मेस्सी युग की भावुक विदाई और यामल के नए दौर का आगाज
दुलाल महमूद

अमेरिका के मेटलाइफ स्टेडियम में लगभग 82 हजार दर्शकों की मौजूदगी के बीच फुटबॉल इतिहास का एक बेहद भावुक और यादगार मुकाबला खेला गया। लंबे समय के इंतजार के बाद आखिरकार स्पेन ने एक बार फिर विश्व फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर अपनी श्रेष्ठता साबित कर दी है। चार विश्व कप के कड़े संघर्ष और 16 सालों के लंबे इंतजार के बाद फुटबॉल की ट्रॉफी वापस यूरोप और स्पेन की धरती पर लौट आई है। इस मुकाबले में स्पेन ने अर्जेंटीना को 1-0 से हराकर खिताब अपने नाम किया। हालांकि स्कोरबोर्ड इस पूरे मैच की असली कहानी को बयां नहीं करता है।

मैदान पर स्पेन की पारंपरिक रणनीतिक शैली टिकी टाका का जलवा पूरी तरह देखने को मिला। जोहान क्रूइफ के इस फुटबॉल दर्शन को स्पेनिश खिलाड़ियों ने जिस सटीकता से लागू किया, उसके सामने अर्जेंटीना की टीम संघर्ष करती नजर आई। पूरे टूर्नामेंट में आक्रामक और संतुलित खेल दिखाने वाली ला अल्बिसेलेस्टे यानी अर्जेंटीना की टीम इस सबसे अहम मुकाबले में अपनी स्वाभाविक लय से भटक गई।
स्पेन का पासिंग गेम और आलोचनाओं का करारा जवाब
यह जीत स्पेनिश फुटबॉल टीम के लिए सिर्फ एक ट्रॉफी भर नहीं है। यह उन तमाम आलोचनाओं का एक ठोस जवाब है जो पिछले एक दशक से उन पर लगातार की जा रही थीं। साल 2014 के ब्राजील विश्व कप में ग्रुप दौर से बाहर होना, 2018 के रूस विश्व कप में मेजबान से हारना और फिर 2022 के कतर विश्व कप में मोरक्को के हाथों मिली शिकस्त के बाद हर तरफ टिकी टाका के खात्मे की बातें हो रही थीं। आलोचकों का मानना था कि सिर्फ छोटे-छोटे पास देने से मैच नहीं जीते जाते और आधुनिक फुटबॉल अब पूरी तरह शारीरिक ताकत और काउंटर अटैक पर निर्भर हो चुका है।
स्पेन ने अपनी पुरानी पहचान और कलात्मक पासिंग गेम के दम पर ही इन सभी दावों को खारिज कर दिया। पूरी दुनिया जब पावर गेम और लंबी गेंदों के सहारे खेलने की दिशा में बढ़ रही थी, तब स्पेन ने साबित किया कि अगर पासिंग में सटीकता और दिशा हो तो वही फुटबॉल दुनिया जीत सकता है।
हालाँकि यह 2010 वाला धीमा और सुस्त करने वाला स्पेन नहीं था। ज़ावी, इनिएस्टा, बुस्केट्स और ज़ाबी अलोंसो के जमाने में टीम गेंद पर नियंत्रण रखकर विरोधी को थकाती थी। इसके विपरीत मुख्य कोच लुइस डे ला फुएंते की यह नई टीम बेहद तेज और तीखी नजर आई। उन्होंने बिना किसी बड़े नाम या अहंकार के ला मासिया और बास्क कंट्री की अकादमियों से आए युवा खिलाड़ियों पर भरोसा जताया।
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लियोनेल मेस्सी की अगुआई वाली अर्जेंटीना के पास इस तेज तर्रार पासिंग का कोई जवाब नहीं था। पेद्री और रोद्री ने मिडफील्ड को अपने कब्जे में रखा। मेस्सी को खेल में असर छोड़ने का कोई मौका नहीं मिला। दबाव में आकर अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने आक्रामक फाउल का सहारा लिया। इसके चलते रेफरी को पांच बार पीले कार्ड दिखाने पड़े और एक वक्त पर अर्जेंटीना को 10 खिलाड़ियों के साथ ही मैदान पर टिकना पड़ा।
