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बीजेपी की नई टीम, मुस्लिम प्रतिनिधित्व और भावी चुनौतियां

सपंदकीय

भारतीय जनता पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पद संभालने के लगभग 200 दिनों के लंबे इंतजार के बाद अंततः अपनी बहुप्रतीक्षित नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान कर दिया है। 76 सदस्यीय इस नई कार्यकारिणी में वरिष्ठ और युवा चेहरों का संतुलन बनाने की कोशिश की गई है, जिसकी औसत उम्र लगभग 60 वर्ष है। हालांकि, महिलाओं को मात्र 15 प्रतिशत (12 पद) स्थान मिलना पार्टी के 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के दावों पर सवाल खड़े करता है।

लेकिन इस नई टीम का सबसे चर्चित पहलू है—मुस्लिम समुदाय को साधने की रणनीति, जिसमें पार्टी संभवतः अधूरी तैयारी के साथ उतरती दिख रही है।

मुस्लिम चेहरे और ‘पसमांदा’ कार्ड की जमीनी हकीकत

बीजेपी पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि उसकी राजनीति में मुसलमानों के लिए कोई खास जगह नहीं है। इस छवि को बदलने के प्रयास में नितिन नवीन ने राष्ट्रीय टीम में दो मुस्लिम चेहरों को शामिल तो किया है, लेकिन दोनों ही नेता उत्तर प्रदेश से आते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर उनका जनाधार नगण्य है। सिकंदर बख्त, शाहनवाज हुसैन या मुख्तार अब्बास नकवी जैसा प्रभाव और पहचान इन नए चेहरों में फिलहाल नजर नहीं आती।

पार्टी ने इस बार शिया समुदाय के बजाय ‘पसमांदा’ (आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े) मुसलमानों को तरजीह देने की कोशिश की है:

  1. डॉ. तारिक मंसूर (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष): अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के पूर्व कुलपति रहे तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने शिक्षित और पिछड़े मुस्लिम वर्ग को संदेश देने की कोशिश की है। हालांकि, अकादमिक पृष्ठभूमि से आने के कारण उनका अधिकांश जीवन शैक्षणिक संस्थानों में बीता है और जनाधार वाले राजनीतिज्ञ के रूप में उनकी पकड़ बेहद कमजोर मानी जाती है।
  2. कुंवर बासित अली (अल्पसंख्यक मोर्चा अध्यक्ष): मेरठ के कायस्थ बड्डा गांव से आने वाले और मुस्लिम राजपूत समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले बासित अली ने 2011 में जिला सह-मीडिया प्रभारी से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। वे संगठन में सक्रियता के बल पर अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष से होते हुए अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक पहुंचे हैं। लेकिन उनका प्रभाव मुख्यतः पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है और स्वयं उनके अपने समाज में भी उनका कोई बड़ा राजनीतिक आधार नहीं है।

बीजेपी पिछले कुछ वर्षों से मुसलमानों में ‘पसमांदा’ नरेटिव के जरिए सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, जिसके लिए पर्दे के पीछे कई छद्म संगठन भी काम कर रहे हैं। मगर विडंबना यह है कि एक तरफ पार्टी पसमांदा मुसलमानों को संगठन में पद देकर ‘दरी समेटने’ का काम दे रही है, तो दूसरी तरफ धर्म के आधार पर पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेतृत्व सिरे से खारिज करता रहा है।

क्या केवल पद देने से मिलेगा चुनावी लाभ?

यदि बीजेपी सचमुच मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है, तो उसे इन नेताओं को केवल कागजी पदों तक सीमित रखने के बजाय सिकंदर बख्त या शाहनवाज हुसैन जैसा कद और राष्ट्रीय मंच पर वास्तविक तरजीह देनी होगी। महज सांकेतिक नियुक्तियों से पार्टी को कोई बड़ा चुनावी फायदा मिलने वाला नहीं है।

यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब बीजेपी के सामने उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में अपनी सत्ता बचाने की कठिन चुनौती है, और आगामी लोकसभा चुनाव भी बेहद करीब हैं। पिछला चुनाव पार्टी के लिए उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था और वर्तमान में कई मोर्चों पर सरकार-विरोधी माहौल बनता दिख रहा है।

चाहे वह राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवाद हों, बड़े नेताओं के इस्तीफे हों, बाबा रामदेव के तल्ख बयान हों या फिर गोरखपुर यूनिवर्सिटी के मुद्दे पर यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल द्वारा व्यक्त की गई नाराजगी—ये सभी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि संगठन और सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

ऐसे में, नितिन नवीन की यह नई टीम क्या बीजेपी को अंदरूनी बेचैनी से उबार पाएगी और मुस्लिम समुदाय में पैठ बना पाएगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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