जर्मनी की मस्जिदों से जुड़े 6 रोचक और अनजाने तथ्य
Table of Contents
नई दिल्ली।
जर्मनी में इस्लाम देश का दूसरा सबसे बड़ा धर्म माना जाता है और यहां लाखों मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं। अनुमान के अनुसार, जर्मनी में करीब 2,350 से 2,750 मस्जिदें हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश मस्जिदें आम लोगों की नजरों से दूर रिहायशी इलाकों या औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित हैं। जर्मन इस्लाम सम्मेलन के एक सर्वेक्षण के अनुसार, देश में रहने वाले लगभग 55 लाख मुसलमानों में से करीब 24 प्रतिशत लोग सप्ताह में कम से कम एक बार मस्जिद जाते हैं। आइए जानते हैं जर्मनी की मस्जिदों से जुड़े छह रोचक और कम चर्चित तथ्य।

1. जर्मनी की पहली मस्जिद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बनी
जर्मनी और मध्य यूरोप की पहली मस्जिद वर्ष 1915 में ब्रैंडेनबर्ग के वुन्सडॉर्फ में बनाई गई थी। इसे उस समय मुस्लिम युद्धबंदियों के शिविर के बीच स्थापित किया गया था और इसे “क्रिसेंट कैंप” के नाम से जाना जाता था। यह केवल इबादत का स्थान नहीं था, बल्कि ऐतिहासिक रूप से इसका उपयोग उस दौर में सैन्य और राजनीतिक उद्देश्यों से भी जुड़ा रहा। बाद में 1930 में इस मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।
2. ताजमहल जैसी दिखती है जर्मनी की सबसे पुरानी जीवित मस्जिद
बर्लिन के विल्मर्सडॉर्फ क्षेत्र में स्थित मस्जिद को जर्मनी की सबसे पुरानी संरक्षित मस्जिद माना जाता है। इसकी वास्तुकला काफी हद तक भारत के विश्व प्रसिद्ध ताजमहल से प्रेरित दिखाई देती है। लगभग 30 मीटर ऊंची दो मीनारें इसकी खूबसूरती को बढ़ाती हैं। इसका डिजाइन जर्मन वास्तुकार कार्ल ऑगस्ट हरमन ने तैयार किया था और यह लंबे समय तक जर्मनी में मुस्लिम समुदाय का प्रमुख धार्मिक केंद्र रही।

3. एक ऐसी मस्जिद जहां महिलाएं भी देती हैं प्रवचन
वर्ष 2017 में बर्लिन में इब्न रुश्द-गोएथे मस्जिद की स्थापना हुई, जिसने अपनी प्रगतिशील व्यवस्था के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। यहां पुरुष और महिलाएं एक साथ नमाज अदा करते हैं, महिलाओं को धार्मिक प्रवचन देने की अनुमति है और समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर लोगों के लिए भी प्रवेश खुला है। मस्जिद खुद को लोकतंत्र, समानता और मानवाधिकारों के अनुरूप आधुनिक इस्लामी विचारधारा का प्रतिनिधि मानती है।
4. कई मस्जिदों का संचालन तुर्की से जुड़े संगठन करते हैं
जर्मनी की बड़ी संख्या में मस्जिदों का संचालन तुर्की-इस्लामिक यूनियन फॉर रिलिजियस अफेयर्स (DITIB) जैसे संगठनों द्वारा किया जाता है। इस संगठन का संबंध तुर्की के धार्मिक मामलों के निदेशालय से माना जाता है। कई इमाम तुर्की में प्रशिक्षित होते हैं और उनके खर्च का प्रबंधन भी वहीं से किया जाता है। इसी कारण समय-समय पर इस व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस भी होती रही है।

5. अधिकांश मस्जिदें आसानी से पहचान में नहीं आतीं
जर्मनी के शहरों में चर्चों की ऊंची इमारतें दूर से दिखाई देती हैं, लेकिन अधिकांश मस्जिदें साधारण भवनों या पिछवाड़े की इमारतों में स्थित होती हैं। कई बार बाहर से देखकर यह पहचानना मुश्किल होता है कि वह मस्जिद है। हालांकि, कोलोन सेंट्रल मस्जिद इसका प्रमुख अपवाद है, जिसकी आधुनिक वास्तुकला और ऊंची मीनारें इसे जर्मनी की सबसे प्रसिद्ध मस्जिदों में शामिल करती हैं।
6. लाउडस्पीकर से अजान की अनुमति सीमित
जर्मनी में अजान देना कानूनी रूप से संभव है, लेकिन बहुत कम मस्जिदों में लाउडस्पीकर के माध्यम से नियमित अजान दी जाती है। इसका एक कारण यह है कि अधिकांश मस्जिदों में पारंपरिक मीनारें नहीं हैं, जबकि दूसरा कारण स्थानीय नियम और सामाजिक स्वीकृति से जुड़ा है। वर्तमान में देश में केवल लगभग 30 मस्जिदें ही नियमित रूप से लाउडस्पीकर के जरिए अजान का प्रसारण करती हैं।

निष्कर्ष
जर्मनी की मस्जिदें केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विकास की कहानी भी बयान करती हैं। इनमें पारंपरिक वास्तुकला, आधुनिक विचारधाराओं, प्रवासी समुदायों के योगदान और स्थानीय समाज के साथ बदलते संबंधों की झलक देखने को मिलती है।

