Assam Muslims Success Story : रिक्शा चालक अहमद अली जिसने बदल दी 9 स्कूलों की तकदीर
Table of Contents
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- नाम: अहमद अली (उम्र लगभग 90 वर्ष)
- स्थान: खिलोरबोंड-मधुरबोंड, श्रीभूमि जिला (पूर्व में करीमगंज), दक्षिणी असम।
- अनोखा योगदान: अपनी जमीन बेचकर और रिक्शा चलाकर इलाके में 9 स्कूल स्थापित किए।
- विशेष सम्मान: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में तारीफ की; गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में विशेष अतिथि बने।
मुस्लिम नाउ विशेष: मुस्लिम सक्सेज स्टोरी
कहते हैं कि अगर हौसला बुलंद हो और इरादे नेक, तो एक अदना सा इंसान भी समाज में वो बदलाव ला सकता है जिसकी कल्पना बड़े-बड़े रईस नहीं कर पाते। ‘मुस्लिम नाउ’ के विशेष सीरियल ‘मुस्लिम सक्सेज स्टोरी’ के तहत आज हम आपको रूबरू करा रहे हैं असम के एक ऐसे ही रियल हीरो से, जिन्होंने गरीबी की बेड़ियों को तोड़कर तालीम की वो अलख जगाई है, जिसकी गूंज आज पूरे देश में सुनाई दे रही है। यह कहानी है दक्षिणी असम के श्रीभूमि जिले के रहने वाले 90 वर्षीय अहमद अली की, जिन्होंने कभी हाथ रिक्शा चलाकर समाज को साक्षर बनाने का बीड़ा उठाया था।

एक डरावना सपना और बदल गई जिंदगी की राह
बात 1970 के दशक के आखिरी दिनों की है। अहमद अली उस वक्त असम की सड़कों पर साइकिल रिक्शा चलाकर अपनी गुजर-बसर करते थे। एक रात वो थक-हारकर सोए, तो उन्हें एक बेहद खौफनाक सपना आया। उन्होंने सपने में देखा कि उनकी आने वाली पीढ़ी भी अनपढ़ रह गई है और तंगहाली के कारण उनके बच्चों को भी जिंदगी भर रिक्शा ही चलाना पड़ रहा है। इस दुःस्वप्न ने अली को अंदर तक झकझोर दिया। वे पूरी रात सो नहीं पाए।
सुबह होते ही अहमद अली ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने कसम खाई कि वे अपने बच्चों और इलाके के गरीब नौनिहालों को ‘निरक्षरता के पाप’ से मुक्ति दिलाएंगे। इसके बाद, साल 1978 में उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति का एक हिस्सा (जमीन का प्लॉट) बेचकर पहले प्राथमिक स्कूल की नींव रखी।
तंगहाली के बीच खड़े कर दिए 9 शिक्षण संस्थान
अहमद अली के पास कुल 32 बीघा पैतृक जमीन थी। उन्होंने रिक्शा चलाने से होने वाली मामूली कमाई, जमीन को बेचकर मिले पैसों और ग्रामीणों से मिले छोटे-छोटे दानों की बदौलत एक-एक कर अपने इलाके में 9 स्कूल खड़े कर दिए। उनके द्वारा स्थापित इन शिक्षण संस्थानों में:
- 3 लोअर प्राइमरी स्कूल
- 5 मिडिल स्कूल (अंग्रेजी माध्यम)
- 1 हाई स्कूल शामिल हैं।
राहत की बात यह है कि इनमें से पांच स्कूलों का प्रांतीकरण (Provincialised) हो चुका है, यानी वहां के शिक्षकों और कर्मचारियों को अब असम सरकार से वेतन मिलता है, जबकि बाकी स्कूलों में शिक्षक आज भी स्वैच्छिक रूप से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मौजूदा समय में इन स्कूलों में करीब 500 लड़कियां और 100 लड़के तालीम हासिल कर रहे हैं।
कुरान का संदेश ‘इकरा’ बना प्रेरणा: अहमद अली कहते हैं, “इस्लाम में शिक्षा का बहुत महत्व है। पवित्र कुरान में नाजिल हुआ पहला शब्द ‘इकरा’ है, जिसका अर्थ है ‘पढ़ना’। जब अल्लाह का पहला हुक्म ही पढ़ने का है, तो अनपढ़ रहना एक गुनाह है। मैं अपनी आखिरी सांस तक बच्चों के लिए स्कूल बनाता रहूंगा।”

‘मन की बात’ से लेकर गणतंत्र दिवस के मंच तक
अहमद अली की इस निस्वार्थ समाज सेवा की गूंज देश की राजधानी तक पहुंची है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में अहमद अली के इस अनूठे संघर्ष और जज्बे की सराहना की थी। इतना ही नहीं, भारत सरकार ने नई दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में उन्हें ‘विशेष अतिथि’ के रूप में आमंत्रित कर सम्मानित भी किया, जो पूरे असम के लिए एक गर्व का क्षण था।
उम्र 90 साल, लेकिन सपने आज भी जवान
90 वर्ष की इस उम्र में भी अहमद अली थके नहीं हैं। अब उनका अगला मिशन अपने गांव के आसपास एक ‘जूनियर कॉलेज’ खोलने का है, ताकि उनके स्कूलों से 10वीं (मैट्रिकुलेशन) पास करने वाले गरीब बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए दूर न जाना पड़े। अली ने संपन्न और प्रभावशाली लोगों से अपील की है कि वे इस नेक काम में उनकी आर्थिक मदद करें ताकि असम का कोई भी बच्चा अनपढ़ न रहे।

