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ईरान-इज़रायल युद्ध: एक डरे हुए मुल्क की हकीकत और ईरान की रणनीतिक बढ़त

मुस्लिम नाउ विशेष

मुस्लिम नाउ अपने विभिन्न आलेखों के माध्यम से पहले भी यह तथ्य प्रस्तुत करता रहा है कि इज़रायल विश्व समुदाय के सामने जितना मज़बूत और अभेद्य दिखने की कोशिश करता है, उसकी असली स्थिति उससे बिल्कुल अलग है। उसकी सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में कमजोर है और उसकी खुफिया एजेंसियां भी स्लीपर सेल की तरह संचालित होती हैं — यानि सतत भय की स्थिति में। यही डर उसे बार-बार ग़ाज़ा, लेबनान और सीरिया जैसे पड़ोसी क्षेत्रों पर हमले के लिए उकसाता है, ताकि वह अपनी आक्रामकता से अपनी असुरक्षा को छिपा सके।

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सद्दाम हुसैन को विलेन बनाकर अमेरिका से उन्हें मरवाना इसी रणनीति का हिस्सा था। मगर ईरान जैसे मज़बूत और आत्मनिर्भर देश से पंगा लेना इज़रायल के लिए भारी पड़ रहा है। युद्ध के शुरुआती चरणों में ही तेल अवीव जैसे शहर भारी तबाही का सामना कर रहे हैं। मशहूर UPSC शिक्षक समीर सिद्दीकी ने अपने विश्लेषणात्मक वीडियो में इज़रायल की सुरक्षा खामियों को उजागर किया है।

समीर सिद्दीकी ईरान की सैन्य रणनीति की तारीफ़ करते हुए बताते हैं कि अमेरिका को अंततः इज़रायल का साथ देना पड़ा, लेकिन वह खुद यूक्रेन-रूस युद्ध में उलझा हुआ है और उसकी क्षमताएं सीमित हैं। सिद्दीकी का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब पारंपरिक सैनिक ताक़त के बजाय एआई-सक्षम रक्षा प्रणालियों, सॉफ्टवेयर, मिसाइल टेक्नोलॉजी और एयरोस्पेस शक्ति पर आधारित हो चुके हैं — और यही ईरान-इज़रायल संघर्ष में स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

इज़रायल का मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम दुनिया भर में जाना जाता है — जिसमें एरो-3 सिस्टम 2400 नॉटिकल मील दूर से मिसाइल को पहचान कर नष्ट करने में सक्षम है, एरो-2 सिस्टम इसे और पास से संभालता है और अंततः आयरन डोम सिस्टम छोटे रॉकेट्स और मिसाइलों को हवा में रोकने का काम करता है। लेकिन 7 अक्टूबर की घटना, जिसमें ग़ाज़ा के लड़ाके इज़रायल में घुसकर 1200 से अधिक लोगों को मार गए थे, इस सिस्टम की गंभीर विफलता को उजागर करती है।

समीर सिद्दीकी बताते हैं कि ईरान ने बड़ी चतुराई से डमी ड्रोन और मिसाइलों की झुंड भेजकर इज़रायली डिफेंस सिस्टम को भ्रमित कर दिया। जब एक साथ सैकड़ों डमी ड्रोन और मिसाइल उड़ते हैं, तो सिस्टम तय नहीं कर पाता कि किसे पहले रोका जाए। इसी भ्रम का फायदा उठाकर ईरान के असली मिसाइल इज़रायल की धरती पर तबाही मचाने में सफल हो जाते हैं।

समीर के अनुसार, इज़रायल के इंटरसेप्टर रॉकेट्स अब कम पड़ने लगे हैं — जिन्हें बनाना ना केवल महंगा है, बल्कि समय भी बहुत लगता है। यही वजह है कि अमेरिका को हस्तक्षेप करना पड़ा और अपने पास मौजूद ‘थाड’ सिस्टम की मदद देने की घोषणा की, जो मिसाइलों को हवा में नष्ट करता है। लेकिन अमेरिका के पास भी इनकी संख्या सीमित है — केवल 600 — जो कि यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में पहले से उपयोग में हैं।

इस स्थिति में यदि इज़रायल को बाहरी समर्थन पूरी तरह ना मिले, तो उसकी सुरक्षा व्यवस्था टिक नहीं पाएगी। फिलहाल वह जो कुछ कर रहा है — वह दिखावे से अधिक कुछ नहीं है।

इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि तकनीक, रणनीति और आत्मबल के आधार पर ईरान इज़रायल पर बढ़त बनाए हुए है, और जिस इज़रायल को अजेय माना जाता था, वह आज असहाय दिखाई दे रहा है।