राजस्थान में अनोखी मिसाल, अनवर ने रास्ते के लिए जमीन छोड़ी
अशफाक कायमखानी/जयपुर

राजस्थान का शेखावाटी इलाका लंबे समय से दानवीरों, समाजसेवियों और जनहित के कार्यों के लिए जाना जाता रहा है। यहां के उद्योगपतियों और भामाशाहों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के लिए अनेक योगदान दिए हैं। लेकिन आज जब जमीन के छोटे से टुकड़े को लेकर रिश्तों में दरार पड़ रही है, तब सीकर जिले के एक ग्रामीण ने ऐसा काम किया है जो पूरे समाज को नई सीख देता है।
सीकर जिले के मंगलूणा गांव के रहने वाले अनवर कायमखानी ने जनहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखते हुए अपनी बेशकीमती जमीन का हिस्सा आम रास्ते के लिए छोड़ दिया। गांव से पुननी जाने वाले मार्ग को चौड़ा करने के लिए उन्होंने अपनी पक्की दीवार तुड़वाई और नई दीवार लगभग पांच फीट अंदर बनवाई। इस कदम से वर्षों से तंग रास्ते की समस्या काफी हद तक दूर हो गई।

गांव के लोगों का कहना है कि यह रास्ता लंबे समय से संकरा था। आने जाने वालों को दिक्कत होती थी। खासकर किसानों, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों को परेशानी झेलनी पड़ती थी। कई बार इस रास्ते को लेकर विवाद की स्थिति भी बनती थी। ऐसे में अनवर कायमखानी का यह फैसला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है।
आज के दौर में जमीन को लेकर सबसे ज्यादा विवाद देखने को मिलते हैं। देशभर की अदालतों में हजारों मामले रास्तों, सीमाओं और कृषि भूमि से जुड़े हुए लंबित हैं। कई बार एक इंच जमीन के लिए परिवारों के बीच वर्षों तक मुकदमे चलते रहते हैं। भाई भाई के खिलाफ खड़ा हो जाता है। रिश्ते टूट जाते हैं। ऐसे समय में किसी व्यक्ति का स्वेच्छा से अपनी जमीन जनहित के लिए छोड़ देना असाधारण माना जा रहा है।
शेखावाटी क्षेत्र में यह पहली घटना नहीं है। यहां पहले भी कई लोगों ने समाज और सार्वजनिक हित के लिए अपनी संपत्ति दान की है। सीकर जिले के बेसवा गांव में दो मुस्लिम भाइयों ने सरकारी अस्पताल के निर्माण के लिए मूल्यवान जमीन दान की थी। बाद में उसी जमीन पर अस्पताल भवन का निर्माण हुआ और आज वहां आसपास के लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं।
इसी तरह फतेहपुर कस्बे में हाजी दाऊद पीनारा ने सरकारी महिला कॉलेज के लिए महत्वपूर्ण जमीन दान की थी। उस जमीन पर आज सरकारी महिला कॉलेज संचालित हो रहा है, जहां सैकड़ों छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। इस योगदान ने क्षेत्र में महिला शिक्षा को नई दिशा दी।

कुछ समय पहले सीकर जिले के गुवाला गांव में भी एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया था। गांव के चार माली भाइयों ने ईदगाह मस्जिद के लिए जमीन दान की थी। इस पहल को सामाजिक सद्भाव और भाईचारे की मिसाल माना गया। उस समय भी लोगों ने इसे सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता का संदेश बताया था।
अनवर कायमखानी का कहना है कि इंसान अपने साथ कुछ लेकर नहीं जाता। समाज के लिए किया गया काम ही उसकी असली पहचान बनता है। उन्होंने अपनी जमीन छोड़ने को सबसे बड़ा सदका बताया। उनका मानना है कि यदि किसी के छोटे से त्याग से सैकड़ों लोगों को सुविधा मिलती है तो उससे बड़ा पुण्य कोई नहीं हो सकता।

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले के समय में लोग सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देते थे। कुएं, तालाब, स्कूल और धर्मशालाओं के लिए जमीन दान करना सामान्य बात मानी जाती थी। लेकिन बदलते समय के साथ ऐसी सोच कम होती गई। अब जब कोई व्यक्ति समाज के लिए अपनी निजी संपत्ति छोड़ता है तो वह पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन जाता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि अनवर कायमखानी का यह कदम नई पीढ़ी को भी सकारात्मक संदेश देगा। यह केवल रास्ता चौड़ा करने का मामला नहीं है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी, जनसेवा और सामुदायिक सहयोग की भावना का उदाहरण है। इससे यह संदेश जाता है कि विकास केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज के लोग भी अपनी भूमिका निभाकर बदलाव ला सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक भूमि उपलब्धता होती है। कई परियोजनाएं केवल इसलिए अटक जाती हैं क्योंकि लोग अपनी जमीन का छोटा हिस्सा भी देने को तैयार नहीं होते। ऐसे में यदि लोग स्वेच्छा से सहयोग करें तो सड़क, स्कूल, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का विस्तार अधिक तेजी से हो सकता है।
मंगलूणा गांव की यह घटना अब आसपास के इलाकों में चर्चा का विषय बन गई है। लोग इसे सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की मिसाल बता रहे हैं। ऐसे समय में जब समाज अक्सर विवादों और मतभेदों की खबरों से घिरा रहता है, तब यह कहानी उम्मीद और प्रेरणा का संदेश देती है।
अनवर कायमखानी का यह कदम बताता है कि समाज में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक हित के बारे में सोचते हैं। यही लोग किसी भी समाज की असली ताकत होते हैं। उनकी पहल आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती है कि जमीन, संपत्ति और धन से बड़ी चीज इंसानियत और जनसेवा है।

