उर्दू की वैश्विक आवाज़: शेख इब्राहीम की लगन और समर्पण की कहानी
मुस्लिम नाउ ब्यूरो,हैदराबाद
ग़ालिब, फैज़ और इक़बाल की ज़बान उर्दू से किसे मोहब्बत नहीं? यह ज़बान किसी दरिया की तरह बहती है, जिसमें तहज़ीब, अदब और सोच की सदियों पुरानी रवायतें समाई हैं। आज के दौर में, जब क्षेत्रीय भाषाएं वैश्विक भाषाओं की दौड़ में पीछे छूटती जा रही हैं, कुछ ही लोग होते हैं जो इन भाषाओं को बचाने के लिए समर्पित होते हैं। शेख इब्राहीम ऐसे ही बिरले लोगों में से एक हैं। उनके लिए उर्दू सिर्फ़ एक भाषा नहीं, बल्कि एक ज़िंदगी का अंदाज़ है। वह उर्दू को जीते हैं, उसे ओढ़ते-बिछाते हैं। बीते 25 वर्षों से वे देश और विदेश में उर्दू को ज़िंदा रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं।
शौक़ से फ़िलैटेली, जुनून से उर्दू का सेवा
शेख इब्राहीम पेशे से एक फिलैटेलिस्ट (डाक टिकट संग्राहक) हैं, लेकिन उनके दिल में उर्दू के लिए जो जुनून है, वह उनके हर काम में झलकता है। जब वे सऊदी अरब में काम कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि वहां की उर्दू महफ़िलें धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं। लेकिन उन्होंने हालात पर रोने के बजाय कुछ करने का फैसला किया। उन्होंने उर्दू महफ़िलें, मुशायरे और साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन शुरू किया, ताकि खाड़ी देशों में बसे भारतीय प्रवासियों में उर्दू के प्रति लगाव बना रहे।
“आज़ाद” है पहचान
साल 2000 में जब जेद्दा में उर्दू अकादमी की स्थापना हुई, तब से शेख इब्राहीम इसकी मज़बूत नींव का हिस्सा रहे हैं। अकादमी की साहित्यिक पत्रिका “आज़ाद” के प्रधान संपादक के रूप में उन्होंने हर अंक को शायरी, गद्य, आलोचना और समकालीन चिंतन से भरपूर बनाया। इस पत्रिका ने उर्दू की समृद्ध विरासत को संजोने और आगे बढ़ाने का कार्य किया है।

रजत जयंती और शिक्षा नीति पर विशेषांक
अब जब अकादमी अपनी रजत जयंती मना रही है, शेख इब्राहीम “आज़ाद” के एक विशेष संस्करण का संपादन कर रहे हैं, जिसमें अकादमी की यात्रा, उर्दू शिक्षा के उत्थान और नई शिक्षा नीति (NEP) के प्रभाव को रेखांकित किया जाएगा। साथ ही इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब पर विशेष लेख और उनकी कालजयी ग़ज़लों का चयन भी शामिल होगा।
इस विशेष अंक का विमोचन 11 नवंबर को किया जाएगा — मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती पर। यह दिन भारत के पहले शिक्षा मंत्री की स्मृति में समर्पित है, जो उर्दू साहित्य और शिक्षा के स्तंभ माने जाते हैं।
उर्दू अकादमी, जेद्दा की उपलब्धियाँ
केवल पत्रिकाओं तक सीमित नहीं, जेद्दा की उर्दू अकादमी ने शेख इब्राहीम की अगुवाई में शिक्षा के क्षेत्र में ठोस प्रयास किए हैं। हर वर्ष उर्दू माध्यम के स्कूलों के टॉपर्स को स्वर्ण पदक और नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता है, ताकि छात्र उर्दू से जुड़ाव बनाए रखें।
डाक टिकटों में इतिहास और उर्दू में आत्मा
शेख इब्राहीम न केवल उर्दू के संरक्षक हैं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के फिलैटेलिस्ट भी हैं। उन्होंने सऊदी अरब की फिलैटेलिक सोसायटी का प्रतिनिधित्व कई मंचों पर किया और अब तक 9 अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। उनके अनुसार, “डाक टिकट और उर्दू, दोनों ही विरासत को संजोने का माध्यम हैं — एक तस्वीरों से, तो दूसरा अल्फ़ाज़ से।”
जीवन भर की सेवा का सम्मान
उर्दू अकादमी, जेद्दा ने हाल ही में उन्हें “लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड” से नवाज़ा। यह सम्मान उन्हें हैदराबाद में एक भव्य समारोह में दिया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में सियासत उर्दू दैनिक के न्यूज़ एडिटर और विधान परिषद सदस्य अमर अली खान उपस्थित थे।
सम्मान मिलने के बाद भी शेख इब्राहीम ने पूरी विनम्रता से कहा,
“असली इनाम तब है जब कोई युवा उर्दू में दिलचस्पी लेता है। अगर मैंने किसी एक आत्मा में भी उर्दू का दीया जलाया है, तो मेरी मेहनत सफल है।”
एक प्रेरक जीवन यात्रा
शेख इब्राहीम का जीवन इस बात की मिसाल है कि जुनून अगर सच्चा हो, तो अकेले भी कोई बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। उनके प्रयास आज की भागदौड़ और सतही सफलता के दौर में यह याद दिलाते हैं कि कुछ चीज़ें समय और समर्पण की मांग करती हैं।
वो अक्सर दाग़ देहलवी का यह शेर दोहराते हैं:
“तेरे ज़िक्र में कोई भी लफ़्ज़ अधूरा नहीं होता,
उर्दू है नाम जिसका, वो ज़बां तू ही तो है…”

