Culture

Colour My Grave Purple: असम की कहानियों की नई आवाज

मुस्लिम नाउ विशेष

भारत के पूर्वोत्तर की मिट्टी में कहानियां बसी हैं। वहां की नदियां, पहाड़, संघर्ष और संस्कृतियां अपने भीतर अनगिनत किस्से छुपाए हुए हैं। लेकिन इन कहानियों को शब्द देना आसान नहीं होता। खासकर तब, जब इतिहास भी जटिल हो और समाज भी कई परतों में बंटा हुआ हो। ऐसी ही आवाज बनकर सामने आई हैं शहनाब साहिन। एक ऐसी लेखिका, जिनकी पहली किताब ने साहित्य जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

असम में पली बढ़ीं शहनाब साहिन सिर्फ एक लेखिका नहीं हैं। उनका जीवन कई अनुभवों से गुजरा है। यही वजह है कि उनकी लेखनी में जमीन की सच्चाई भी दिखती है और इंसानी जज्बातों की गहराई भी।

शहनाब ने दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की पढ़ाई की। इसके बाद इटली की ट्यूरिन यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक भारत सरकार में सिविल सेवक के रूप में काम किया। लेकिन उनका सफर यहीं नहीं रुका।

उन्होंने बाद में अंतरराष्ट्रीय मानवीय क्षेत्र का रुख किया। आज वे युद्ध और संघर्ष से विस्थापित लोगों के सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास से जुड़े कार्यक्रमों पर काम करती हैं। फिलहाल वह लेबनान में रहती हैं और वहीं काम कर रही हैं। उनके साथ उनकी पालतू बिल्ली पेनेलोप भी है, जिसका जिक्र अक्सर उनके करीबियों के बीच मुस्कान की वजह बनता है।

लेकिन शहनाब की असली पहचान अब उनकी लेखनी बन रही है।

उनकी पहली किताब को एक मजबूत शुरुआत माना जा रहा है। साहित्य जगत के कई जानकारों का कहना है कि यह सिर्फ एक डेब्यू नहीं, बल्कि एक ऐसी लेखिका का आगाज है, जिसमें लंबी दौड़ की क्षमता दिखाई देती है।

शहनाब की कहानियां सिर्फ कल्पना नहीं हैं। उनमें इतिहास की परछाइयां हैं। समाज की बेचैनियां हैं। और इंसानी रिश्तों की वह गर्माहट भी है जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।

पूर्व विदेश मंत्री और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एडमंड हॉल के ऑनरेरी फेलो रहे Salman Khurshid ने उनकी लेखनी की खास सराहना की है। उनका मानना है कि शहनाब ने पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को बेहद बारीकी से समझा है। उनकी कहानियां एक ऐसे इलाके को सामने लाती हैं, जिसे अक्सर लोग सतही नजर से देखते हैं, लेकिन उसकी गहराई को समझ नहीं पाते।

खुर्शीद के मुताबिक, शहनाब की रचनाएं पूर्वोत्तर के इतिहास और वहां के जटिल सामाजिक माहौल को बेहद संवेदनशील तरीके से सामने रखती हैं। वे पाठक को सिर्फ कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि एक दुनिया में लेकर जाती हैं।

शहनाब की लेखनी की एक और खास बात यह है कि वह कल्पना और इतिहास के बीच संतुलन बनाती हैं। उनकी कहानियां पढ़ते हुए लगता है जैसे पाठक असम के किसी दूर दराज गांव, किसी पुराने रास्ते या किसी भूली हुई स्मृति के साथ चल रहा हो।

उनकी रचनाओं में असम का बदलता सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य साफ नजर आता है। वहां की बेचैनी भी है और उम्मीद भी। संघर्ष भी है और अपनापन भी।

साहित्य समीक्षकों का मानना है कि उनकी कहानियों की भाषा सधी हुई है। कथानक कसावट लिए हुए हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वे पाठक को बांधे रखती हैं। कहानी खत्म होने के बाद भी उसका असर बना रहता है।

आज जब साहित्य में तेज शोर ज्यादा है और ठहराव कम, ऐसे समय में शहनाब साहिन की आवाज अलग महसूस होती है। वह बिना किसी शोर के अपनी बात कहती हैं। शायद यही उनकी ताकत भी है।

असम की गलियों से निकलकर लेबनान तक का सफर तय करने वाली यह लेखिका अब उन कहानियों को दुनिया तक पहुंचा रही हैं, जो अक्सर नक्शे के एक कोने में दब जाती हैं।

शहनाब साहिन की यह शुरुआत बताती है कि कुछ कहानियां सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं, महसूस भी की जाती हैं।

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