फर्नांडो टोरेस का निर्णायक गोल और मेस्सी के आंसू
नियमित 90 मिनट का खेल खत्म होने तक दोनों ही टीमें कोई गोल नहीं कर सकी थीं। मुकाबला जब अतिरिक्त समय में पहुंचा तो 106वें मिनट में मैच का सबसे बड़ा पल आया। निको विलियम्स से मिले हेडर के बाद पेनल्टी बॉक्स के पास मौजूद विकल्प के रूप में मैदान पर आए फर्नांडो टोरेस ने बेहद खूबसूरती से गेंद को बाएं पैर से जाल में डाल दिया। यही गोल स्पेन को दूसरी बार विश्व चैंपियन बनाने के लिए काफी साबित हुआ।
अंतिम सीटी बजते ही स्टेडियम का माहौल एकदम बदल गया। एक तरफ स्पेनिश खेमे में जीत का जश्न शुरू हो गया, वहीं दूसरी तरफ 39 साल के लियोनेल मेस्सी मैदान के बीचों-बीच अकेले खड़े रह गए। पसीने में लथपथ जर्सी और घुटनों पर पट्टी बांधे मेस्सी की आंखों से बहते आंसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि एक महान दौर का अंत हो चुका है। साल 2022 की खिताबी जीत की खुशी के बाद 2026 की यह विदाई बेहद दर्दभरी रही। उन्होंने लगभग दो दशकों तक फुटबॉल प्रेमियों को जो खुशी दी, उसके बदले में स्टेडियम में मौजूद स्पेनिश समर्थकों ने भी खड़े होकर इस महान खिलाड़ी को सम्मान दिया।
लामिन यामल और मेस्सी का ऐतिहासिक मिलन
मैच के बाद एक ऐसा लम्हा भी आया जिसने फुटबॉल के अतीत और भविष्य को एक साथ जोड़ दिया। 19 नंबर की जर्सी पहने 19 साल के युवा स्टार लामिन यामल ने मैदान पर जाकर भावुक मेस्सी को गले लगाया।
Era over. Messi to Yamal🤝. The torch has been passed 👑
— 𝐐𝐮𝐚𝐝𝐫𝐢 𝐋𝐚𝐛𝐚𝐢𝐤𝐚🎙️⚽🎙️ (@BOSSMANMEDIA) July 20, 2026
Can the kid take on the mantle?🤞 pic.twitter.com/e41PEJic42
यह दृश्य खेल के इतिहास के सबसे खास क्षणों में दर्ज हो गया। इस मुलाकात की जड़ें साल 2007 में मिलती हैं। तब 20 साल के मेस्सी बार्सिलोना में एक चैरिटी कैलेंडर की शूटिंग के दौरान केवल 5 महीने के बच्चे लामिन यामल को अपनी गोद में लेकर नहला रहे थे। किसी ने सोचा भी नहीं था कि दो दशक बाद वही बच्चा मेस्सी का उत्तराधिकारी बनेगा और उन्हीं के सामने अपनी टीम को विश्व विजेता बनाएगा।
यामल का अब तक का करियर किसी सपने से कम नहीं रहा है। उन्होंने 17 साल की उम्र में 2024 का यूरोपीय कप जीता और अब 19 साल की उम्र में विश्व कप की ट्रॉफी अपने नाम कर ली। इतनी कम उम्र में यूरो कप और विश्व कप दोनों जीतने का रिकॉर्ड अब इस युवा खिलाड़ी के नाम दर्ज हो चुका है।
उनकी खेल शैली में मेस्सी जैसी ही ड्रिबलिंग और नियंत्रण नजर आता है। माता-पिता के संघर्षों से निकलकर फुटबॉल के इस सबसे बड़े शिखर तक पहुंचने वाले यामल ने यह साबित कर दिया है कि खूबसूरत फुटबॉल का जादू आज भी बरकरार है। स्पेन की इस ऐतिहासिक जीत ने खेल जगत को एक नया नायक दे दिया है।
दुलाल महमूद: खेल लेखक और शोधकर्ता

