Culture

कश्मीर में सैकड़ों साल पुराना मछली उत्सव फिर जीवंत

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के काजीगुंड इलाके में स्थित पनजथ गांव एक बार फिर अपनी सदियों पुरानी परंपरा को लेकर चर्चा में है। यहां रविवार को वार्षिक सफाई और मछली उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। इस आयोजन में केवल गांव के लोग ही नहीं बल्कि आसपास के इलाकों से भी सैकड़ों लोग पहुंचे। पनजथ नाग के साफ पानी में उतरकर लोगों ने जलधाराओं की सफाई की और पारंपरिक तरीके से मछली पकड़ने की रस्म निभाई।

यह उत्सव सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है। इसके पीछे पर्यावरण संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय संस्कृति को जीवित रखने की एक लंबी परंपरा जुड़ी है। पनजथ गांव के लोग इसे अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं।

दक्षिण कश्मीर का पनजथ गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यहां स्थित पनजथ नाग एक प्रसिद्ध मीठे पानी का स्रोत है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह जलधारा 500 पौराणिक झरनों से निकलती है। इसी वजह से गांव का नाम भी “पनजथ” पड़ा। कश्मीरी भाषा में “पंज” का मतलब पांच सौ माना जाता है। लोगों का विश्वास है कि यह जलस्रोत सदियों से इलाके की खेती, पेयजल और प्राकृतिक संतुलन का आधार रहा है।

हर साल एक तय दिन गांव के लोग इस जलधारा की सफाई के लिए एकजुट होते हैं। सुबह होते ही लोग पनजथ नाग के आसपास जमा होने लगते हैं। कोई हाथ में जाल लेकर आता है तो कोई सफाई के उपकरण। बुजुर्ग युवाओं को इस परंपरा का महत्व बताते हैं। बच्चे भी इस आयोजन का हिस्सा बनते हैं। पूरे इलाके में त्योहार जैसा माहौल दिखाई देता है।

इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि लोग पानी में उतरकर जलधाराओं की सफाई करते हैं। पानी के बहाव में जमा घास, काई और दूसरी रुकावटों को हटाया जाता है। इससे पूरे साल पानी का प्रवाह साफ और सुचारू बना रहता है। सफाई के बाद सामूहिक रूप से मछली पकड़ने का कार्यक्रम शुरू होता है। गांव वाले इसे एक सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधि मानते हैं।

पनजथ नाग के स्थानीय निवासी बशीर अहमद कहते हैं कि इस परंपरा का मकसद सिर्फ मछली पकड़ना नहीं है। इसका असली उद्देश्य जलधारा को साफ रखना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि गांव के लोग साल में एक बार इस मौके पर एक साथ मिलते हैं और पूरे समर्पण के साथ जलमार्गों की सफाई करते हैं। इससे पानी का बहाव बेहतर बना रहता है और प्राकृतिक स्रोत सुरक्षित रहते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बदलते समय में जहां कई परंपराएं खत्म होती जा रही हैं, वहीं पनजथ का यह उत्सव आज भी लोगों को जोड़ने का काम कर रहा है। गांव के बुजुर्ग नई पीढ़ी को बताते हैं कि अगर जलस्रोत सुरक्षित रहेंगे तो गांव का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। यही वजह है कि इस आयोजन में हर उम्र के लोग शामिल होते हैं।

इस बार के आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी देखने को मिली। सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों और वीडियो में लोग पानी के बीच उतरकर मछलियां पकड़ते और जलधाराओं की सफाई करते नजर आए। कई लोगों ने इस आयोजन को कश्मीर की जीवित सांस्कृतिक विरासत बताया।

पर्यावरण विशेषज्ञ भी इस परंपरा को खास मानते हैं। उनका कहना है कि आधुनिक समय में जब नदियां और जलस्रोत प्रदूषण का सामना कर रहे हैं, ऐसे आयोजन समाज को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देते हैं। बिना सरकारी अभियान के लोग खुद जलधाराओं की देखभाल करें, यह एक सकारात्मक उदाहरण माना जा सकता है।

पनजथ का यह आयोजन केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। देश के दूसरे हिस्सों में भी मछली पकड़ने से जुड़े पारंपरिक उत्सव मनाए जाते हैं। तमिलनाडु के मदुरै जिले के कल्लंधिरी गांव में भी हाल ही में सदियों पुराना मछली उत्सव मनाया गया। वहां पांच गांवों के हजारों लोग एक बड़े जलाशय के किनारे जमा हुए। इस आयोजन को गर्मियों की शुरुआत और अच्छी फसल की कामना से जोड़ा जाता है। लोग सामूहिक पूजा करते हैं और फिर मछली पकड़ने की परंपरा निभाते हैं।

हालांकि पनजथ का उत्सव अपनी प्रकृति के कारण अलग पहचान रखता है। यहां मछली पकड़ने से पहले जलधाराओं की सफाई की जाती है। स्थानीय लोग इसे प्रकृति के साथ रिश्ता मजबूत करने का तरीका मानते हैं। उनका कहना है कि पानी जीवन का आधार है और उसकी देखभाल हर इंसान की जिम्मेदारी है।

कश्मीर लंबे समय से अपनी झीलों, झरनों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। लेकिन बदलते मौसम और बढ़ते प्रदूषण के बीच इन जलस्रोतों को बचाए रखना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में पनजथ जैसे गांवों की पहल उम्मीद जगाती है। यहां लोग किसी सरकारी आदेश का इंतजार नहीं करते। वे अपनी परंपरा को निभाते हुए पर्यावरण की रक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी समझते हैं।

गांव के कई बुजुर्गों का कहना है कि यह उत्सव उन्हें अपने बचपन की याद दिलाता है। पहले लोग बड़ी संख्या में शामिल होते थे और पूरे दिन उत्सव चलता था। अब भी लोग कोशिश करते हैं कि यह परंपरा कमजोर न पड़े। उनका मानना है कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ना जरूरी है।

पनजथ का वार्षिक मछली और सफाई उत्सव एक साधारण आयोजन नहीं है। यह प्रकृति, परंपरा और समाज के रिश्ते की एक जीवंत मिसाल है। यहां लोग केवल मछलियां पकड़ने नहीं आते। वे अपने जलस्रोत को बचाने, समुदाय को जोड़ने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ खड़े होते हैं। यही इस उत्सव की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

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