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सूफी दरगाह पर हमला: उत्तराखंड में सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द पर संकट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता सार्वजनिक मंचों से बार-बार यह दावा करते रहे हैं कि उनकी राजनीति समाज के सबसे पिछड़े तबकों, विशेषकर तथाकथित ‘पसमांदा मुसलमानों’ और सूफी परंपरा के समर्थकों के हितों की रक्षा के लिए है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई इन दावों से बिल्कुल उलट नज़र आती है। जब-जब सूफी दरगाहों और धार्मिक स्थलों पर हमले होते हैं, तब-तब सत्ता पक्ष की चुप्पी असहज सवाल खड़े करती है।

उत्तराखंड के मसूरी में स्थित सूफी कवि बाबा बुल्ले शाह की दरगाह पर हालिया हमला इसी दोहरे चरित्र की एक और मिसाल है। रात के अंधेरे में दरगाह में की गई तोड़फोड़ न सिर्फ एक धार्मिक स्थल पर हमला है, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहज़ीब पर सीधा प्रहार है। हैरानी की बात यह है कि इस कुकृत्य के बावजूद राज्य और केंद्र, दोनों स्तरों पर भाजपा नेतृत्व की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

हाल ही में रिपोर्ट’ के ज़रिये उत्तराखंड में मस्जिदों और दरगाहों पर बढ़ते हमलों को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई थी। इसके बावजूद मसूरी की दरगाह की सुरक्षा बढ़ाने या संवेदनशील धार्मिक स्थलों पर अतिरिक्त निगरानी के बजाय प्रशासनिक उदासीनता ही देखने को मिली। नतीजतन, सूफी दरगाह पर हमला करने वाले असली दोषी अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं।

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इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर आक्रोश तेज़ है। कांग्रेस नेताओं से लेकर स्वतंत्र बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक ने वीडियो संदेशों और पोस्ट के ज़रिये इस हमले की कड़ी निंदा की है। सवाल यह भी है कि ऐसी घटनाएं उस राज्य में हो रही हैं, जिसे देश की सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। उत्तराखंड न केवल सीमावर्ती राज्य है, बल्कि यहां की सामाजिक शांति का सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।

सोशल मीडिया पर चर्चित टिप्पणी करते हुए इस्लामिक विद्वान और सामाजिक चिंतक डॉ. शुजात अली क़ादरी ने लिखा कि मसूरी में बाबा बुल्ले शाह की दरगाह को नुकसान पहुंचाना सिर्फ एक धार्मिक स्थल पर हमला नहीं, बल्कि हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत और आपसी सौहार्द पर सीधा प्रहार है। उन्होंने चिंता जताई कि किसी भी धार्मिक स्थल को ‘अवैध’ बताकर निशाना बनाना पहले ही समाज को विभाजित कर रहा है और इस तरह की तोड़फोड़ का बढ़ता चलन हालात को और गंभीर बना रहा है। डॉ. क़ादरी ने पुलिस और प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि दोषियों को सख़्त सज़ा दिए बिना शांति और विश्वास बहाल नहीं हो सकता।

वहीं कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि देहरादून में सूफी कवि बाबा बुल्ले शाह की मजार में कुछ लफंगे गुंडों द्वारा की गई तोड़फोड़ यह सवाल खड़ा करती है कि नफरत में अंधे ऐसे लोग देश को आखिर कहां ले जाना चाहते हैं।

दरअसल, सूफी परंपरा भारत की आत्मा रही है—एक ऐसी परंपरा जिसने धर्म, जाति और मज़हब से ऊपर उठकर प्रेम, इंसानियत और भाईचारे का संदेश दिया। सूफी दरगाहें सिर्फ इबादत की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संवाद के केंद्र रही हैं। ऐसे में इन पर हमले केवल मुस्लिम समुदाय का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज के लिए चेतावनी हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सत्ता में बैठे लोग सूफी-संतों और पसमांदा मुसलमानों के नाम पर राजनीति तो करेंगे, लेकिन जब उन्हीं की आस्था और विरासत पर हमला होगा, तब चुप्पी साध लेंगे? यदि ऐसा ही चलता रहा, तो यह चुप्पी न सिर्फ लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए ख़तरनाक होगी, बल्कि भारत की साझा संस्कृति के लिए भी गहरा घाव साबित होगी।