सिविल सर्विस छोड़ हक की आवाज बने पूर्व IPS अब्दुल रहमान, AMU से शुरू हुआ सफर
Table of Contents
नौशाद अख्तर
इंजीनियरिंग की पढ़ाई से लेकर देश की सबसे प्रतिष्ठित पुलिस सेवा तक का सफर आसान नहीं होता. लेकिन उससे भी ज्यादा मुश्किल होता है अपने सिद्धांतों के लिए उस चमकते करियर और ताकतवर पद को एक झटके में छोड़ देना. महाराष्ट्र कैडर के 1997 बैच के पूर्व आईपीएस अधिकारी अब्दुल रहमान की कहानी कुछ ऐसी ही है. वे आज देश में नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की एक मजबूत आवाज बन चुके हैं. उनकी इस बेबाक सोच और नेतृत्व क्षमता की नींव अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ही पड़ गई थी.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से मिला समाज सेवा का पाठ
अब्दुल रहमान ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की थी. एएमयू का माहौल सिर्फ किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहा. इस ऐतिहासिक संस्थान ने उनके भीतर समाज के पिछड़े और वंचित तबकों के प्रति एक गहरी संवेदनशीलता पैदा की. यूनिवर्सिटी के इसी माहौल ने उन्हें सिखाया कि समाज को केवल सीमेंट और कंक्रीट के ढांचों से नहीं बल्कि न्याय और समानता के सिद्धांतों से मजबूत बनाया जा सकता है. यही वजह रही कि उन्होंने पढ़ाई पूरी करने के बाद कॉर्पोरेट दुनिया में जाने के बजाय देश की सेवा करने का रास्ता चुना.
दो दशक से ज्यादा का बेदाग और शानदार पुलिस करियर
अब्दुल रहमान ने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की और साल 1997 में भारतीय पुलिस सेवा के लिए चुने गए. उन्हें महाराष्ट्र कैडर मिला. पुलिस सेवा में रहते हुए उन्होंने बीस साल से ज्यादा समय तक राज्य के सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण इलाकों में अपनी सेवाएं दीं. उनकी पहचान एक ईमानदार और निडर पुलिस अफसर के रूप में बनी.
वे यवतमाल और पुणे ग्रामीण जैसे बड़े जिलों में बतौर पुलिस अधीक्षक तैनात रहे. इसके अलावा उन्होंने महाराष्ट्र के सबसे चुनौतीपूर्ण नक्सल प्रभावित जिले गढ़चिरौली में भी पुलिस की कमान संभाली. जमीनी स्तर पर काम करने के अलावा उन्होंने मुंबई और पुणे जैसे बड़े महानगरों में पुलिस उपायुक्त के रूप में शहरी पुलिस व्यवस्था को सुधारने में बड़ी भूमिका निभाई.
अपने बेहतरीन काम की बदौलत वे लगातार तरक्की करते हुए स्पेशल पुलिस महानिरीक्षक के पद तक पहुंचे. इस दौरान उन्होंने राज्य पुलिस के वायरलेस विभाग का नेतृत्व किया. बाद में उन्होंने राज्य मानवाधिकार आयोग में भी अपनी सेवाएं दीं जहां उन्होंने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए.

पद और सत्ता पर भारी पड़ी अंतरात्मा की आवाज
अब्दुल रहमान के पूरे जीवन का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ दिसंबर 2019 में आया. देश में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन चल रहे थे. एक शीर्ष पुलिस अधिकारी के रूप में उनके पास ताकत और शानदार भविष्य दोनों थे. लेकिन उन्होंने संविधान के मूल्यों और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपने इतने बड़े पद को छोड़ने का फैसला कर लिया. उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उनका यह कदम देश भर में चर्चा का विषय बना क्योंकि बेहद कम प्रशासनिक अधिकारी ऐसे होते हैं जो अपने सिद्धांतों के लिए सत्ता का सुख त्यागने की हिम्मत दिखाते हैं.
पुलिस की वर्दी छोड़ अब किताबों के जरिए उठा रहे हैं जनता के मुद्दे
नौकरी से इस्तीफा देने के बाद भी अब्दुल रहमान शांत नहीं बैठे. उन्होंने समाज के दबे कुचले और हाशिए पर मौजूद लोगों की आवाज बनने का एक नया जरिया ढूंढ लिया. वे एक लेखक और नागरिक समाज के बड़े नेता के रूप में उभरे हैं. उन्होंने पुलिस सेवा के अपने दशकों के अनुभवों को किताबों की शक्ल दी है.
उनकी किताबें ‘डिनायल एंड डेप्रिवेशन’ और ‘सैफ्रन सर्ज’ देश के बौद्धिक जगत में काफी चर्चा में रहीं. इन किताबों में उन्होंने बेहद बारीकी से और आंकड़ों के साथ सामाजिक असमानता, न्यायिक सुधारों की जरूरत और हाशिए के समुदायों की समस्याओं को उजागर किया है.
एक सच्चे लोक सेवक की पहचान केवल उसकी वर्दी से नहीं होती बल्कि इस बात से होती है कि वह विपरीत परिस्थितियों में भी देश के संविधान और आम जनता के साथ कितनी मजबूती से खड़ा रहता है. एएमयू के इस होनहार पूर्व छात्र ने आज देश के सामने ईमानदारी और हौसले की एक नई मिसाल पेश की है.

