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आजम खान का ‘मास्टरस्ट्रोक’ या मजबूरी? जौहर ट्रस्ट से इस्तीफे की खबर और सियासत का नया उबाल

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उत्तर प्रदेश की राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले और समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता मोहम्मद आजम खान एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार चर्चा उनके किसी बयान को लेकर नहीं, बल्कि उनके ड्रीम प्रोजेक्ट ‘मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट’ से उनके और उनके परिवार के इस्तीफे की खबरों को लेकर है। रामपुर की सियासत से निकलकर यह खबर अब लखनऊ और दिल्ली के गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है।

इस्तीफे की खबर: क्या है पूरा मामला?

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों के अनुसार, रामपुर जेल में बंद आजम खान, उनकी पत्नी पूर्व सांसद डॉ. तंजीन फातिमा और उनके छोटे बेटे पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम ने जौहर ट्रस्ट के अपने आधिकारिक पदों से इस्तीफा दे दिया है। बताया जा रहा है कि आजम खान इस ट्रस्ट के अध्यक्ष थे, जबकि तंजीन फातिमा सचिव की भूमिका में थीं।

अब ट्रस्ट की कमान आजम खान की बहन निकहत अफ़लाक को सौंपी गई है, जिन्हें नया अध्यक्ष बनाया गया है। वहीं, आजम खान के बड़े बेटे अदीब आजम को ट्रस्ट का सचिव नियुक्त किया गया है। नई कार्यकारिणी में मुश्ताक अहमद सिद्दीकी को उपाध्यक्ष, नसीर अहमद खान को संयुक्त सचिव और जावेद उर रहमान खान को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है।

क्यों उठाना पड़ा यह कदम? रणनीति या कानूनी दबाव?

आजम खान का हर कदम एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जाता है। जानकारों का कहना है कि इस इस्तीफे के पीछे तीन प्रमुख कारण हो सकते हैं:

  1. संचालन की बाधाएं: आजम खान और उनके परिवार के सदस्य विभिन्न कानूनी मामलों में जेल में हैं। ट्रस्ट के कर्ता-धर्ता होने के नाते, उनके जेल में रहने से जौहर यूनिवर्सिटी और रामपुर पब्लिक स्कूल के प्रशासनिक कार्यों और बैंक ऑपरेशंस में काफी दिक्कतें आ रही थीं।
  2. कानूनी शिकंजा: जौहर ट्रस्ट पर वर्तमान में 30 से अधिक मुकदमे चल रहे हैं। शत्रु संपत्ति से लेकर जमीन कब्जे तक के आरोपों ने ट्रस्ट को चारों तरफ से घेर रखा है। ऐसे में परिवार का पदों से हटना कानूनी बचाव की एक प्रक्रिया हो सकती है।
  3. संस्था को बचाने की कवायद: आजम खान नहीं चाहते कि उनके राजनीतिक और कानूनी संघर्ष की भेंट उनका यह ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ चढ़ जाए। नए चेहरों को सामने लाकर वे ट्रस्ट के अस्तित्व को बचाए रखना चाहते हैं।

विरोधियों के निशाने पर आजम: ‘बबूल के पेड़’ वाला तंज

आजम खान के इस फैसले पर उनके विरोधियों ने तीखे हमले किए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने इस पर तंज कसते हुए कहा, “आजम खान ने यूनिवर्सिटी के नाम पर बबूल का पेड़ लगाया था, जिसमें फल लगने के बाद उन्होंने खुद ही उसे खाया और अब जेल पहुंच गए। जब वे सत्ता में थे, तो उन्होंने गरीबों के घर तोड़े और जमीनों पर कब्जा किया। अब कानून अपना काम कर रहा है।”

अंसारी का इशारा उन आरोपों की तरफ था जिनमें कहा गया है कि जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए नियमों को ताक पर रखा गया और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया।

सस्पेंस और विरोधाभास: विश्वविद्यालय प्रशासन का इनकार

दिलचस्प बात यह है कि जहां एक तरफ इस्तीफे की खबरें जंगल की आग की तरह फैल रही हैं, वहीं दूसरी ओर जौहर विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक प्रेस वार्ता कर इन खबरों को ‘झूठा और निराधार’ करार दिया है।

विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर प्रोफेसर डॉ. जहीरूद्दीन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस्तीफे की बातें केवल अफवाहें हैं। हालांकि, जब मीडिया ने उनसे सीधा सवाल किया कि क्या आजम खान और उनका परिवार अभी भी ट्रस्ट के सदस्य हैं, तो उन्होंने इसका स्पष्ट जवाब देने के बजाय कहा, “यह जानने का अधिकार किसी को नहीं है।” विश्वविद्यालय प्रशासन ने ऐसी खबरें फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।


जौहर यूनिवर्सिटी: एक सपना जो विवादों में घिर गया

मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना 17 सितंबर 2006 को हुई थी। इसके शिलान्यास समारोह में सपा संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह और जया प्रदा जैसे दिग्गज शामिल हुए थे। 2013 में इसे अल्पसंख्यक संस्थान की मान्यता मिली।

आजम खान ने अक्सर जनसभाओं में कहा है कि उन्होंने यह यूनिवर्सिटी रामपुर और देश के युवाओं के भविष्य के लिए बनाई है। लेकिन 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद, इस संस्थान पर आरोपों की बौछार शुरू हो गई। किसानों की जमीन दबाने, चकरोड पर कब्जा करने और वक्फ संपत्तियों के गलत इस्तेमाल के आरोपों में आजम खान पर मुकदमों का अंबार लग गया।

जेल की सलाखें और भविष्य की चुनौतियां

फिलहाल आजम खान और अब्दुल्ला आजम ‘दो पैन कार्ड’ और ‘दो जन्म प्रमाण पत्र’ से जुड़े मामलों में सजा काट रहे हैं। उनके खिलाफ दर्जनों अन्य मामले भी अदालतों में लंबित हैं। ‘मुस्लिम नाउ ब्यूरो’ के अनुसार, आजम खान की कार्यशैली ने उनके जितने समर्थक बनाए, उतने ही कट्टर दुश्मन भी पैदा किए। यही कारण है कि उनके दुश्मन उनकी हर चाल पर बारीक नजर रखते हैं।

मीडिया का एक वर्ग जहां इसे आजम खान के “पतन” के तौर पर देख रहा है, वहीं उनके समर्थक इसे उनकी एक “कुशल रणनीति” बता रहे हैं ताकि उनकी गैर-मौजूदगी में भी उनका मिशन चलता रहे।

निष्कर्ष

आजम खान का जौहर ट्रस्ट से इस्तीफा देना (यदि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि होती है) एक युग के अंत जैसा है। यह न केवल आजम खान के निजी राजनीतिक करियर के लिए एक बड़ा मोड़ है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व के बदलते समीकरणों का भी संकेत है। अब देखना यह होगा कि नई कार्यकारिणी क्या इस यूनिवर्सिटी को कानूनी भंवर से निकाल पाएगी या आजम खान की मुश्किलें और बढ़ेंगी।

#New arrangements at Jauhar Trust: a significant step towards the smooth functioning of educational institutions.