अरब मीडिया की चुप्पी: ईरान के खिलाफ सूचना युद्ध का पर्दाफाश
मुस्लिम नाउ विशेष
जिस तरह मुस्लिम देशों की सरकारें ईरान के समर्थन से दूर नजर आ रही हैं, ठीक उसी तरह उनकी मीडिया भी ईरान की हिम्मत तोड़ने में जुटी हुई है। कई बड़े मुस्लिम देशों के सरकारी या प्रभावशाली मीडिया हाउस केवल ईरान की तबाही की तस्वीरें दिखा रहे हैं, जबकि इज़रायल को लेकर सकारात्मक और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जा रही खबरें इनकी प्राथमिकता बन गई हैं।
ALSO READ ईरान-इज़रायल युद्ध: मुसलमानों की बेबसी और इस्लामी देशों की खामोशी पर सवाल

अमेरिकी और पश्चिमी एजेंसियों जैसे रॉयटर्स और एएफपी द्वारा इज़रायल को केंद्र में रखकर रिपोर्टिंग की जा रही है। यदि कभी इज़रायल में हुई क्षति को दिखाया भी जाता है, तो इस तरह कि जैसे ईरान जानबूझकर आम नागरिकों को निशाना बना रहा हो। इसके उलट, सच्चाई यह है कि इज़रायली हमलों में अब तक ईरान में 400 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, लेकिन अरब और बाकी मुस्लिम देशों की मीडिया में यह आंकड़े लगभग ग़ाज़ा की 80,000 मौतों की तरह ही गायब हैं।
ईरान-इज़रायल युद्ध के बीच मुस्लिम देशों का रवैया एक मूक दर्शक जैसा रहा है। किसी भी बड़े मुस्लिम देश ने अभी तक ईरान के समर्थन में एक ठोस बयान तक नहीं दिया है। उदाहरण के तौर पर, पाकिस्तान – जो अक्सर मुस्लिम भावनाओं को भड़काने वाला देश माना जाता है – उसका सेना प्रमुख जनरल मुनीर अमेरिका के उसी राष्ट्रपति के साथ भोज पर बैठा दिख रहा है, जिस पर ग़ाज़ा में नरसंहार और ईरान को युद्ध में धकेलने के आरोप हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि दुनिया के दस देशों के पास परमाणु हथियार हैं, जिनमें खुद इज़रायल भी शामिल है – वही इज़रायल, जो ईरान पर केवल परमाणु कार्यक्रम के संदेह में हमला कर रहा है। इसके बावजूद मुस्लिम देशों की मीडिया का कोई भी हिस्सा इस दोहरे मापदंड पर गंभीर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं कर रहा।

अरब न्यूज, गल्फ न्यूज, और अल जज़ीरा जैसे प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्म्स का रवैया बेहद निराशाजनक है। द टाइम्स ऑफ इज़रायल जैसी यहूदी मीडिया तो अपने देश की कमजोरियों, हमलों और युद्ध के वास्तविक परिणामों को भी ईमानदारी से रिपोर्ट कर रही है, लेकिन इन अरब मीडिया हाउसों की रिपोर्टिंग ऐसी है मानो ईरान पूरी तरह खत्म हो चुका हो, और इज़रायल ही एकमात्र पीड़ित देश है।
इनकी हेडलाइंस देखकर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि ये किसी मुस्लिम देश की मीडिया है। और यह उस ईरान के विरुद्ध खड़ा है, जो दुनिया भर में मुस्लिमों पर होने वाले हर अत्याचार के खिलाफ सबसे मुखर रहा है।
अरब शासक तो अपनी ही दुनिया में मग्न हैं। धन और विलासिता की लालसा में उन्होंने अपनी संस्कृति तक को गिरवी रख दिया है। गल्फ न्यूज जैसे मीडिया संस्थान अब केवल चमचमाती इमारतों, लग्ज़री कारों और शाही जीवनशैली की कहानियां दिखाते हैं — जबकि आम लोगों, मज़लूमों, और जन सरोकारों से उनका कोई लेना-देना नहीं रह गया।
आज जब ईरान अपनी अस्मिता और मज़लूम मुसलमानों के हक में लड़ रहा है, तब अरब मीडिया की चुप्पी इतिहास में एक कड़वी मिसाल बनती जा रही है।

