बीजेपी की बी टीम? ओवैसी के बयान ने बिहार की राजनीति में भूचाल मचा दिया
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली/पटना
बिहार की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। इस बार केंद्र में हैं एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और उनका एक चौंकाने वाला बयान, जिसने उन्हें हमेशा ‘बीजेपी की बी टीम’ बताने वाले विपक्ष को नया हथियार थमा दिया है। ओवैसी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को शर्त रखी है कि यदि वे सांप्रदायिकता से हाथ मिलाना छोड़ दें, तो उनकी पार्टी बिहार में जनता दल (यूनाइटेड)-भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार को समर्थन देने को तैयार है।
इस बयान ने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं: क्या ओवैसी अब खुलकर अप्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी का साथ देने को आमादा हैं? या यह बयान उनकी पार्टी के विधायकों को राष्ट्रीय जनता दल (RJD) में टूटने से बचाने की रणनीति है?
🧩 नीतीश की शर्त का गूढ़ार्थ
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में बीजेपी और जदयू साझेदार हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार न केवल केंद्र में मोदी सरकार के साथ हैं, बल्कि उन्होंने तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और वक्फ कानून जैसे मुस्लिम विरोधी एजेंडों पर भी पूर्ण समर्थन दिया है। ऐसे में, ओवैसी का नीतीश कुमार की सरकार को समर्थन देने का प्रस्ताव, जिसमें ‘सांप्रदायिकता से दूर रहने’ की शर्त है, विरोधाभासी और राजनीति से भरा हुआ लगता है।
दरअसल, ओवैसी ने यह टिप्पणी अपने दो दिवसीय सीमांचल दौरे के दौरान की। यह सीमांचल बिहार का वह मुस्लिम बहुल पूर्वोत्तर क्षेत्र है, जहाँ से एआईएमआईएम के पाँच उम्मीदवारों ने हालिया विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी।
हैदराबाद के सांसद ने अपने बयान में कहा: “हम पटना में बनी नई सरकार को शुभकामनाएँ देते हैं। हम पूरा सहयोग देने का वादा भी कर सकते हैं, बशर्ते वह सीमांचल क्षेत्र के साथ ‘न्याय’ करे और ‘सांप्रदायिकता’ को भी दूर रखे।”
🤝 बीजेपी का अप्रत्यक्ष समर्थन?
चूँकि नीतीश सरकार में बीजेपी सबसे बड़ी साझेदार है और वह अक्सर सीमांचल में “घुसपैठ” और “जनसांख्यिकीय असंतुलन” का आरोप लगाती रही है, इसलिए ओवैसी का यह बयान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी का यह प्रस्ताव, भले ही शर्तों के साथ हो, अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन को वैधता प्रदान करता है।
हालाँकि बिहार में फिलहाल गठबंधन से इतर किसी और से समर्थन की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन ओवैसी के बयान का इस्तेमाल अब खुले तौर पर उन्हें ‘बीजेपी की बी टीम’ साबित करने के लिए किया जा सकता है। यह बयान इस अटकल को और मजबूत करता है कि ओवैसी अपनी राजनीति को केंद्र में रखकर, विपक्ष (खासकर राजद) की कीमत पर, एनडीए के साथ परोक्ष समझौता करने को तैयार हैं।
ओवैसी ने स्पष्ट किया कि एआईएमआईएम सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि सीमांचल में रहने वाले सभी लोगों—जिसमें दलितों और आदिवासियों की भी अच्छी आबादी है—के लिए लड़ती रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नई सरकार इस उपेक्षित क्षेत्र पर ध्यान देगी और पटना तथा राजगीर तक ही सीमित नहीं रहेगी।
🎯 ‘एमवाई’ समीकरण पर सीधा हमला
अपने इस दौरे में, ओवैसी ने ‘इंडिया’ गठबंधन के सबसे बड़े घटक दल राजद (RJD) पर भी परोक्ष रूप से करारा निशाना साधा, जिसने विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम के गठबंधन अनुरोध को ठुकरा दिया था।
उन्होंने कहा, “यह साबित हो गया है कि जो लोग बीजेपी को रोकने के नाम पर मुसलमानों के वोट माँगते हैं, वे उस पार्टी को नहीं रोक पाएँगे। इसलिए, जो लोग एमवाई (मुस्लिम-यादव) गठबंधन पर भरोसा कर रहे हैं, उन्हें पुनर्विचार करना चाहिए।”
ओवैसी ने इस बात को हाईलाइट किया कि पिछले विधानसभा चुनावों में राजद की सीटें 75 से घटकर केवल 25 रह गईं। उनका यह बयान सीधे तौर पर राजद के पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार को चुनौती देता है, और यह बताने की कोशिश करता है कि बीजेपी को रोकने में पारंपरिक सेक्युलर पार्टियाँ विफल रही हैं।
कुल मिलाकर, ओवैसी का यह बयान बिहार की राजनीतिक जमीन को हिला देने वाला है। यह न केवल उनके विरोधियों को एक बड़ा राजनीतिक हथियार दे गया है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि वह सत्ता की राजनीति में अपने लिए जगह बनाने हेतु एक साहसिक (और कुछ लोगों के लिए विवादास्पद) दाँव खेल रहे हैं।

