इस्लामाबाद वार्ता से पहले ट्रंप की चेतावनी, ईरान-यूएस तनाव चरम पर
वॉशिंगटन/इस्लामाबाद।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद इस समय वैश्विक राजनीति का केंद्र बनी हुई है, जहां इस सप्ताहांत अमेरिका और ईरान के बीच महत्वपूर्ण बातचीत प्रस्तावित है। इसी बीच दोनों पक्षों के कड़े बयानों ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, ईरान का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार देर रात इस्लामाबाद पहुंचा। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर क़ालिबाफ कर रहे हैं, जबकि उनके साथ ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी मौजूद हैं। एयरपोर्ट पर इस प्रतिनिधिमंडल का स्वागत पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार, नेशनल असेंबली स्पीकर सरदार अयाज सादिक, सेना प्रमुख असीम मुनीर और गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने किया।
पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने उम्मीद जताई कि यह वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगी और क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने में मदद करेगी। उन्होंने यह भी दोहराया कि पाकिस्तान इस पूरे संवाद में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।

दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि बातचीत विफल होती है तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ सोशल” पर कहा कि ईरान की स्थिति कमजोर है और उसके नेता केवल बातचीत के लिए ही बचे हुए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईरान दुनिया को होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए बंधक बनाने की कोशिश कर रहा है।
ट्रंप ने एक अन्य बयान में ईरान की मीडिया रणनीति पर भी सवाल उठाए और कहा कि ईरान “लड़ाई से ज्यादा प्रोपेगेंडा में माहिर है।” उनके इन बयानों ने पहले से ही तनावपूर्ण माहौल को और अधिक भड़का दिया है।
इसी बीच, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस्लामाबाद पहुंचकर वार्ता का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके साथ ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और दामाद जारेड कुशनर भी मौजूद हैं। वेंस ने रवाना होने से पहले कहा कि अमेरिका सकारात्मक वार्ता की उम्मीद करता है, लेकिन यदि ईरान “खेल खेलने” की कोशिश करेगा, तो अमेरिकी पक्ष सख्ती से जवाब देगा।
वेंस ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन ने उन्हें वार्ता के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, हालांकि उन्होंने इन निर्देशों का विवरण साझा नहीं किया। यह पहली बार है जब किसी अमेरिकी उपराष्ट्रपति को सीधे तौर पर युद्ध से जुड़े शांति वार्ता का नेतृत्व करने के लिए भेजा गया है, जिससे इस बातचीत का महत्व और बढ़ जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, युद्धविराम की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है। हाल ही में घोषित अस्थायी संघर्षविराम के बावजूद, ईरान और अमेरिका के बीच कई मुद्दों पर गहरे मतभेद बने हुए हैं। ईरान ने लेबनान में इजरायली सैन्य कार्रवाई को रोकने को वार्ता की शर्त बताया है, जबकि बेंजामिन नेतन्याहू और ट्रंप ने इसे अस्वीकार कर दिया है।
इसके अलावा, अमेरिका ने ईरान से होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की मांग की है, जिसे ईरान ने इजरायल के हमलों के जवाब में बंद कर दिया था। इस जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ गई है।
ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिकी नौसेना को अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि समझौता नहीं हुआ तो इन हथियारों का “बेहद प्रभावी तरीके” से इस्तेमाल किया जाएगा। उनके इस बयान को एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह वार्ता न केवल क्षेत्रीय शांति बल्कि वैश्विक राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। जोनाथन शैंजर जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि जेडी वेंस के पास कूटनीतिक अनुभव सीमित है, जिससे यह वार्ता और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
#WATCH: #US @VP @JDVance says he hopes for a "positive" outcome as he departs Washington for #US–#Iran peace talks being held in #Pakistan #Islamabad #IranWar https://t.co/LANcGJHsLc pic.twitter.com/0Nv8eWJWdy
— Arab News (@arabnews) April 10, 2026
वेंस के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि अमेरिका के भीतर राजनीतिक और आर्थिक दबाव तेजी से बढ़ रहा है। आगामी चुनावों को देखते हुए ट्रंप प्रशासन इस संघर्ष का जल्द समाधान चाहता है। वहीं, ईरान भी अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है, जिससे समझौते की राह कठिन नजर आ रही है।
ईरानी संसद अध्यक्ष क़ालिबाफ ने स्पष्ट किया है कि वार्ता शुरू होने से पहले लेबनान में संघर्षविराम और ईरान की जब्त संपत्तियों की रिहाई जरूरी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि इन शर्तों के बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ सकती।
इस बीच, व्हाइट हाउस ने वार्ता के प्रारूप को लेकर ज्यादा जानकारी साझा नहीं की है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि बातचीत सीधे होगी या किसी मध्यस्थ के जरिए। हालांकि, यह तय है कि यह वार्ता दोनों देशों के बीच लंबे समय बाद उच्चस्तरीय संपर्क का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
कुल मिलाकर, इस्लामाबाद में होने वाली यह वार्ता कई मायनों में निर्णायक साबित हो सकती है। यदि यह सफल होती है, तो न केवल एक बड़े युद्ध को टाला जा सकता है, बल्कि क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में भी कदम बढ़ सकता है। लेकिन यदि बातचीत विफल रहती है, तो ट्रंप के संकेतों के अनुसार हालात और अधिक गंभीर हो सकते हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बढ़ने का खतरा है।

