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मस्जिदों पर कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा भारत में अल्पसंख्यकों का मुद्दा

नौशाद अख्तर/नई दिल्ली

भारत में मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों को गिराए जाने की घटनाओं तथा अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकारों को लेकर उठ रही चिंताओं ने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का रूप ले लिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान भारत में कथित सांप्रदायिक हमलों, मॉब लिंचिंग और धार्मिक आधार पर फैल रही नफरत का मुद्दा उठाया। उन्होंने धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने और अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले कथित भेदभाव पर चिंता जताई। उनके बयान के बाद भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

इसी बीच पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आईपीएस अधिकारियों के तबादलों को लेकर तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से एक अंतरराष्ट्रीय संगठन को पत्र लिखे जाने की खबर भी सामने आई। आरोप लगाया गया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान कुछ मुस्लिम आईपीएस अधिकारियों को जानबूझकर उनके पदों से हटाया गया। हालांकि, इन आरोपों और तबादलों के पीछे के कारणों को लेकर संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। इन घटनाओं के बीच नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर मस्जिदों और अन्य इबादतगाहों को गिराए जाने के विरोध में विभिन्न मुस्लिम संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने प्रदर्शन किया।

इन घटनाओं ने धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और भारत की लोकतांत्रिक छवि से जुड़े सवालों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि धार्मिक स्थलों की सुरक्षा किसी एक समुदाय का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के संविधान, कानून के शासन और सभी नागरिकों के समान अधिकारों से जुड़ा सवाल है।

अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय बहस

भारत लंबे समय से पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। इन देशों में हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा, धार्मिक स्थलों पर हमलों, जबरन धर्मांतरण और संपत्तियों पर कब्जे की शिकायतें भारत की ओर से विभिन्न अवसरों पर सामने रखी जाती रही हैं। भारत में इन मुद्दों को लेकर यह चिंता भी जताई जाती रही है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके बुनियादी अधिकार सुनिश्चित करना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है।

हालांकि, भारत में भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान मुसलमानों के खिलाफ कथित भेदभाव, मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक हिंसा, धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद और बुलडोजर कार्रवाई जैसे मुद्दों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। मुस्लिम संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कई जगहों पर मस्जिदों, दरगाहों और अन्य धार्मिक स्थलों को अतिक्रमण या अवैध निर्माण के नाम पर निशाना बनाया जा रहा है। कुछ मामलों में धार्मिक स्थलों के स्वामित्व और ऐतिहासिक पहचान को लेकर अदालतों में विवाद भी चल रहे हैं।

मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि कानून का पालन कराने के नाम पर की जाने वाली किसी भी कार्रवाई में निष्पक्षता और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। यदि किसी धार्मिक स्थल के निर्माण या जमीन को लेकर विवाद है तो उसका समाधान कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए, न कि ऐसी कार्रवाई के जरिए जिससे किसी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हों।

भारत की बहुलतावादी संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान विभिन्न धर्मों और समुदायों के बीच सदियों से कायम सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों से बनी है। ऐसे में धार्मिक स्थलों को लेकर बढ़ते विवाद और सांप्रदायिक तनाव सामाजिक सौहार्द तथा आपसी विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं।

सहारनपुर की मस्जिद का मामला बना विरोध की वजह

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी मस्जिद को गिराए जाने का मामला इस विरोध प्रदर्शन की प्रमुख वजहों में शामिल रहा। आयोजकों और मुस्लिम संगठनों ने इस कार्रवाई पर आपत्ति जताते हुए सवाल उठाया कि ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखने वाले स्थलों के मामले में प्रशासन को संवेदनशीलता और कानूनी प्रक्रिया का पूरा ध्यान रखना चाहिए।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जब किसी धार्मिक स्थल को अतिक्रमण या अवैध निर्माण के आरोप में हटाया जाता है तो उससे जुड़े कानूनी पहलुओं, दस्तावेजों और संबंधित पक्षों को सुनने की प्रक्रिया का पारदर्शी होना जरूरी है। उनका मानना है कि किसी भी धार्मिक स्थल को लेकर कार्रवाई ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे किसी समुदाय को यह महसूस हो कि उसके धार्मिक अधिकारों के साथ भेदभाव किया जा रहा है।

मुस्लिम संगठनों ने आरोप लगाया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में मस्जिदों और दरगाहों को लेकर विवाद बढ़ रहे हैं। कुछ मामलों में धार्मिक स्थलों को प्राचीन मंदिर बताकर उनके धार्मिक स्वरूप और स्वामित्व को अदालतों में चुनौती दी जा रही है। वहीं, अतिक्रमण हटाने और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर भी धार्मिक ढांचों को हटाए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

इन परिस्थितियों में मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी धार्मिक विरासत और इबादतगाहों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ने की बात कही जा रही है। हालांकि, प्रत्येक मामले में तथ्यों, कानूनी स्थिति और संबंधित प्रशासनिक आदेशों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

जंतर-मंतर पर विभिन्न समुदायों की भागीदारी

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में ‘मॉनिटरिंग कमिटी ऑफ इंडियन मुस्लिम्स’ के बैनर तले मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ताओं, वकीलों, छात्रों और विभिन्न समुदायों के लोगों ने हिस्सा लिया। आयोजकों के अनुसार, यह प्रदर्शन केवल मस्जिदों को गिराए जाने के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक न्याय से जुड़े व्यापक सवाल भी इसमें उठाए गए।

