क्या भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ का संरक्षण अब सिर्फ दुआओं के भरोसे?
मुस्लिम नाउ विशेष रिपोर्ट
भारत के मुस्लिम समुदाय का सबसे प्रतिष्ठित और प्रमुख संगठन, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB), आज अपने सबसे बड़े इम्तिहान से गुजर रहा है। यह इम्तिहान सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता, नेतृत्व और भविष्य की दिशा से जुड़ा है। हाल ही में वक्फ अधिनियम 2025 से संबंधित एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के संभावित फैसले से ठीक पहले, बोर्ड के सोशल मीडिया हैंडल से एक संदेश जारी किया गया। इस संदेश में कौम से “दुआ” करने की अपील की गई, ताकि फैसला मुसलमानों के हक में आए। यह अपील जहां एक ओर धार्मिक आस्था को दर्शाती है, वहीं दूसरी ओर इसने संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब किसी मुश्किल घड़ी में समुदाय को दुआ का सहारा लेने को कहा गया हो, लेकिन इस बार यह अपील एक ऐसे संगठन की ओर से आई है, जिसे कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक मोर्चों पर मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए बनाया गया था। इस पोस्ट पर मिली प्रतिक्रियाएं संगठन के प्रति बढ़ती निराशा को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। अफज़ाल रहमानी जैसे लोगों ने सीधे तौर पर लिखा, “हम देख रहे हैं कि भाजपा जो भी फैसला चाहती है, वही फैसला होता है। अब हमें अपने अधिकार मांगने से नहीं, बल्कि छीनने से मिलते हैं!” सेराज अनवर ने नेतृत्व से सीधे पूछा, “फैसला खिलाफ आने के बाद क्या किया जाना चाहिए, यह रुख साफ होना चाहिए।” इन प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि समुदाय अब केवल दुआओं पर निर्भर रहने के बजाय ठोस रणनीति और मजबूत नेतृत्व चाहता है।
बूढ़ा नेतृत्व: क्या यह तेजरफ्तार दौर की जरूरत है?
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की वेबसाइट और उसके संगठनात्मक ढाँचे को देखें तो एक गंभीर विरोधाभास सामने आता है। संगठन के अधिकांश सदस्य 55 वर्ष से अधिक आयु के हैं, और कई तो 80 वर्ष की उम्र के करीब हैं। यह एक ऐसा नेतृत्व है, जिसने बाबरी मस्जिद जैसे ऐतिहासिक मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ी, लेकिन आज यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह बूढ़ा नेतृत्व इस तेजरफ्तार और डिजिटल युग की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है? एक ओर जहां देश के युवा अपनी बात रखने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं बोर्ड की वेबसाइट पर 2021 की पुरानी खबरें पड़ी हैं, जिनमें से अधिकांश बाबरी मस्जिद से संबंधित हैं। यह संगठन की डिजिटल उदासीनता और युवाओं से उसकी दूरी का सीधा सबूत है।

आलोचक सवाल उठाते हैं कि क्या बोर्ड की बुनियाद केवल बाबरी मस्जिद के लिए रखी गई थी? और अगर ऐसा था भी, तो क्या वह अपने उस प्राथमिक लक्ष्य को भी बचा पाया? पिछले एक दशक में, देश और विभिन्न राज्यों में कई ऐसे फैसले आए, जो मुस्लिम और पर्सनल लॉ के खिलाफ थे, लेकिन मुसलमानों का यह सबसे बड़ा संगठन इनमें से एक भी फैसले को रोक नहीं पाया। यह संगठन के उन लक्ष्यों और उद्देश्यों से मेल नहीं खाता, जो उसकी वेबसाइट पर सूचीबद्ध हैं। बोर्ड का कहना है कि उसका उद्देश्य भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ की रक्षा करना, शरीयत अधिनियम को बनाए रखना और ऐसे सभी कानूनों को निरस्त करने का प्रयास करना है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करते हों। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

