पाकिस्तान विस्फोट पर फारूक अब्दुल्ला का बयान, बोले-अल्लाह से दूर जा रही इंसानियत
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली / श्रीनगर
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के ग्रामीण इलाके तरलाई कलां में एक इमामबाड़ा के भीतर हुआ भीषण आत्मघाती विस्फोट न सिर्फ़ पाकिस्तान बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक गहरी चेतावनी बनकर सामने आया है। इस दर्दनाक हमले में अब तक 33 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 169 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इस घटना पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने तीखी और भावुक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “यह इस बात का संकेत है कि हम अल्लाह से दूर होते जा रहे हैं और दोज़ख की आग की ओर बढ़ रहे हैं।”
श्रीनगर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि मस्जिदों और इमामबाड़ों जैसे इबादतगाहों के भीतर विस्फोट होना पूरी मानवता के लिए शर्मनाक है। “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब नमाज़ पढ़ते लोगों को भी नहीं बख़्शा जा रहा। इससे बड़ा पतन और क्या हो सकता है?” उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा असल में धर्म के मूल संदेश—अमन, रहमत और इंसाफ़—की खुली अवहेलना है।
नमाज़ के दौरान मौत का मंजर
यह भयावह हमला शुक्रवार को उस वक्त हुआ, जब शिया समुदाय के लोग नमाज़ अदा कर रहे थे। आत्मघाती हमलावर ने इमामबाड़ा के भीतर खुद को विस्फोट से उड़ा लिया। शुरुआती आंकड़ों में 31 मौतों की पुष्टि हुई थी, लेकिन बाद में इलाज के दौरान एक 21 वर्षीय युवक की मौत के बाद यह संख्या बढ़कर 33 हो गई। इस्लामाबाद के प्रतिष्ठित PIMS अस्पताल में 29 शव लाए गए, जबकि चार मृतकों को पॉलीक्लिनिक में शिफ्ट किया गया था।
अस्पताल प्रशासन के मुताबिक अब भी 65 घायल इलाजरत हैं, जिनमें से नौ की हालत गंभीर बनी हुई है। कई घायलों को सिर, छाती और पेट में गंभीर चोटें आई हैं, जिससे मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा।
‘रुकू में झुके ही थे कि…’—आंखों देखी गवाही
हमले के वक्त इमामबाड़ा में मौजूद 52 वर्षीय मोहम्मद काज़िम ने अस्पताल में फ्रांसीसी समाचार एजेंसी AFP को बताया, “जैसे ही हम रुकू में झुके, पहले फायरिंग की आवाज़ आई और फिर ज़ोरदार धमाका हुआ। दीवारें कांप उठीं, छत से मलबा गिरने लगा।” बाहर का मंजर और भी भयावह था—आंगन में लाशें बिखरी पड़ी थीं, लोग मदद के लिए चीख रहे थे।
एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी इमरान महमूद ने बताया कि आत्मघाती हमलावर को रोकने की कोशिश भी की गई। स्वयंसेवी सुरक्षा कर्मियों और हमलावर के बीच फायरिंग हुई, लेकिन घायल होने के बावजूद वह इमामबाड़ा के भीतर घुस गया और विस्फोट कर दिया।
हमलावर की पहचान और जांच
जांच एजेंसियों ने हमलावर की पहचान यासर नामक 26 वर्षीय युवक के रूप में की है, जो डेढ़ साल पहले अपने घर से लापता हो गया था। परिजनों के अनुसार, वह कभी-कभार फोन पर संपर्क करता था। जांच में सामने आया है कि यासर ने हमले से पहले इमामबाड़ा की रेकी की थी और वह सार्वजनिक परिवहन के ज़रिये इस्लामाबाद पहुंचा। यह भी जानकारी सामने आई है कि उसका आना-जाना अफ़ग़ानिस्तान तक रहा था।
कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हमलावर के करीबी चार लोगों को हिरासत में लिया है, जिन पर सहायता और साज़िश में शामिल होने का शक है। कुछ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने दावा किया है कि हमलावर का संबंध आतंकी संगठन आईएसआईएस (दाएश) से हो सकता है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
फारूक अब्दुल्ला का तीखा संदेश
इस हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि “जो लोग मज़हब के नाम पर खून बहा रहे हैं, वे इंसानियत के दुश्मन हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम इस रास्ते पर चलते रहे, तो समाज को केवल तबाही ही मिलेगी। पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित किए जाने के सवाल पर उन्होंने टिप्पणी से इनकार किया, लेकिन यह ज़रूर कहा कि आतंकवाद को किसी भी धर्म या देश से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए—यह एक वैश्विक बुराई है।
शिया समुदाय पर बढ़ते हमले
विशेषज्ञों का कहना है कि यह हमला हाल के वर्षों में पाकिस्तान में शिया समुदाय को निशाना बनाकर किए गए सबसे भीषण आतंकी हमलों में से एक है। इससे पहले सितंबर 2008 में इस्लामाबाद के एक फाइव स्टार होटल पर हुए आत्मघाती ट्रक बम हमले में 60 लोगों की जान गई थी। मौजूदा हमला न सिर्फ़ सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता भी पैदा करता है।
दफन में बदला मातम
तरलाई क्षेत्र में 13 मृतकों की नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की गई, जिनमें एक छह साल का बच्चा और डेरा इस्माइल खान से ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर सैयद अब्बास मेहदी भी शामिल थे। हर जनाज़े के साथ सवाल और ग़ुस्सा भी दफन होता गया—आख़िर कब तक इबादतगाहें भी सुरक्षित नहीं रहेंगी?
एक बड़ा सवाल
पाकिस्तान की इस त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दक्षिण एशिया धार्मिक कट्टरता और हिंसा के ऐसे दौर में फंसता जा रहा है, जहां इंसानी जान की कोई क़ीमत नहीं बची? फारूक अब्दुल्ला के शब्दों में, “जब मस्जिदें भी महफूज़ नहीं रहीं, तो हमें रुककर सोचना होगा कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।”
यह हमला केवल पाकिस्तान की समस्या नहीं है, बल्कि पूरी मानवता के लिए चेतावनी है—कि अगर नफ़रत, कट्टरता और हिंसा को नहीं रोका गया, तो दोज़ख की आग सिर्फ़ एक मज़हबी मुहावरा नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त बन सकती है।

