Assam Muslims Success Story : आबिद आज़ाद बने भूखों के लिए बना उम्मीद
मुस्लिम नाउ विशेष
असम मुस्लिम्स सक्सेस स्टोरी
जब दुनिया कोरोना महामारी के डर से घरों में बंद थी, तब असम के गुवाहाटी में एक युवा हर दिन भूख से लड़ रहे लोगों तक खाना पहुंचाने में जुटा था। नाम है आबिद आज़ाद। पेशे से बैंकर। दिल से समाजसेवी। आज असम में हजारों लोग उन्हें बैंक अधिकारी के रूप में कम, इंसानियत की मिसाल के रूप में ज्यादा जानते हैं।
मुस्लिम नाउ की खास श्रृंखला ‘Assam Muslims Success Story’ की पहली कड़ी में हम आपको ऐसे ही युवा से मिलवा रहे हैं, जिसने भूख को सबसे बड़ा दर्द माना और उसे मिटाने को अपनी जिम्मेदारी बना लिया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, “भूखे के लिए भोजन ही ईश्वर है।” यह बात आबिद आज़ाद के जीवन में जैसे उतर गई। साल 2020 में जब कोविड महामारी ने सबकुछ थाम दिया, तब गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल यानी जीएमसीएच के बाहर एक अलग ही त्रासदी दिख रही थी। दूरदराज़ इलाकों से आए मरीजों के परिजन इलाज की चिंता के साथ भोजन के लिए भी जूझ रहे थे।
होटल बंद थे। दुकानें बंद थीं। जेबें खाली थीं।
ऐसे समय में आबिद आज़ाद ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर जरूरतमंदों तक खाना पहुंचाने की शुरुआत की। पहले कोविड प्रभावित परिवारों के घरों तक भोजन पहुंचाया गया। फिर जरूरत बढ़ी तो टीम ने जीएमसीएच परिसर में मरीजों के परिजनों को खाना बांटना शुरू कर दिया।
यहीं से जन्म हुआ रेनड्रॉप्स इनिशिएटिव असम का।
महामारी खत्म हुई। लॉकडाउन हटा। जिंदगी पटरी पर लौटी। लेकिन आबिद और उनकी टीम ने महसूस किया कि अस्पतालों में आर्थिक संघर्ष खत्म नहीं हुआ। आज भी कई परिवार इलाज के खर्च के बीच दो वक्त की रोटी के लिए परेशान हैं। यही वजह रही कि उन्होंने शाम का मुफ्त भोजन कार्यक्रम जारी रखा।
आबिद आज़ाद कहते हैं, “हमने देखा कि लोग इलाज के लिए तो अस्पताल आ जाते हैं, लेकिन कई बार खाने के पैसे नहीं बचते। ऐसे में हमने तय किया कि सेवा रुकनी नहीं चाहिए।”
रमज़ान के दौरान उनकी टीम का काम और बढ़ जाता है। जीएमसीएच में रोज़ा रखने वाले मरीजों और तीमारदारों के लिए सेहरी और इफ्तार की व्यवस्था की जाती है। खास बात यह है कि यह सेवा किसी धर्म या पहचान से बंधी नहीं है।
हिंदू, मुस्लिम, ईसाई। जो भी भूखा है, उसके लिए खाना मौजूद है।

आबिद बताते हैं, “हम सार्वजनिक जगह पर सेवा करते हैं। यहां किसी से धर्म नहीं पूछा जाता। भूख सबसे बड़ी सच्चाई है।”
इस साल रमज़ान 2025 के दौरान शायद ही कोई दिन रहा हो जब उनकी टीम ने सेहरी और इफ्तार का इंतजाम न किया हो। मगर यह सफर आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती फंड जुटाने की रहती है।
रेनड्रॉप्स इनिशिएटिव असम क्राउड फंडिंग से चलता है। कई लोग अपने जन्मदिन, सालगिरह या अपनों की याद में भोजन प्रायोजित करते हैं। कभी पैसे कम पड़ जाएं तो टीम अपने खर्च से इंतजाम करती है। मुश्किल समय में शादी समारोहों से बचा अच्छा भोजन इकट्ठा कर अगले दिन जरूरतमंदों तक पहुंचाया गया।
मोरीगांव से आए मतिउर रहमान कहते हैं, “मैं मरीज लेकर अस्पताल आया था। रात में खाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। तभी आबिद आज़ाद और उनकी टीम सेहरी बांटती मिली। उसके बाद कई दिनों तक यहीं इफ्तार और सेहरी की।”
मूनू गोगोई, जो जीएमसीएच में एक मरीज के साथ आए थे, बताते हैं, “रात के एक बजे बहुत भूख लगी थी। आसपास कुछ खुला नहीं था। आखिर में रेनड्रॉप्स टीम ने खाना दिया।”
मुफ्त भोजन तक यह कहानी सीमित नहीं है। आबिद की टीम गरीब मरीजों तक बची हुई महंगी दवाइयां भी पहुंचाती है। जिन मरीजों की मौत हो जाती है, उनके परिवार से संपर्क कर दवाएं इकट्ठा की जाती हैं और डॉक्टरों की सलाह से दूसरे जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त दी जाती हैं।
इतना ही नहीं। टीम पूरे असम में पेड़ लगाने का अभियान भी चला रही है।
आबिद आज़ाद की कहानी सिर्फ सेवा की नहीं है। यह भरोसे की कहानी है। ऐसे दौर में जब लोग अपने लिए समय नहीं निकाल पाते, एक युवा रोज दूसरों की भूख मिटाने में अपनी खुशी तलाश रहा है। यही उसे असम की नई उम्मीद बनाता है।

