाएंगे तो आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान खो देंगी। यही सोच उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाती है।

20 से अधिक देशों में गूंजी मेवात की आवाज

यूसुफ खान जोगी मेवाती ने अपनी कला का प्रदर्शन भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में किया है। अब तक वे पुर्तगाल, बेल्जियम, पोलैंड, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, जापान और नेपाल सहित 20 से अधिक देशों में भपंग वादन प्रस्तुत कर चुके हैं।

उनकी प्रस्तुतियों ने विदेशी दर्शकों को भी भारतीय लोक संगीत और मेवाती संस्कृति से परिचित कराया है। यह उपलब्धि किसी भी लोक कलाकार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

उनकी कला की पहुंच का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग के सामने भी अपनी प्रस्तुति दी। इसके अलावा लोकप्रिय टेलीविजन कार्यक्रम “इंडियाज गॉट टैलेंट” तथा दूरदर्शन के कार्यक्रम “जानो अपना देश सुनो कहानी” में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

राष्ट्रीय संस्थानों ने भी सराहा योगदान

यूसुफ खान को संगीत और लोक संस्कृति के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर आमंत्रित किया गया है।

वे आकाशवाणी जयपुर से बी-हाई ग्रेड कलाकार हैं। इसके अलावा उन्होंने संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) जैसे प्रमुख संस्थानों के कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुतियां दी हैं।

संस्कृति मंत्रालय द्वारा वर्ष 2025-26 की जूनियर फेलोशिप के लिए उनका चयन भी इस बात का प्रमाण है कि लोक कला संरक्षण के क्षेत्र में उनका कार्य राष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा रहा है।

अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित

यूसुफ खान को अब तक कई महत्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। इनमें वर्ष 2024 का उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा राष्ट्रीय पुरस्कार, वर्ष 2023 का राजस्थान संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार तथा वर्ष 2018 का स्टेट अवार्ड प्रमुख हैं।

इसके अतिरिक्त उन्हें राजस्थान गौरव, अलवर गौरव और जिला प्रशासन द्वारा भी कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

मेवात की लोक कथाओं को दिया लिखित स्वरूप

यूसुफ खान का सबसे महत्वपूर्ण योगदान केवल संगीत तक सीमित नहीं है। वे मेवात की मौखिक परंपराओं को संरक्षित करने का भी ऐतिहासिक कार्य कर रहे हैं।

सदियों से मेवात की लोक कथाएं केवल लोगों की स्मृति और जुबान में जीवित थीं। इनके लुप्त होने का खतरा लगातार बढ़ रहा था। ऐसे समय में यूसुफ खान ने 17 प्रमुख मेवाती लोक कथाओं को लिखित रूप देने का कार्य शुरू किया।

इनमें “पांडव का कड़ा”, “कृष्णलीला”, “लंका चढ़ाई”, “ढोला मारवन” और “जाहर पीर की बात” जैसी महत्वपूर्ण लोक गाथाएं शामिल हैं।

विशेष रूप से महाभारत पर आधारित मेवाती लोक गाथा “पांडव का कड़ा” को पहली बार व्यवस्थित रूप से लिपिबद्ध करना सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे विरासत

यूसुफ खान केवल स्वयं कलाकार बनकर संतुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहें। इसी उद्देश्य से वे अपने बच्चों और युवाओं को भपंग वादन तथा मेवाती लोक परंपराओं की शिक्षा दे रहे हैं।

उनका मानना है कि संस्कृति तभी जीवित रहती है जब उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। यही सोच उन्हें एक कलाकार से आगे बढ़कर सांस्कृतिक संरक्षक बनाती है।

मेवात की सांस्कृतिक पहचान का नया चेहरा

आज जब वैश्वीकरण और आधुनिकता के प्रभाव में लोक कलाएं धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही हैं, तब यूसुफ खान जोगी मेवाती उम्मीद की एक मजबूत किरण बनकर उभरे हैं।

वे केवल भपंग वादक नहीं, बल्कि मेवात की संस्कृति, भाषा, लोक साहित्य और परंपराओं के जीवंत प्रतिनिधि हैं। जिस तरह उनके दादा स्वर्गीय जहूर खान जोगी मेवाती ने दुनिया भर में मेवात का नाम रोशन किया था, उसी तरह यूसुफ खान नई पीढ़ी में उस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

उनकी कहानी यह साबित करती है कि यदि समर्पण, प्रतिभा और अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम हो तो लोक कला केवल अतीत की विरासत नहीं रहती, बल्कि भविष्य की पहचान भी बन जाती है। यूसुफ खान जोगी मेवाती आज उसी पहचान के सबसे मजबूत वाहक हैं।