प्रशासन से दूरी और ‘मुखौटों’ का सहारा
नए वक्फ कानून का विरोध भी किसी ढोंग से कम नहीं लगता। एक ऐसे देश में जहां 22 करोड़ से अधिक मुसलमान रहते हैं, उनका सबसे बड़ा प्रतिनिधि संगठन सरकार के सामने इतनी भी मजबूत पैरवी नहीं कर पाया कि कोई प्रभावशाली केंद्रीय मंत्री उनके मसले सुनने के लिए उनसे सीधे मुलाकात करे। इसके बजाय, यह आरोप लग रहे हैं कि बोर्ड मुसलमानों के कुछ ‘मुखौटों’ को आरएसएस से बात करने के लिए आगे कर रहा है। यह एक बड़ा सवाल है: क्या आरएसएस सरकार है? अगर नहीं, तो क्यों नहीं सरकार से सीधी बातचीत हो रही है? अगर सरकार 22 करोड़ मुसलमानों की बात नहीं सुनती, तो क्यों नहीं बोर्ड पूरे देश के मुसलमानों को एकजुट करके किसी भी आने वाले चुनाव में हिस्सा न लेने का आह्वान करता? ऐसे में, संविधान में दिए गए अधिकारों के बिना चुनाव में हिस्सा लेने का क्या फायदा? यह मांग उन युवाओं और कार्यकर्ताओं की ओर से उठ रही है जो चाहते हैं कि संगठन सिर्फ मंचों पर सरकार विरोधी बातें न करे, बल्कि अंधेरे में सरकारी नुमाइंदों से मुलाकात करने के बजाय ठोस और पारदर्शी निर्णय ले।

संगठन का परिचय कहता है कि मुसलमानों का पर्सनल लॉ उनके धर्म का एक अविभाज्य अंग है, जिसका स्रोत कुरान और सुन्नत है। लेकिन इस पवित्र सिद्धांत को जमीनी स्तर पर लागू करने और बचाने में यह संगठन नाकाम रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बोर्ड न तो मुसलमानों के पर्सनल लॉ को सुरक्षित रख पा रहा है और न ही इसे सरकार के सामने मजबूती से पेश करने में कामयाब हो पा रहा है। यही वजह है कि जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर दुआ करने की बात इसकी ओर से सोशल मीडिया पर रखी गई, तो लोग इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देने से नहीं चूके।

विजन की कमी और युवाओं की उपेक्षा
बोर्ड के पास युवा टोली का स्पष्ट अभाव है। नए सदस्य, नए विचार और नई ऊर्जा की कमी संगठन में साफ़ दिखाई देती है। यह कमी संगठन की रचनात्मकता और प्रभावशीलता को बाधित कर रही है। उदाहरण के लिए, बोर्ड वक्फ संपत्तियों को बचाने की लड़ाई तो लड़ रहा है, लेकिन क्या इसने कभी देश की बड़ी मस्जिदों को ज्ञान केंद्र (नॉलेज सेंटर) में बदलने का कोई अभियान चलाया? ऐसा इसलिए नहीं हो सका क्योंकि मौजूदा सदस्यों के पास इस तरह का कोई विजन नहीं है और न ही उनके पास ऐसा कोई सलाहकार है। इसी तरह, यह संगठन अजीम प्रेमजी जैसे परोपकारी लोगों के चैरिटी फंड में से अपने हिस्से का फंड क्यों नहीं निकलवा पाया?

भारत में मुसलमानों का गौरवशाली इतिहास है। आज देश के उत्थान में मुसलमान अन्य कौमों की तरह जी जान से जुटे हैं। लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस ऊर्जा और क्षमता को भुना पाने में असमर्थ रहा है। यह दुख और चिंता का विषय है कि संगठन अपने दोनों प्रमुख लक्ष्यों – मुसलमानों के पर्सनल लॉ को सुरक्षित रखना और सरकार के सामने उनकी आवाज मजबूती से रखना – में नाकाम साबित हो रहा है।
मुस्लिम संगठनों को अब युवाओं को हिस्सेदारी देने की सख्त जरूरत है। युवा नए-नए विचारों के साथ न केवल कौम की आवाज बन सकते हैं, बल्कि अपने नए नजरिए से शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक उत्थान में भी मदद कर सकते हैं। यह समय है कि बोर्ड अपने पुराने ढर्रे को छोड़कर नए और गतिशील नेतृत्व को अवसर दे। वरना, यह संगठन अपनी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता दोनों खो देगा, और इसका नेतृत्व एक ऐसे तबके के हाथों में चला जाएगा जो सिर्फ दुआओं और प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शनों पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक मोर्चों पर प्रभावी रूप से लड़ने में सक्षम होगा।