प्रदर्शन में शामिल लोगों ने मस्जिदों, चर्चों और अन्य इबादतगाहों के खिलाफ की जा रही कथित कार्रवाइयों पर चिंता जताई। उनका कहना था कि धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सभी समुदायों के लिए समान रूप से सुनिश्चित की जानी चाहिए। किसी भी धार्मिक स्थल के खिलाफ कार्रवाई करते समय कानून और संविधान में दिए गए अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।

प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने कई नेताओं, सांसदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया। हिरासत में लिए गए लोगों में लोकसभा सांसद इकरा हसन, मुहिबुल्लाह नदवी, जिया-उर-रहमान बर्क, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान और स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल हफीज सहित कई अन्य लोग शामिल थे। आयोजकों के अनुसार, हिरासत में लिए गए लोगों को अलग-अलग पुलिस थानों में ले जाया गया।

इस पुलिस कार्रवाई को लेकर आयोजकों और प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने सवाल उठाए। उनका कहना था कि उन्होंने पहले ही अधिकारियों को कार्यक्रम की जानकारी दे दी थी और उनका उद्देश्य शांतिपूर्ण तरीके से अपनी चिंताएं सामने रखना था।

लोकतांत्रिक अधिकारों और पुलिस कार्रवाई पर सवाल

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि मस्जिदों और अन्य इबादतगाहों का मुद्दा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यह कानून के शासन, संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है।

उन्होंने कहा कि जब किसी इबादतगाह को कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा के बिना गिराया जाता है या उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो इससे कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन को लेकर सवाल पैदा होते हैं। उनके अनुसार, मस्जिदों और चर्चों को निशाना बनाए जाने की शिकायतें सामाजिक सौहार्द और देश की साझा संस्कृति के लिए चिंता का विषय हैं।

सआदतुल्लाह हुसैनी ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान नेताओं और नागरिकों को हिरासत में लिए जाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि नागरिकों को अपनी चिंताएं लोकतांत्रिक तरीके से रखने का अवसर मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, पुलिस की कार्रवाई से शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। उन्होंने इस मामले में जवाबदेही तय करने की मांग की।

पूर्व सांसद और इंडियन मुस्लिम्स फॉर सिविल राइट्स (आईएमसीआर) के अध्यक्ष मोहम्मद अदीब ने भी पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आयोजकों ने प्रशासन को कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी थी और उनका उद्देश्य शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना था। अदीब के अनुसार, नागरिकों को अपनी बात रखने से रोकना और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को हिरासत में लेना लोकतांत्रिक अधिकारों के संदर्भ में विचारणीय है।

लोकसभा सांसद इकरा हसन ने भी शांतिपूर्ण विरोध को नागरिकों का बुनियादी अधिकार बताते हुए कहा कि लोगों की चिंताओं को खतरे के रूप में देखने के बजाय उन्हें सुना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों को एकजुट होकर अपनी समस्याएं और विचार सामने रखने का अधिकार है।

मुस्लिम संगठनों का व्यापक मुद्दों पर ध्यान

आयोजकों ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन का उद्देश्य केवल मुसलमानों से संबंधित मुद्दों को उठाना नहीं था। इसमें धार्मिक स्वतंत्रता, इबादतगाहों की सुरक्षा, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक जवाबदेही के साथ-साथ विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर भी चिंताएं जाहिर की गईं।

आयोजकों के मुताबिक, विभिन्न समुदायों के लोग इस विश्वास के साथ एक मंच पर आए कि धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सभी नागरिकों के लिए समान रूप से होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान, आस्था और इबादत के अधिकार को सुरक्षित रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

मुस्लिम संगठनों का कहना है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों का समाधान पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए। साथ ही, प्रशासनिक कार्रवाई में किसी भी तरह के धार्मिक या सामुदायिक भेदभाव की आशंका को दूर करना भी जरूरी है। उनका मानना है कि जब किसी समुदाय को अपने धार्मिक स्थलों और अधिकारों को लेकर असुरक्षा महसूस होती है तो उसका असर सामाजिक संबंधों और संस्थाओं पर भरोसे पर भी पड़ सकता है।

भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि से जुड़ा सवाल

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए भाषण और भारत में धार्मिक स्थलों को लेकर उठ रहे विवादों ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय बहस को एक नया संदर्भ दिया है। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं। दोनों देशों में धार्मिक समुदायों की सुरक्षा से जुड़े सवाल राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बनते रहे हैं।

भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान रखता है। यहां विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। ऐसे में धार्मिक स्वतंत्रता, कानून के समान अनुपालन और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा केवल घरेलू प्रशासन का विषय नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धताओं से भी जुड़ी हुई है।

मुस्लिम संगठनों की मांग है कि मस्जिदों और अन्य इबादतगाहों से जुड़े विवादों का समाधान संविधान और कानून के दायरे में किया जाए तथा शांतिपूर्ण विरोध करने वाले नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जाए। वहीं, प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक मामले में कानूनी तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई करे और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखे।

जंतर-मंतर का प्रदर्शन इस बात को रेखांकित करता है कि धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर मुस्लिम समुदाय के भीतर गंभीर चिंताएं मौजूद हैं। इन चिंताओं का समाधान संवाद, पारदर्शिता और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया के जरिए किया जाना जरूरी है, ताकि देश की बहुलतावादी परंपरा, सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक संस्थाओं में नागरिकों का भरोसा कायम रह सके।

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