लोकसंस्कृति की जीवित मिसाल, डिजिटल शोषण की शिकार—अलीमुन बुआ
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
बिहार के मध्य क्षेत्र, जिसे मगही क्षेत्र भी कहा जाता है, से एक कहानी सामने आई है, जो कला और कलाकारों के शोषण की दुखद सच्चाई को बयां करती है। यह कहानी है 65 वर्षीय अलीमुन बुआ की, जिनकी आवाज में जादू है, लेकिन जीवन में आज भी बदहाली और संघर्ष का साया है। उन्हें मध्य बिहार की ‘लता मंगेशकर’ भी कहा जाता है, खासकर ‘सोहर’ गाने के मामले में।
यह सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं है कि बड़े मुकाम का झांसा देकर कलाकारों का शोषण होता है। कला, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसी शिकायतें आम हैं। अलीमुन बुआ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। मध्य बिहार के कई यूट्यूबर्स उनके गाए हुए गानों को रिकॉर्ड कर लाखों व्यूज बटोर रहे हैं और यूट्यूब से गोल्डन और सिल्वर प्ले बटन पा रहे हैं, लेकिन बुआ की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। उनका जीवन आज भी वैसा ही है जैसा उनके बचपन के दिनों में था – बदहाली और बदहाली।
लगभग सात साल पहले, 24 जुलाई 2018 को यासिर मिर्जा एचडी इंडिया ने जब उनका सोहर गाते हुए एक वीडियो यूट्यूब पर पोस्ट किया था, तो उनकी आवाज की खनक ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। उस वीडियो पर आई प्रतिक्रियाओं की बाढ़ से पता चलता है कि उनकी आवाज में कितना जादू है।
मोहन पांडे नामक एक दर्शक ने लिखा था, “क्या खनक है चाची की आवाज में बिना म्यूजिक के सलाम है ❤️ से।”
एक अन्य दर्शक फिरोज खान ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा था, “कितनी प्यारी आवाज है.. काश कि मैं इनकी मदद कर सकता।”
इसी तरह की कई प्रतिक्रियाएं, जैसे “बहोत सुंदर सोहर गीत”, “सुपर”, और “इनकी आवाज बड़ी प्यारी है, मैं इनकी फैन हूं”, इस बात का सबूत थीं कि उनकी कला में कितनी गहराई है। कुछ लोगों ने तो उन्हें ‘वॉयस इंडिया’ जैसे शो में भेजने और पार्श्व गायिका बनाने तक की सलाह दी थी, यह मानते हुए कि उनके सुर बहुत अच्छे हैं और वह इस लायक हैं।
एक और दर्शक ने उनकी तुलना बेगम अख्तर से करते हुए कहा था, “हाई लेवल गायकी, बेगम अख्तर की याद आती है।”
लोगों ने उनके पते की जानकारी मांगी थी ताकि वे उनकी मदद कर सकें, लेकिन आज भी उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
हाल के दिनों में, लगभग सात साल बाद, अलीमुन बुआ और उनके ‘सोहर’ एक बार फिर सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं। कई यूट्यूबर्स उनके गानों को रिकॉर्ड कर रहे हैं और फेसबुक व इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर रील्स और वीडियो बनाकर व्यूज और पैसे कमा रहे हैं। 65 साल की उम्र में भी उनकी आवाज की खनक और मिठास बरकरार है।
एक यूट्यूबर से बातचीत में, अलीमुन बुआ बताती हैं कि वह 10-12 साल की उम्र से गा रही हैं और आज भी यही उनका पेशा है। वह घर पर रहती हैं और जब किसी के यहां बच्चा होता है या शादी-ब्याह होता है, तो उन्हें गाने के लिए बुलाया जाता है। इसी से उनका परिवार चलता है। उनके लिए गायकी सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि जीवन जीने का साधन है।
सोहर: बिहार की संस्कृति और धरोहर
सोहर, बिहार और उससे सटे उत्तर प्रदेश के हिस्सों में खुशी के मौके पर गाया जाने वाला एक पारंपरिक लोकगीत है। यह मुख्य रूप से बच्चे के जन्म पर गाया जाता है। इसमें हिंदू-मुसलमान का कोई भेद नहीं होता। मुसलमानों के यहां भी शादियों और बच्चे के जन्म पर मिरियासियों से सोहर गवाने का खास चलन है।
लोक गायिका आकांक्षा प्रिया अपने एक लेख में सोहर का महत्व समझाती हैं। वह लिखती हैं कि सोहर का मतलब मांगलिक गीत से है, जो सदियों से गाया जा रहा है। प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण के जन्मोत्सव पर आज भी सोहर गाया जाता है। इन गीतों में ‘ललना’ शब्द का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है, जिससे पता चलता है कि यह सोहर है।
आज के दौर में कई पुरुष गायक भी सोहर गाकर काफी प्रसिद्धि पा चुके हैं। आकांक्षा प्रिया पंडित चुन्नू लाल मिश्रा का उदाहरण देती हैं, जिनकी वृद्धावस्था वाली मधुर आवाज में गाया गया सोहर, “सखि सब गावेली सोहर, रतिया मनोहर हो, ललना यशोदा के भइले किशोर, मुरली मनोहर हो,” आज भी लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
लोकगीतों में यह अनिवार्य होता है कि पहले प्रभु श्री राम या श्री कृष्ण का स्मरण किया जाए, फिर उसके बाद ही घर के सदस्यों के नाम से गीत को आगे बढ़ाया जाता है।
हाल ही में लोकप्रिय वेब सीरीज ‘पंचायत सीजन-3’ में भी मनोज तिवारी की आवाज में गाए गए सोहर को दिखाया गया, जिसने सीरीज के एक सीन में एक अलग ही आनंद बिखेर दिया।

आकांक्षा प्रिया अपने बचपन का एक किस्सा भी साझा करती हैं, जब उनके गांव में एक ‘लौंडा’ (पुरुष नर्तक) था, जो नृत्य के साथ-साथ गायन में भी निपुण था। उसकी तेज और सुरीली आवाज में गाया गया सोहर लोगों को अपनी ओर खींच लेता था। वह अक्सर अपनी तेज आवाज में गाए गए सोहर से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता था, खासकर सोहर में उसे विशेष महारत हासिल थी।

वह एक सोहर की पंक्तियां याद करती हैं, “कवन मासे बाबा मोर बियाह कएलन, कवन मासे गवन कएलन होऽ, ललना कवन मासे स्वामी सेजिया सोएली कि, आठो अंगवा भारी भइले होऽ…” इन गीतों के माध्यम से लाड-दुलार, शिकवे-शिकायत, रूठना-मनाना और उम्मीदों का पूरा होना सब कुछ बयां होता था।
आज जब अलीमुन बुआ की कहानी सामने आती है, तो यह सवाल उठता है कि क्या डिजिटल युग कला और कलाकारों के लिए वरदान है या एक नया शोषण का माध्यम? एक तरफ यूट्यूबर्स उनकी कला को दुनिया तक पहुंचा रहे हैं, जिससे उनकी कला को पहचान मिल रही है, लेकिन दूसरी तरफ, उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि कई बार कला को बढ़ावा देने के नाम पर, कलाकार की स्थिति को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
अलीमुन बुआ की कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमें अपनी संस्कृति और विरासत को बचाने के साथ-साथ, उन कलाकारों का भी ध्यान रखना चाहिए जो इन्हें जीवित रखे हुए हैं। उनकी कला का सम्मान करना और उन्हें उनके काम का सही मुआवजा दिलाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

