क्या बिना अमेरिका के ईरान को हरा पाएगा इजरायल? वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने खोल दी पोल
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नौशाद अख्तर
क्या इजरायल वाकई इतना ताकतवर है कि वह अकेले दम पर ईरान से भिड़ सके और उसे नेस्तनाबूद कर दे? यह सवाल इन दिनों अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सोशल मीडिया पर जबरदस्त बहस का विषय बना हुआ है. इस बहस की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच बयानों की जंग से हुई. भारत के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने इस पूरे मामले की परत-दर-परत समीक्षा की है. मुकेश कुमार का दावा है कि अगर अमेरिका ने इजरायल का हाथ छोड़ दिया, तो ईरान और उसके सहयोगी संगठन मिलकर एक महीने के भीतर इजरायल का नामोनिशान मिटा सकते हैं.
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच क्यों बढ़ी तल्खी?
अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए एक समझौते के दौरान इजरायल लगातार लेबनान पर हवाई हमले कर रहा था. इस बात से नाराज होकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को दोटूक चेतावनी दी. ट्रंप ने कहा कि इजरायल आज सिर्फ अमेरिका के सैन्य और आर्थिक सहयोग की बदौलत ही सुरक्षित बचा हुआ है.
ट्रंप की इस धमकी पर इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू भी चुप नहीं रहे. उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि इजरायल अपने दम पर खड़ा है. उन्होंने दावा किया कि इजरायल अमेरिकी मदद के बिना भी वो सब कुछ करने में सक्षम है जो वह अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी समझता है. नेतन्याहू का यह सीधा इशारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की तरफ था.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ा तनाव
अपनी बात को सच साबित करने और दुनिया का ध्यान खींचने के लिए इजरायल ने लेबनान पर हमले तेज कर दिए हैं. हाल ही में इजरायल ने लेबनान पर बड़ा हमला करके 14 लोगों की जान ले ली. इस हमले के विरोध में ईरान ने अमेरिका के साथ समझौता होने के बावजूद ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (विदेशी व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता) को बंद कर दिया है.
जानकारों का मानना है कि इजरायल इस समय वैश्विक स्तर पर अकेला पड़ चुका है. ईरान और अमेरिका के बीच सुधरते रिश्तों को बिगाड़ने के लिए इजरायल बार-बार उकसावे वाली कार्रवाई कर रहा है.

मुकेश कुमार का विश्लेषण: दो हफ्ते भी टिकना मुश्किल
भारत के कई बड़े मीडिया घरानों के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने इस सैन्य संतुलन का बेहद सरल भाषा में विश्लेषण किया है. मुकेश कुमार के मुताबिक अगर अमेरिका ने इस युद्ध से अपने हाथ खींच लिए तो इजरायल दो सप्ताह से ज्यादा ईरान के सामने टिक नहीं पाएगा. चार हफ्ते बीतते-बीतते इजरायल का अस्तित्व पूरी तरह खतरे में पड़ जाएगा.
मुकेश कुमार ने इजरायल की सैन्य ताकत और अमेरिकी निर्भरता से जुड़े कुछ बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं:
- आर्थिक निर्भरता: साल 1948 में इजरायल के गठन के बाद से लेकर अब तक अमेरिका उसे 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा की सीधी मदद दे चुका है.
- हवाई ताकत: इजरायली वायुसेना के पास जितने भी लड़ाकू विमान हैं, वे सब अमेरिकी तकनीक और अमेरिका से मिले विमान हैं.
- गोला-बारूद: युद्ध में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक हथियार और गोला-बारूद की सप्लाई पूरी तरह अमेरिकी फैक्ट्रियों पर निर्भर है.
- आयरन डोम की हकीकत: इजरायल के जिस ‘आयरन डोम’ एयर डिफेंस सिस्टम की दुनिया भर में तारीफ होती है, उसका डिजाइन भले ही इजरायली हो, लेकिन उसमें इस्तेमाल होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलें अमेरिका बनाता है.
- थाड और पनडुब्बियां: इजरायल की सुरक्षा में तैनात ‘थाड’ मिसाइल सिस्टम अमेरिका का है और उसकी नौसेना की पनडुब्बियां जर्मनी से खरीदी गई हैं.
अगर अमेरिका अपनी सप्लाई चेन रोक दे, तो ईरान, हिजबुल्लाह और हमास मिलकर इजरायल को चारों तरफ से घेर लेंगे. ऐसी स्थिति में इजरायल के पास पलटवार करने की ताकत ही नहीं बचेगी.
क्या अमेरिका कभी इजरायल का साथ छोड़ेगा?
इस सवाल का जवाब देते हुए मुकेश कुमार कहते हैं कि यह पूरी स्थिति फिलहाल काल्पनिक लगती है. अमेरिका कभी भी इजरायल का साथ पूरी तरह नहीं छोड़ सकता. इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका के भीतर काम करने वाली ताकतवर ‘इजरायली लॉबी’ है. यह लॉबी अमेरिकी अर्थव्यवस्था, वहां के बैंकों, वॉल स्ट्रीट और पूरी राजनीति पर गहरा नियंत्रण रखती है. कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति इस लॉबी को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता.
मोसाद और इजरायली सेना की खुली पोल
पिछले कुछ महीनों में हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इजरायल के अजेय होने के भ्रम को तोड़ दिया है. इजरायल की खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ को दुनिया की सबसे खतरनाक एजेंसी माना जाता था. लेकिन हालिया संघर्षों ने साबित किया है कि मोसाद की खुफिया जानकारी में बड़े छेद हैं.
मोसाद को इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि ईरान के पास इतने आधुनिक ड्रोन और मिसाइलों का जखीरा मौजूद है. ईरान ने जिस तरह सीधे इजरायल की धरती पर मिसाइलें दागीं, उसने इजरायली डिफेंस सिस्टम की कमियों को उजागर कर दिया है. ईरान के पास इतनी मारक क्षमता है कि वह एक साथ इजरायल और खाड़ी देशों में बने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को तबाह कर सकता है.
इस जमीनी हकीकत से साफ है कि बेंजामिन नेतन्याहू का अकेले दम पर ईरान को हराने का दावा सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी है. असलियत यही है कि बिना अमेरिकी बैसाखी के इजरायल मध्य पूर्व के इस चक्रव्यूह में ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रह सकता.

