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ईरान-इजरायल युद्ध ने खोल दी इस्लामिक देशों और मीडिया की पोल

मुस्लिम नाउ विशेष

ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध के दौरान इस्लामिक देशों, ओआईसी और इनके मीडिया का रवैया देखकर यह स्पष्ट हो गया कि ये वास्तव में दुनिया भर के मुसलमानों के सच्चे हमदर्द नहीं हैं। इनका मुख्य मकसद सिर्फ गैर-इस्लामिक देशों में रह रहे मुसलमानों को उकसाना और वहां की सरकारों को अस्थिर करना रहा है। इस्लामिक देश इन विदेशी मुस्लिम संगठनों को चंदा देकर उन्हें भड़काते हैं, और फिर यही संगठन कभी मस्जिद, कभी मदरसा, कभी उर्दू और कभी उम्मा के नाम पर हंगामा करके अपने देशों की सरकारों को मुश्किल में डालते हैं।

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ईरान-इज़रायल युद्ध: मुसलमानों की बेबसी और इस्लामी देशों की खामोशी पर सवाल

दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन इस्लामिक देशों की वजह से पूरी दुनिया में मुसलमानों की छवि एक ‘आतंकवादी कौम’ के रूप में बनाई जा चुकी है। आम लोगों के मन में यह धारणा बैठ गई है कि ये जहां भी रहते हैं, वहां अशांति फैलाते हैं।

आज इस्लामिक जगत में शिया-सुन्नी विवाद भी इन्हीं सियासी ताकतों की देन है। जबकि एक ही कुरान, एक ही रसूल और एक ही नमाज-रोजा मानने वालों के बीच मसलक के नाम पर जो दीवारें खड़ी हुई हैं, वे कृत्रिम हैं। मगर जब इजरायल ने ईरान पर हमला किया, तब एक भी मुस्लिम देश खुलकर उसके समर्थन में नहीं आया। उल्टे कुछ देश तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इजरायल के साथ खड़े नजर आए।

यह वही इजरायल है जिसने गाजा में एक लाख से ज्यादा मासूमों को मौत के घाट उतारा, वही जिसने अमेरिका के साथ मिलकर सद्दाम हुसैन को फांसी पर चढ़वाया, और वही जिसने सीरिया, लेबनान और इराक को बर्बादी की ओर ढकेल दिया। अब वही इजरायल ईरान को खत्म करने की साजिश रच रहा है — इसके वैज्ञानिकों की हत्या की जा चुकी है, इसके सैन्य ठिकानों को बमों से उड़ाया जा रहा है। और यह सब दुनिया की आंखों के सामने हो रहा है।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उन इस्लामिक देशों की सरकारें, मीडिया और जनता — जो अक्सर कश्मीर या गाजा के नाम पर भावुक होकर बयानबाजी करते हैं — इस मसले पर एकदम खामोश नजर आए। अल-जज़ीरा, जो खुद को मुस्लिमों की आवाज़ बताता है, उसने पिछले कुछ दिनों में एक भी रिपोर्ट में इजरायल को खुलकर दोषी नहीं ठहराया।

ईरान को परमाणु हथियारों से दूर रखने के लिए वर्षों से उस पर आर्थिक पाबंदियां लगाई जा रही हैं, जबकि इजरायल और अमेरिका खुद ऐसे हथियारों से लैस हैं। जब ईरान ने आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाए, तो उस पर हमले किए गए — लेकिन न तो अल-जज़ीरा, न अरब न्यूज, न खलीज टाइम्स और न ही पाकिस्तान का मीडिया इस अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ।

दुनिया भर के मुसलमानों में निराशा तब और बढ़ गई जब मुस्लिम देशों की जनता भी इस मुद्दे पर बिल्कुल चुप रही। उनका जमीर जैसे मर चुका है।

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने इस चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। इसके बाद यह मांग भी उठने लगी है कि जब OIC अपने सदस्य देशों का साथ नहीं दे सकता, तो उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती — उसे भंग कर देना चाहिए। साथ ही यह भी आवाज़ें उठ रही हैं कि मक्का-मदीना और हज का प्रबंधन केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहना चाहिए; इसमें पूरे मुस्लिम जगत की भागीदारी होनी चाहिए।

इस युद्ध के दौरान जो सच्चाई सामने आई है, वह आने वाले समय में इन इस्लामिक देशों के लिए ही मुसीबत बनने वाली है। इनमें से कई देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं, जो भविष्य में इन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल हो सकते हैं। अमेरिका और इजरायल किसी को भी अपने खिलाफ मजबूत होते नहीं देख सकते।

अगर आज ये मुस्लिम देश एकजुटता दिखाते, तो अमेरिका और इजरायल को भी समझ आता कि अब 2003 का इराक दोहराना आसान नहीं है। मगर अफसोस, इस्लामी एकता केवल भाषणों में ही सिमटकर रह गई है।