केरल में इंसानियत की मिसाल, मुस्लिम महिला ने किया आरएसएस कार्यकर्ता का अंतिम संस्कार
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली,कासरगोड (केरल)
कई बार इंसान कूटनीति, विचारधारा और नफरत के बहकावे में आकर अपनी पूरी जिंदगी गुजार देता है। वह समाज में दूरियां पैदा करने वाले संगठनों के लिए दिन-रात काम करता है। मगर जब वही इंसान किसी बड़ी मुसीबत में घिरता है, तो वे तमाम संगठन और विचारधाराएं धरी की धरी रह जाती हैं। संकट के उस दौर में कोई काम नहीं आता। यहां तक कि जिसके बहकावे में आकर व्यक्ति अपनों से दूर होता है, वे लोग भी मुसीबत देखकर मुंह मोड़ लेते हैं। कुछ ऐसी ही एक भावुक और आंखें खोल देने वाली कहानी केरल के कासरगोड जिले से सामने आई है। यह कहानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता नारायणन और एक मुस्लिम महिला इरफाना इकबाल की है।
कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे आरएसएस कार्यकर्ता नारायणन की जब मौत हुई, तो उनका अंतिम संस्कार करने के लिए न तो उनका सगा परिवार आगे आया और न ही समाज सेवा का दम भरने वाला उनका संगठन। इस बेहद मुश्किल वक्त में मानवता का धर्म निभाते हुए एक मुस्लिम महिला इरफाना इकबाल ने आगे बढ़कर नारायणन का अंतिम संस्कार कराया। उन्होंने पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हुए नारायणन को अंतिम विदाई दी। यह घटना इस समय पूरे देश और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार वसीम अकरम त्यागी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी गहरी टिप्पणी साझा की है। उन्होंने लिखा कि इरफ़ाना ने जिस हिंदू व्यक्ति का अंतिम संस्कार किया है, वह कोई साधारण इंसान नहीं थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के एक सक्रिय स्वयंसेवक थे और उनका नाम नारायणन था। नारायणन को अंतिम स्टेज का कैंसर हो गया था। इस बेहद दर्दनाक और कठिन स्थिति में उनके सगे परिवार ने भी उनका साथ पूरी तरह छोड़ दिया था।
प्रिय @Live_Hindustan इरफ़ाना ने जिस हिंदू का अंतिम संस्कार किया है, वो कोई साधारण हिंदू नहीं बल्कि वो RSS के स्वंय सेवक थे। जिनका नाम नारायणन था। नारायणन को कैंसर हो गया था, और इस स्थिती में उनके परिवार ने भी उनका साथ छोड़ दिया। जिसके बाद इरफाना ने नारायणन को अस्पताल में भर्ती… pic.twitter.com/APVL4oUyIR
— Wasim Akram Tyagi (@WasimAkramTyagi) June 28, 2026
जब नारायणन लावारिस हालत में मिले, तो इरफाना ने उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया। उन्होंने नारायणन को बेहतरीन इलाज दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किया। डॉक्टरों की पूरी टीम ने उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन कैंसर आखिरी स्टेज में होने के कारण नारायणन बच नहीं सके। जब उन्होंने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया, तो उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार भी इरफाना ने ही किया।
इस घटना का एक बड़ा पहलू यह भी है कि आरएसएस एक ऐसा संगठन है, जिसके कई अनुषांगिक संगठनों पर अक्सर मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने और हिंसा करने के आरोप लगते रहते हैं। इसके बावजूद इरफाना इकबाल ने यह सब जानते हुए भी उसी संगठन से जुड़े एक शख्स को सबसे मुश्किल वक्त में संभाला। उन्होंने एक मां या बेटी की तरह उनकी सेवा की और पूरे सम्मान के साथ उन्हें उनके अंतिम सफर पर विदा किया। यह वाकई में एक इंसान की इंसान के प्रति सच्ची ड्यूटी है। यही इंसानियत का सबसे बड़ा तकाजा है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि नफरत को हमेशा सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत से ही हराया जा सकता है। मशहूर शायर राहत इंदौरी ने शायद ऐसे ही हालातों के लिए एक बेहद खूबसूरत शेर लिखा था:
तुमको तुम्हारा फ़र्ज़ मुबारक, हमको मुबारक अपना सुलूक हम फूलों की शाख़ तराशें, तुम चाक़ू पर धार करो।
