Culture

रफ़ी की आवाज़ अमर है, पर उन्हें चुप कराने वाले आज भी बेनकाब नहीं

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

बॉलीवुड में एक ऐसा अदृश्य गिरोह हमेशा से सक्रिय रहा है, जो किसी कलाकार की प्रतिभा को दरकिनार कर अपने पसंदीदा चेहरों को आगे बढ़ाता है। यह गिरोह किसी भी स्थापित कलाकार को बहाने बनाकर हाशिए पर ढकेल देता है। सलमान ख़ान और करण जौहर जैसे नाम अकसर इस संदर्भ में लिए जाते हैं। लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मोहम्मद रफ़ी जैसे सुर सम्राट, जिनकी आवाज़ को ‘भगवान की आवाज़’ कहा जाता है, उन्हें भी बॉलीवुड ने एक दौर में लगभग 8-9 वर्षों तक घर बैठा दिया था?

इस चौंकाने वाला खुलासा किसी और ने नहीं, बल्कि स्वयं उनके समकालीन और चर्चित गायक सुरेश वाडकर ने किया है। हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस को दिए इंटरव्यू में वाडकर ने रफ़ी साहब के साथ हुए अन्याय और गायक समुदाय के प्रति बॉलीवुड की उपेक्षापूर्ण प्रवृत्ति पर खुलकर बात की।

लगभग एक घंटे के इस इंटरव्यू में वाडकर ने यह स्पष्ट तो नहीं किया कि किस निर्माता-निर्देशक ने रफ़ी साहब को पीछे किया, लेकिन उनके शब्दों से संकेत साफ था—उस दौर में लगभग हर संगीतकार किशोर कुमार से ही गवाने को प्राथमिकता दे रहा था।

सुरेश वाडकर ने कहा, “जब रफ़ी साहब का दौर खत्म हुआ और मेरा दौर शुरू हुआ, तो मेरे साथ भी वही किया गया।”

वो आगे कहते हैं, “एक समय था जब बड़े-बड़े म्यूज़िक डायरेक्टर्स रफ़ी साहब की दुहाई देते थे, पर वही लोग उन्हें आठ-नौ साल तक घर बैठाए रहे। सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि जिसे ‘अल्लाह मियां की गाय’ कहा जाता था, जिसने अपनी गायकी से पूरी इंडस्ट्री का दिल जीत लिया था, उसे आप घर बैठा देते हैं? यह कितनी शर्मनाक बात है।”

रफ़ी साहब की शख्सियत न सिर्फ उनकी आवाज़ में, बल्कि उनकी विनम्रता में भी झलकती थी। विरोधियों के लिए भी उनके पास कभी कड़वे शब्द नहीं होते थे। यही वजह थी कि लोग उन्हें ‘भगवान स्वरूप’ और ‘अल्लाह मियां की गाय’ जैसे विशेषणों से नवाज़ते थे।

इस मार्मिक इंटरव्यू में जब पत्रकार इरफ़ान ने सुरेश वाडकर से बॉलीवुड में गायकों के प्रति पक्षपात के बारे में पूछा, तो उन्होंने रफ़ी साहब का उदाहरण देते हुए एक कड़वी सच्चाई बयान की।

वाडकर कहते हैं, “यह नहीं था कि जिनको आप उभारना चाहते हैं, वो रफ़ी साहब से बेहतर गाते थे। दरअसल, रफ़ी साहब उनसे कहीं बेहतर गायक थे—इसीलिए चिढ़ कर उन्हें हाशिए पर डाल दिया गया।”

गुस्से में भरे सुरेश वाडकर कहते हैं, “यह क्या बात हुई कि आप सिर्फ एक ही गायक को प्रमोट कर रहे हैं? अगर साल में 100 गाने बनते हैं, तो उसमें 50 अपने पसंदीदा गायक को दीजिए, बाकी 50 औरों को मिलें ताकि उनका भी चाय-पानी चलता रहे। यह क्या तरीका है कि सिर्फ एक ही आदमी से गवा रहे हैं? बाकी लोग क्या घास काटने आए हैं?”

उन्होंने कहा, “मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन यह व्यवहार हमारे समय में भी हुआ। किसी एक को ‘पॉपुलर’ और ‘लक्की सिंगर’ का तमगा दे दिया जाता है। लक्की सिंगर क्यों नहीं होगा? जब आप 100 में से 98 गाने उसी से गवाएंगे, तो उसमें से 6-8 हिट हो ही जाएंगे। बाकी लोग क्या बेवकूफ हैं?”

अपनी बात को और गहराई देते हुए सुरेश वाडकर बोले, “यही वजह है कि बॉलीवुड शापित है। नेगेटिविटी इतनी है कि यहां 100 में से 50 लोग बद्दुआ देंगे। ऐसे माहौल में भला क्या खैर होगी?”

यह पहली बार नहीं है जब सुरेश वाडकर ने रफ़ी साहब के साथ अपने संबंधों का भावुक उल्लेख किया है। पहले भी वे यह बता चुके हैं कि रफ़ी साहब उन्हें बेहद स्नेह करते थे और उनकी गायकी की प्रशंसा करते थे।

एक बार जब सुरेश वाडकर को रफ़ी साहब के साथ एक कव्वाली गाने का मौका मिला, तो बाद में रफ़ी साहब के साले ने उन्हें फोन कर बताया कि “रफ़ी साहब तुम्हारी गायकी के कायल हो गए हैं।” इस स्मृति को याद करते हुए सुरेश वाडकर कहते हैं, “रफ़ी साहब सचमुच भगवान की आवाज़ थे। उनके जैसा न कोई था, न होगा। हम जैसे कई गायकों ने उनके गानों को सुन-सुनकर ही संगीत सीखा है।”

रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर यह सच्चाई सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि बॉलीवुड की उस सोच पर भी सवाल है, जो प्रतिभा से अधिक चापलूसी को तरजीह देती है।