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देहरादून जमीन विवाद: IMA के पास 15.19 एकड़ भूमि पर ‘डेमोग्राफिक चेंज’ आरोपों की सच्चाई क्या है?

उत्तराखंड में 15.19 एकड़ जमीन को लेकर छिड़ा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। जिस जमीन को लेकर कुछ संगठनों और एक पत्रिका की रिपोर्ट में मुसलमानों पर “डेमोग्राफिक चेंज” की साजिश रचने और Indian Military Academy के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाया गया था, उसे लेकर स्थानीय पत्रकारों और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटरों की जांच में कई अहम तथ्य सामने आए हैं। इन तथ्यों से संकेत मिलता है कि आरोपों में तथ्यात्मक कमियां हैं और जमीन की वास्तविक स्थिति भिन्न है।

जमीन कहां और कितनी दूर?

वरिष्ठ पत्रकार अजित राठी और कंटेंट क्रिएटर सुजाता पाल द्वारा साझा की गई रिपोर्ट के अनुसार, विवादित 15.19 एकड़ भूमि देहरादून के धौलास गांव में स्थित है, जो इंडियन मिलिट्री एकेडमी से लगभग 12 से 15 किलोमीटर दूर है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि धौलास गांव में वर्षों से मस्जिद और मदरसा मौजूद हैं, लेकिन इससे कभी भी एकेडमी की सुरक्षा को लेकर कोई आपत्ति या आधिकारिक चिंता सामने नहीं आई।

अजित राठी व्यंग्यात्मक लहजे में कहते हैं कि स्वयं एकेडमी के आसपास सैकड़ों रिहायशी मकान और अन्य ढांचे मौजूद हैं, फिर भी उन्हें लेकर कभी सुरक्षा संकट का मुद्दा नहीं उठाया गया। ऐसे में 15 किलोमीटर दूर स्थित कृषि भूमि को अचानक राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ना कई सवाल खड़े करता है।

जमीन का स्वामित्व और वास्तविक स्थिति

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, 15.19 एकड़ भूमि का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा हिंदू समुदाय के लोगों के पास है, जबकि लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम स्वामित्व में है। यह जमीन कृषि श्रेणी की है और फिलहाल वहां कोई आवासीय कॉलोनी या निर्माण नहीं है।

इन तथ्यों के आधार पर स्थानीय पत्रकारों का दावा है कि “डेमोग्राफिक चेंज” का आरोप जमीन की वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता। उनका कहना है कि जमीन पर आबादी बसाने या किसी विशेष समुदाय को संगठित तरीके से बसाने की कोई आधिकारिक योजना सामने नहीं आई है।

ट्रस्ट और कानूनी पृष्ठभूमि

रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड बनने के बाद Sheikhul Hind Charitable Trust ने तत्कालीन मुख्यमंत्री N. D. Tiwari से एक शिक्षण संस्थान की स्थापना के लिए 20 एकड़ भूमि की मांग की थी। 15 मार्च 2004 को ट्रस्ट को 180 दिनों के भीतर किसानों से भूमि खरीदने की अनुमति दी गई।

हालांकि ट्रस्ट 20 एकड़ की बजाय केवल 15.19 एकड़ जमीन ही खरीद पाया। बाद में सरकार ने भूमि को अपने अधीन कर लिया, जिसके खिलाफ ट्रस्ट ने Uttarakhand High Court का दरवाजा खटखटाया। 8 जून 2010 को उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि भूमि कृषि श्रेणी में ही ट्रस्ट को वापस की जाए और नियमों के अनुरूप उसका हस्तांतरण किया जा सकता है।

बताया जाता है कि 2016 में ट्रस्ट ने एक व्यक्ति को पावर ऑफ अटॉर्नी देकर जमीन के लेन-देन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। समय के साथ जमीन के हिस्से अलग-अलग लोगों के पास चले गए।

राजनीतिक विमर्श और आरोप-प्रत्यारोप

विवाद तब तेज हुआ जब एक हिंदूवादी संगठन की पत्रिका में रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें इस जमीन को “मुस्लिम यूनिवर्सिटी” और “डेमोग्राफिक बदलाव” से जोड़कर पेश किया गया। रिपोर्ट के बाद मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने मामले की जांच के संकेत दिए और प्रशासन से रिपोर्ट तलब की गई।

अजित राठी का आरोप है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था और अन्य मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए इस जमीन विवाद को उछाला जा रहा है। उनका कहना है कि अतीत में भी “मुस्लिम यूनिवर्सिटी” का मुद्दा चुनावी विमर्श का हिस्सा रहा है, खासकर जब Harish Rawat ने एक चुनावी सभा में ऐसे संस्थान की संभावना का जिक्र किया था।

दूसरी ओर, सुजाता पाल का कहना है कि भूमि से जुड़े कानूनी निर्णय उस समय हुए जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था, और बाद की सरकारों ने उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। उनके अनुसार, पूरे मामले को एकतरफा नजरिए से देखने के बजाय दस्तावेजी तथ्यों को समझना जरूरी है।

सामाजिक माहौल और चिंताएं

उत्तराखंड में हाल के वर्षों में “लव जिहाद” और “धर्मांतरण” जैसे मुद्दों को लेकर कई कानून और बहसें सामने आई हैं। कुछ सामाजिक संगठनों का दावा है कि इन कदमों से एक विशेष समुदाय पर दबाव की स्थिति बनी है। हालांकि सरकार का कहना है कि कानून व्यवस्था और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए ये कदम उठाए गए हैं।

जमीन विवाद के संदर्भ में भी यही सवाल उठ रहा है कि क्या इसे वास्तविक सुरक्षा चिंता के आधार पर देखा जाए या राजनीतिक विमर्श के हिस्से के रूप में। स्थानीय पत्रकारों का मत है कि जमीन कृषि श्रेणी की है और फिलहाल वहां किसी बड़े निर्माण या संस्थान की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है, इसलिए इसे तत्काल सुरक्षा खतरे से जोड़ना जल्दबाजी हो सकती है।

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निष्कर्ष: तथ्यों की जांच जरूरी

15.19 एकड़ भूमि का यह विवाद उत्तराखंड में राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया विमर्श का केंद्र बन चुका है। एक ओर आरोप हैं कि इसके जरिए “डेमोग्राफिक बदलाव” की कोशिश हो रही है, तो दूसरी ओर स्थानीय जांच और दस्तावेज बताते हैं कि भूमि का अधिकांश हिस्सा हिंदू स्वामित्व में है और उसका स्वरूप कृषि भूमि का है।

ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले प्रशासनिक जांच और पारदर्शी तथ्यों का इंतजार किया जाना चाहिए। संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित रिपोर्टिंग और जिम्मेदार संवाद ही सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का रास्ता हो सकता है।

उत्तराखंड की यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि जमीन और जनसंख्या जैसे विषय बेहद संवेदनशील होते हैं, और इन्हें तथ्यों, कानून और पारदर्शिता के आधार पर ही समझा जाना चाहिए—ताकि समाज में अनावश्यक तनाव न पनपे और लोकतांत्रिक विमर्श स्वस्थ दिशा में आगे बढ़े।