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और जमीनी पहलू केरल के कासरगोड जिले से जुड़ा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिला पंचायत की विकास समिति की अध्यक्षा इरफाना इकबाल ने समाज के सामने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी हर तरफ सराहना हो रही है। इस मुस्लिम महिला पंचायत सदस्य ने एक हिंदू व्यक्ति का अंतिम संस्कार हिंदू धार्मिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न कराया।
मृतक की पहचान 64 वर्षीय नारायणन के रूप में हुई है। वे मंजेश्वरम के चिग्रुपडावु इलाके के रहने वाले थे। पिछले करीब एक महीने से वे कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनका इलाज कोझिकोड के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चल रहा था। पिछले गुरुवार को इलाज के दौरान अस्पताल में ही उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली।
इरफाना इकबाल ने इस घटना की पूरी जानकारी देते हुए बताया कि करीब एक महीने पहले नारायणन कासरगोड में एक दुकान के बरामदे में बेहद कमजोर और लाचार हालत में पड़े हुए मिले थे। वे भूख और बीमारी से तड़प रहे थे। उस क्षेत्र के वार्ड सदस्य से सूचना मिलने के बाद इरफाना ने तुरंत जिला कलेक्टर और जिला चिकित्सा अधिकारी को इस बात की जानकारी दी। इसके बाद उन्होंने एक स्थानीय चैरिटेबल फाउंडेशन के स्वयंसेवकों की मदद ली। नारायणन को प्राथमिक उपचार देने के बाद तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया।
शुरुआत में प्रशासन और समाजसेवियों की योजना नारायणन को एक निजी ट्रस्ट द्वारा संचालित वृद्धाश्रम भेजने की थी। मगर उनकी शारीरिक हालत इतनी ज्यादा गंभीर थी कि उन्हें तुरंत बड़े इलाज की जरूरत थी। डॉक्टरों ने जब उनकी विस्तृत जांच की, तो पता चला कि उन्हें फोर्थ स्टेज का कैंसर है। बीमारी उनके पूरे शरीर में फैल चुकी थी। इसी वजह से उन्हें तुरंत कोझिकोड मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रेफर कर दिया गया। वहां इरफाना की देखरेख में उनका इलाज चलता रहा।
जब अस्पताल में इलाज के दौरान नारायणन की मौत हो गई, तो स्थानीय पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया के तहत उनके परिजनों और रिश्तेदारों से संपर्क किया। पुलिस ने उन्हें नारायणन की मौत की सूचना दी और शव ले जाने को कहा। मगर परिजनों ने नारायणन के साथ किसी भी तरह के संबंध से इनकार करते हुए शव को लेने से साफ मना कर दिया। परिवार के इस रवैये के बाद पुलिस के सामने शव के अंतिम संस्कार की बड़ी समस्या खड़ी हो गई। ऐसी स्थिति में पुलिस ने कानूनी तौर पर इरफाना इकबाल को शव सौंपने और अंतिम संस्कार कराने की अनुमति दे दी।
इरफाना ने पूरी जिम्मेदारी उठाते हुए कासरगोड के उप्पला में स्थित हिंदू श्मशान घाट में नारायणन का पार्थिव शरीर पहुंचाया। वहां उन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनकी चिता को मुखाग्नि दिलवाई और अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कीं। पारंपरिक बुर्का पहने हुए एक मुस्लिम महिला द्वारा हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किए जाने की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए। इन्हें देखकर हर कोई भावुक हो उठा। लोग इस वीडियो को तेजी से शेयर कर रहे हैं और इरफाना की इस धर्मनिरपेक्ष सोच की तारीफ कर रहे हैं।
इस घटना के बाद इरफाना ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक बेहद भावुक पोस्ट भी लिखी। उन्होंने लिखा कि नारायणन की मौत के बाद उनका कोई भी करीबी रिश्तेदार या संगठन का साथी आगे नहीं आया। ऐसी स्थिति में उन्होंने नारायणन का अंतिम संस्कार एक बेटी की तरह किया है। इंसानियत का धर्म किसी भी राजनीति और मजहब की सीमाओं से बहुत ऊपर होता है। इरफाना ने दृढ़ता से कहा कि वे आगे भी समाज के ऐसे बेसहारा बुजुर्गों और अनाथ लोगों की मदद बिना किसी भेदभाव के करती रहेंगी।
इरफाना ने यह भी स्पष्ट किया कि इस नेक काम के लिए उनके अपने मुस्लिम समुदाय की ओर से किसी भी तरह की कोई आपत्ति या विरोध नहीं जताया गया। उनके परिवार और समाज के लोगों ने उनके इस कदम का पूरा समर्थन किया। दरअसल, उनकी संस्था पहले भी कई अनाथ और लावारिस लोगों का अंतिम संस्कार उनके अपने-अपने धर्म के अनुसार ही कराती रही है। इस घटना ने समाज में कूटनीति और नफरत की राजनीति करने वालों को एक बड़ा संदेश दिया है कि संकट के समय केवल इंसानियत ही काम आती है।

